सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

अमेरिकी फंदे में दम तोड़ता पेट्रो राष्ट्रवाद और इश्लामिक स्तम्भ :




विगत दिनों एक खबर मीडिया में जोर शोर से आई की कर्नल मुअम्मर गद्दाफी  की उसी के देश के 
बिद्रोहियों ने निर्मम हत्या कर दी.दरअसल कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की हत्या अमेरिकी और पश्चिमी देशो के आर्थिक अतिक्रमण की एक अगली कड़ी है.. जिसमे अमीरीकी कंपनियों का तेल का खेल अभीष्ट है..
अमरीका और उसके मित्र देशों  के इतिहास पर नजर डाले तो अपने आर्थिक साम्राज्यवाद एवं मंदी को दूर करने के लिए हर समय सुविधा के अनुसार सत्ताएं बनायीं और फिर उनसे समय समय पर युद्ध करके  अपना आधिपत्य साबित किया .. अगर विश्लेषण करे तो प्रथम एवं द्वितीय दोनों विश्व युद्ध का कारण आर्थिक था जो यूरोप और अमेरिका की आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए किया गया...
सोवियत रूस के विघटन के बाद अमरीका की गिद्ध  दृष्टि भारत और तेल उत्पादक देशों पर लगी हुए है..इसी उद्देश्यपूर्ति के लिए उसने लादेन जैसा भस्मासुर पैदा किया..हुस्नी की मुबारक की सत्ता को समर्थन दिया..तो कभी सद्दाम हुसैन के साथ भी गलबहियां डाली...अब धीरे धीरे पेट्रो राष्ट्रवाद और इश्लामिक जेहाद की आँच अमेरिका के आर्थिक,सामरिक और सामाजिक हित झुलसने लगे तो अमेरिका ने अपनी पुरानी मक्कारी दिखाई .

