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शनिवार, 30 जुलाई 2011

ज्ञान का मुक्त प्रवाह या धन नियंत्रित ज्ञान

ज्ञान के लिए धन की आवश्यकता के दुष्प्रभाव

अगर कोई मुझसे पूछेगा की COPYRIGHT की हिंदी क्या होती है तो मेरा सीधा उत्तर होगा की COPYRIGHT की कोई हिन्दी नहीं होती है क्यूँकी हमारी संस्कृति में copyright नहीं होता है हमारी संस्कृति में ज्ञान का प्रवाह मुक्त होता है और यह केवल एक ही क्षेत्र नहीं है जहाँ पर ज्ञान का मुक्त प्रवाह होता है | हमारे मनीषियों ने ज्ञान के महत्त्व को भी समझा था और उसकी शक्ती को भी और इसलिए उनको पता था की ज्ञान पर धन का नियंत्रण नहीं होना चाहिए अपितु नैतिकता का और प्राणीमात्र के कल्याण की भावना का नियंत्रण होना चाहिए |

परन्तु आज की स्थिति यह है की शिक्षा की प्राप्ति के लिए पहली आवश्यकता धन हो गयी है धन के बिना शिक्षा प्राप्त करना संभव ही नहीं रह गया है और इसके परिणाम भी भयंकर हुए हैं | जब शिक्षा धन की सहायता से ही मिलाती है (और एक सीमा तक केवल धन की सहायता से) तो शिक्षा का उद्देश्य भी धनोपार्जन ही रह जाता है | हमने अपने विद्यालयों में वाक्य लिखे देखे थे "शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइए " परन्तु आज की वास्तविकता है की "धन की सहायता से आइये और धनोपार्जन के लिए जाइए " और

शनिवार, 23 जुलाई 2011

बुराई से मुक्ति का उपाय कैसे हो ?

पशु-पक्