अगर पिछले ३-४ उदाहरण  ले तो इश्लामिक जेहाद का चेहरा बन चुका ओसामा बिन लादेन इसी अमरीकी दिमाग की उपज था और जब अमेरिका की रूस को साधने के लिए बनायीं गयी इस जेहादी मिसाइल ने अपना रुख अमरीका की ओर ही कर लिया तो अमरीका ने अफगानिस्तान से युद्ध छेड़ दिया..ये भी एक इत्तफाक ही कहा जायेगा की इन सारे घटनाक्रम के बिच में यूरोप और अमेरिका में मंदी के बदल छाने लगे थे ..ओसामा बिन लादेन को मारने या ९/११ के जिम्मेदार लोगो के सफाए  लिए सीआईए और नाटो का एक सिमित ख़ुफ़िया आपरेशन ही काफी था मगर  अफगानिस्तान को युद्ध को १० साल से ज्यादा खिंचा गया..
और शायद इसमें कोई संशय नहीं की कुछ सालो बाद किसी विकिलीक्स के खुलासे में ये तथ्य सामने आये की कही पर्ल हार्बर की तरह अमरीका पर किया गया ९/११ का हमला भी अमरीका के सहयोग से ही जेहादियों ने रचा हो....
अगर हम देखें तो अमरीका के पिछलग्गू "NATORIOUS NATO" गठबंधन में अमरीका सबसे ज्यादा हथियार आपूर्ति करता है..और अमरीका की हथियार उद्योग से लगभग १०० से ज्यादा  छोटे बड़े उद्योग जुड़े हुए है..कहीं न कहीं इन युद्धों का लम्बा खीचना कम से कम अमरीका के लिए दोहरे फायदे का सौदा है तेल के खेल एवं वैश्विक राजनीती  में दादागिरी और घरेलू मोर्चे पर मंदी के असर को कम करने का फायदा..
ठीक इसी प्रकार सद्दाम हुसैन की हत्या करने के लिए इराक को तबाह करने या मासूम जनता पर बम गिराने की जरुरत नहीं थी मगर अमरीका ने अपने अजेंडे पर चले हुए ये किया..ध्यान रहे, ये वही सद्दाम हुसैन है जो कभी रोनाल्ड रीगन के लाडले हुआ करते थे,उस समय न ही संयुक्त राष्ट्र संघ और न ही दोगले चरित्र वाले अमरीका को इराक के जनसंहार या मानवाधिकार की सुध थी..अमरीका के सहयोग से इसी सद्दाम ने इरान पर भी हमला बोल दिया ..मगर जब से सद्दाम ने इराक में और  कुवैत के मामले में में अमरीकी हितो की अनदेखी करनी शुरू की इस इस्लामिक तानाशाह की उलटी गिनती शुरू हो गयी जो इराक में उनकी फाँसी पर ख़तम हुआ..
इसी प्रकार वो हुस्नी  मुबारक हो या मुअम्मर गद्दाफी इस्लाम के एक एक स्तंभों को अमरीका अपने व्यापारिक हितो के लिए ख़तम करता जा रहा है..या जो थोड़े बहुत बचे हैं उन्होंने सउदी अरब जैसा अमरीका का आधिपत्य स्वीकार कर लिया..अब शायद अमरीका के अगले निशाने पर इरान होगा जो की एकमात्र देश बचा है जो अमरीका का प्रतिरोध कर रहा है...
हालाँकि अमरीका ने जिन इश्लामिक तानाशाहों या जेहादियों को ठिकाने लगाया है चाहे वो सद्दाम हो या लादेन या गद्दाफी उनके नरसंहार और अत्यचारों की एक लम्बी फेरहिस्त है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर इन अत्याचारों की सुध आज सालो बाद दुनिया में पेट्रोल के ख़तम होते भण्डारो के साथ ही अमरीका को आ रही है और विशेषतः उन देशों की जहाँ पेट्रोल की प्रचुरता है ये अमरीका की दोगली मानसिकता का परिचायक है..शायद गद्दाफी से क्रूर तानाशाह और भी मिल जायेंगे विश्व के कई देशों में मगर वहां का मानवाधिकार UN या अमरीका को नहीं दिखता क्यूकी वहां तेल के कुँए नहीं हैं...
हिन्दुस्थान के परिपेक्ष्य में देखें तो इन इश्लामिक दुर्गो का गिरना फिलहाल राहत देने वाला ही है चाहे लादेन हो या मुअम्मर गद्दाफी कोई भी भारत का मित्र नहीं रहा ...मुअम्मर गद्दाफी की कश्मीर पर नीति सर्वविदित थी..
अमरीका यदा कदा पाकिस्तान को कश्मीर में शह दे कर अपनी हथियार उद्योग को जीवित रखा है...वैसे भी हिन्दुस्थान में अमरीका को खुली लूट  की छूट अमरीकी  बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दे कर भारत सरकार ने  फिलहाल अपना गला अमरीकी फंदे से बचा रखा है..मगर इसमें कोई संशय नहीं की तेल का खेल ख़तम होने और सारे इश्लामिक स्तंभों  के सफाए के बाद अमरीका की दृष्टि भारत की और लगे..इसमें कोई आश्चर्य नहीं  यदि हिन्दुस्थान को कांग्रेसी लूट से छूट मिले और कोई राष्ट्रवादी नायक आगे आये तो अमरीका को कश्मीर और मणिपुर में मानवाधिकार हनन के दौरे आने लगे और हिन्दुस्थान को अरब नायको की तरह अमरीका जैसे कुटिल देश से दोस्ती की कीमत अफगानिस्तान या पाकिस्तान की तरह चुकानी पड़े....

शनिवार, 10 सितंबर 2011

गाय, गाँधी और गोरक्षा

प्राचीन काल से ही गाय हमारे जीवन यापन का महत्वपूर्ण साधन रही है। धार्मिक दृष्टि से यह पूजनीय तो रही ही है, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से गाय भारतीय जीवन प्रणाली की रीढ़ की हड्डी रही है। किन्तु अगर हम निरन्तर इस देश पर हुए आक्रमणों के बाद उत्पन्न स्थिति पर नजर डालें तो हमारी पूजनीय और जीवनदायिनी गाय को विदेशी आक्रन्ताओं व मतों (भारत के बाहरी मत पंथ) को मानने वालों नें गाय को दयनीय स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। वर्तमान आजाद भारत में हम भारतीय इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। खासकर आजादी के बाद बनी सरकारें इस दृष्टि से भारतीय जीवन शैली हिन्दूधर्म की प्रतीक गाय को निम्नतम स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है।
आजादी के बाद से निरन्तर चलने वाली एकपरिवारीय सरकार (कुछ अपवाद स्वरुप वर्षों को छोड़कर) जो अपने को गाँधी का वंशज मानती है और लगभग उनको पेटेंट कराकर बैठी है। उसी सरकार नें महात्मा गाँधी के मरने के बाद भी लगातार उनकी हत्या की है। कम से कम गाय के परिप्रेक्ष्य में तो यह कहा ही जा

बुधवार, 31 अगस्त 2011

सभी आजाद हैं, सिर्फ असली आजादी को छोड़ कर

सभी आजाद हैं, सिर्फ असली आजादी को छोड़ कर ................यह आजाद सोच वाले लोगों का देश है ! यहाँ ना किसी की जुबान पर ताला है, और ना ही किसी की हरकतों की कोई चाबी है, आखिर इन चौसठ सालों में हम भारतीय लोगों ने यही तो कमाया है, आज पूरी आजादी है दोस्त ! जो मन में आए बोलते रहो जो दिल करता है वही कर डालो ! मजहब के नाम पर ,राजनीति के नाम पर मनोरंजन के नाम पर हास्य शो के नाम पर, कुंठित विकास के वास्ते तुम उन्मुक्त भाव से कुछ भी कर डालो !
आज राखी सावंत मेरिज व्यूरो बना लो , मल्लिका शेरावत ओपन यूनिवर्सिटी खोल लो, इमरान हाशमी किसिंग इंस्टीच्यूट शुरू कर लो, और तो और लगे हाथों किसी दबंग राजनेता से उदघाटन भी करवा लो फिर देखो तुम्हारा हर गुनाह माफ  है !

सोमवार, 22 अगस्त 2011

पांच राष्ट्रीय भ्रम व वास्तविकता

                                         
वर्तमान समय में हमारे देश में पूरे देश में कुछ भ्रष्ट, बेईमान एवं शातिर किस्म के शैतानों के द्वारा ये झूठे प्रचार एवं प्रपंच रचकर एक षड्यंत्र के तहत देश के लोगो में आत्मग्लानि पैदा करने के लिय ये झूठ व झूठे आंकड़े घड़े गए हैं,जबकि हकीकत कुछ और ही है |
१.भारत एक गरीब देश है ! ....कोरा झूठ |
तथ्य : भारत दुनिया का सबसे ताकतवर एवं अमीर देश है |
   यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों के लोग कमजोर परन्तु वहाँ का नेतृत्व एवं कानून मजबूत हैं |यहाँ भारत के लोग मजबूत हैं परन्तु देश का नेतृत्व कायर,बुजदिल एवं भ्रष्ट है तथा कानून कमजोर हैं | भारत के स्थानीय निकायों, राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार का कुल बजट 20 लाख करोड रुपये है |और यह 20 लाख करोड रूपये का बजट तो तब है जबकि देश में चारों तरफ भ्रष्टाचार शिखर पर है | इस देश में भ्रष्टाचार न हो तो ये बजट लगभग 35 -40 लाख करोड़ का हो सकता है | आप ही सोचें , आप ही निर्णय करें कि क्या एक गरीब देश का इतना बड़ा बजट हो सकता है| जानबूझकर इस देश के बेईमान व भ्रष्ट नेताओं  ने भारत को गरीब बनाया हुआ है |
2. भारत में लगभग 5% लोग ही टैक्स भरते हैं !...सफ़ेद झूठ |
वास्तविकता : भारत में 100% लोग टैक्स देते हैं |
जो देशवासी तन पर दो कपडे पहनता है या साल में एक दो साबुन  प्रयोग में लाता है अथवा जुटे चप्पल व दुकान पर जाकर वः जीवन यापन कि जरुरी प्रयोग कि वस्तु आटा , नमक ,टूथपेस्ट ,तेल , मसाले , कागज , कलम ,लोहा , सीमेंट आदि खरीदता है , तो इन सब वस्तुओं पर वः वैट/एक्ससाइज आदि ड्यूटी बहरकर ही दुकानदार से क्रय करता है | एक आदमी भी स्टैम्प ड्यूटी, पीने के पानी पर टैक्स, गृहकर,सीवेज टैक्स ,रोड टैक्स ,सेल टैक्स अर्थात किसी न किसी प्रकार का टैक्स जीवनभर जरुर देता है , तो क्या यह सफ़ेद झूठ नहीं है कि मात्र पाँच प्रतिशत लोग ही टैक्स चुकाते हैं |ये झूठा भ्रम प्रचार इसलिय किया जाता है है कि दश के बेईमान लोग यदि लुटें तो कोई आवाज न उठाये |उनकी आवाज को दबाने के लिय यह झूठ बोला जाता है.ताकि इनसे कोई टैक्स मनी का हिसाब मांगे तो ये भ्रष्ट लोग कह सकें कि तुम तो टैक्स देते ही नहीं ,तुम हिसाब मांगने वाले कौन होते हो ?
3. सब लोग बेईमान हैं !....सबसे बड़ा षड्यंत्र |
सच्चाई :भारत में 99% आम व्यक्ति ईमानदार है अथवा इमानदारी से जीना चाहते हैं |
इस तरह के झूठ को कि सब लोग बेईमान हैं , इस रह से फैलाया गया है कि एक देशभक्त , ईमानदार एवं चरित्रवान भारतीय के मन में ये गहरा भ्रम हो गया कि सब बेईमान है जबकि हकीकत यह है कि भारत देश के आमजन 99% ईमानदार है या इमानदारी से जीना चाहता है | तथाकथित बेईमान लोगो ने अपनी बेईमानी को छुपाने के लिय आम लोगो को षड्यंत्र रच के व कुछ कानून व व्यवस्थाओ को इस तरह बना इया कि आम आदमी रिश्वत देने के मजबूर हो जाए व हम जनता को कह सकें कि सब बेईमान हैं |
4. भ्रष्टाचार कभी नहीं मिट सकता , भ्रष्टाचारी ही देश का शासन करेंगे !...गहरी साजिश |
संकल्प : राष्ट्रवादी , ईमानदार लोग ही देश का शासन करेंगे |
भ्रष्टाचारी लोग देश पर शासन करेंगे |यह झूठ भी एक साजिश के तहत बोला जा रहा है \जिससे कि ईमानदार लोग कभी सता में नहीं आ सकें | और एक के बाद एक दूसरा बेईमान सत्ताओ के सिंहासन पर बिथकर बेरहमी से देश को लूटे रहें |इस देश में देशभक्त ,चरित्रवान ,ईमानदार , पढ़े लिखे लोग भी हैं जो इस देश को एक अच्छा शासन दे सकते है | तो समस्त देश वासियों के मन एम् एक प्रशन उत्पन होता है क्या ईमानदार लोग एमपी व एमएलए बन पायेंगे | अवश्य बन पायेंगे बस संगठित होने कि जरूरत है |
5. विदेशीपूंजी निवेश के बिना ,न तो देश का विकास संभव है और न ही देश में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे !....एक प्रायोजित झूठ |
विश्वास : संसाधनों का  100% उचित उपयोग होने से होगा राष्ट्र का विकास और नहीं रहेगा कोई बेरोजगार |

यह भी देश को लूटने का एक प्रयोजीय झूठ है |जबकि हकीकत यह है कि देश कि पूंजी भ्रष्टाचार व विदेशी कंपनियों कि लुट से बच जाये तो इस कि अर्थव्यवस्था में इतना पैसा होगा कि ढांचागत विकास होगा जिससे कोई बेरोजगार नहीं रहेगा |व हमारे पास इतना पैसा आएगा कि हम दूसरे देशो को उस पैसे को ब्याज पर दे पायेंगे |
जबकि हकीकत यह है हमारे देश के बेईमान नेताओं व कुछ बेईमान उद्योगपतियों ने टैक्स व विकास योजनायों का पैसा चोरी करके विदेशी बैंको में जमा कर दिया है |जिसको अन्य देश काम में ले रहे हैं | यहाँ मंहगाई कि मार जनता झेल रही है |

अब इस सच को जान लेने के बाद मन एक ही संकल्प कि आवश्यकता है कि अब केवल सत्ता परिवर्तन से काम नहीं होगा बल्कि व्यवस्था परिवर्तन कि आवश्यकता है व भारत के स्वाभिमान को पुन : उपर उठाने के लिय ईमानदार देश भक्त लोगो का साथ देना होगा ...इसमें कोई भी हो सकते हैं चाहे वो यह काम स्वामी रामदेव ज करें ,चाहें अन्ना हजारे जी करें या किरण बेदी जी व कोई अन्य ....कोई भी हो सकते है नाम तो इस लिय बताएं कि वर्तमान समय में इनलोगों ने देश को एक नयी दिशा देने कि कोशिश कि है .....अब समय ज्यादा  सोचने का नहीं बस इनका साथ देने का है | फैसला आपके हाथ है | कि आप इस देश को आगे बढ़ाना चाहते है या फिर यूँ ही लूटने देना चाहते हैं |

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

व्यवस्था परिवर्तन कि आवश्यकता



पन्द्रह अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजो के शासन से मुक्ति से तो मिल गई लेकिन क्या सही मायने में हमारी व्यवस्था बदली ?क्या देश का आम नागरिक गुलामी कि बेड़ियों से निकल पाया ? अगर नहीं तो आज फिर व्यवस्था परिवर्तन कि आवश्यकता क्यों महसूस हुई ?इसी पर बात करता हूँ | कि आजादी के इन 64 वर्षों के बाद भी देश में जो समस्याएं , चुनोतियाँ व् भयावह दर्दनाक परिस्थियां राष्ट्र में पैदा हुई हैं , वे इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी नीतियां व् व्यवस्थाएं देश वासियों को न्याय नहीं दें पा रही हैं | अत: हमारे देश कि नीतियों व् पूरी व्यवस्था कि नए सिरे से पुन: संरचना कि नितांत आवश्यकता है |

1. आजादी के 64 वर्ष बाद भी यदि भारत के 50% से ज्यादा लोग अनपढ़ हैं, हमें अपने देश कि भाषाओँ में उच्च तकनिकी कि शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है , गरीब व अमीर के लिय एक जैसी शिक्षा व्यवस्था नहीं है ,हमारे पूर्वजो के ज्ञान ,जीवन व चरित्र के बारे में अपमान जनक बातें बताई जाती हैं - तो क्या ये हमारी शिक्षा व्यवस्था कि असफलता नहीं है ?

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

गोवा मुक्ति का युद्ध/भारत पुर्तगाल युद्ध

एक पुराना लेख जो आप सभी बंधुओं से यहाँ साझा करना चाहता था गोवा की मुक्ति से सम्बंधित जिसका इतिहास वर्तमान परिवेश में  या तो लोग भूल चुके हैं या शायद कुछ लोग जानते ही न हों ....
सामान्यतया भारत में जब हम जब आजादी के बाद के युद्धों की बात करतें है तो हमारे जहन में पाकिस्तान के साथ के चार युद्ध (1947,1965,1971,1999) एवं चीन के साथ युद्ध (1962 सन) याद आता है ...
मैंने अपनी संस्था व आस पास के कुछ लोगों पर एक सर्वेक्षण किया की वो भारत पुर्तगाल संबंधों के बारें में क्या जानते है .. ज्यादातर लोगों ने कुछ भ्रमण करने वाले स्थलों का नाम लिया.. कुछ ने पुर्तगाल के नाम पर मोनिका बेदी और अबू सलेम को भी याद कर लिया ..
यहीं से मुझे ये विचार आया की क्यों न मैं भारत पुर्तगाल के बीच हुए युद्ध के बारे में कुछ विचार आप सब से साझा करूँ जो सन 1961 में गोवा की आजादी के लिए हुआ, और हमारी भारतीय सेना ने विजय पताका फहराते हुए गोवा को पुर्तगालियों के 450 साल पुराने कब्जे से मुक्त कराया ..
ये वही गोवा है जिसे हम हिंदुस्तान और बाहर के लोग भी अपना प्रमुख पर्यटन स्थल मानतें है ... इस युद्ध की पृष्ठभूमि में जाने से पहले चलिए संक्षेप में गोवा के इतिहास पर एक नजर डाल लें ..
गोवा का प्रथम वरदान हिन्दू धर्म में रामायण काल में मिलता है .. पौराणिक लेखों के अनुसार सरस्वती नदी के सुख जाने के कारण उसके किनारे बसे हुए ब्राम्हणों के पुनर्वास के लिये परशुराम ऋषि ने समंदर में शर संधान किया ... ऋषि का सम्मान करते हुए समंदर ने उस स्थान को अपने क्षेत्र से मुक्त कर दिया .. ये पूरा स्थान कोंकण कहलाया और इसका दक्षिण भाग गोपपूरी कहलाया जो वर्तमान में गोवा है

शनिवार, 30 जुलाई 2011

ज्ञान का मुक्त प्रवाह या धन नियंत्रित ज्ञान

ज्ञान के लिए धन की आवश्यकता के दुष्प्रभाव

अगर कोई मुझसे पूछेगा की COPYRIGHT की हिंदी क्या होती है तो मेरा सीधा उत्तर होगा की COPYRIGHT की कोई हिन्दी नहीं होती है क्यूँकी हमारी संस्कृति में copyright नहीं होता है हमारी संस्कृति में ज्ञान का प्रवाह मुक्त होता है और यह केवल एक ही क्षेत्र नहीं है जहाँ पर ज्ञान का मुक्त प्रवाह होता है | हमारे मनीषियों ने ज्ञान के महत्त्व को भी समझा था और उसकी शक्ती को भी और इसलिए उनको पता था की ज्ञान पर धन का नियंत्रण नहीं होना चाहिए अपितु नैतिकता का और प्राणीमात्र के कल्याण की भावना का नियंत्रण होना चाहिए |

परन्तु आज की स्थिति यह है की शिक्षा की प्राप्ति के लिए पहली आवश्यकता धन हो गयी है धन के बिना शिक्षा प्राप्त करना संभव ही नहीं रह गया है और इसके परिणाम भी भयंकर हुए हैं | जब शिक्षा धन की सहायता से ही मिलाती है (और एक सीमा तक केवल धन की सहायता से) तो शिक्षा का उद्देश्य भी धनोपार्जन ही रह जाता है | हमने अपने विद्यालयों में वाक्य लिखे देखे थे "शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइए " परन्तु आज की वास्तविकता है की "धन की सहायता से आइये और धनोपार्जन के लिए जाइए " और

सोमवार, 25 जुलाई 2011

तुम मुझे गाय दो, मैं तुम्हे भारत दूंगा


मित्रों शीर्षक पढ़कर चौंकिए मत| मैं कोई नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसा नारा लगाकर उनके समकक्ष बनने का प्रयास नहीं कर रहा| उनके समकक्ष बनना तो दूर यदि उनके अभियान का योद्धा मात्र भी बन सका तो स्वयं को भाग्यशाली समझूंगा|

अभी जो शीर्षक मैंने दिया, वह एक अटल सत्य है| यदि भारत निर्माण करना है तो गाय को बचाना होगा| एक भारतीय गाय ही काफी है सम्पूर्ण भारत की अर्थव्यवस्था चलाने के लिए| किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की आवश्यकता ही नहीं है| ये कम्पनियां भारत बनाने नहीं, भारत को लूटने आई हैं|

खैर अब मुद्दे पर आते हैं|मैं कह रहा था कि मुझे भारत निर्माण के लिए केवल भारतीय गाय चाहिए| यदि गायों का कत्लेआम भारत में रोक दिया जाए तो यह देश स्वत: ही उन्नति की ओर अग्रसर होने लगेगा| मैं दावे के साथ कहता हूँ कि केवल दस वर्ष का समय चाहि

शनिवार, 23 जुलाई 2011

बुराई से मुक्ति का उपाय कैसे हो ?

पशु-पक्षियों की तरह खाने-पीने और प्रजनन की क्रियाएं मनुष्य भी करता है। उनकी तरह मनुष्य भी अपनी, अपने परिवार की और अपने समूह की देखभाल करता है। इन बातों में समानता के बावजूद पशु-पक्षियों से जो चीज़ उसे अलग करती है, वह है उसकी नैतिक चेतना। पशु-पक्षियों में भी भले-बुरे की तमीज़ पाई जाती है लेकिन एक तो वह मनुष्य के मुक़ाबले बहुत कम है और दूसरे वह उनके अंदर स्वभावगत है यानि कि अगर वे चाहें तो भी अपने स्वभाव के विपरीत नहीं कर सकते जबकि मनुष्य में भले-बुरे की तमीज़ भी बहुत बढ़ी हुई होती है और उसे यह ताक़त भी हासिल है कि वह अपने स्वभाव के विरूद्ध जाकर बुरा काम भी कर सकता है।

भले-बुरे का ज्ञान और उनमें चुनाव का अधिकार ही मनुष्य की वह विशेषता है जो कि उसे पशु-पक्षियों से अलग और ऊंची हैसियत देती है।मनुष्य सदा से ही समूह में रहता है और समूह सदैव किसी न किसी व्यवस्था के अधीन हुआ करता है। हज़ारों साल पर फैले हुए मानव के विशाल इतिहास को सामने रखकर देखा जाए और जिन जिन व्यवस्थाओं के अधीन वह आज तक रहा है, उन सबका अध्ययन किया जाए

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

मैकाले की प्रासंगिकता

भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव


मैकाले नाम हम अक्सर सुनते है मगर ये कौन था? इसके उद्देश्य और विचार क्या थे कुछ बिन्दुओं की विवेचना का प्रयास हैं करते.
मैकाले: मैकाले का पूरा नाम था थोमस बैबिंगटन मैकाले|अगर ब्रिटेन के नजरियें से देखें तो अंग्रेजों का ये एक अमूल्य रत्न था .. एक उम्दा इतिहासकार, लेखक प्रबंधक, विचारक और देशभक्त ..इसलिए इसे लार्ड की उपाधि मिली थी और इसे लार्ड मैकाले कहा जाने लगा..अब इसके महिमामंडन को छोड़ मैं इसके एक ब्रिटिश संसद को दिए गए प्रारूप का वर्णन करना उचित समझूंगा जो इसने भारत पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए दिया था...

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में-

" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो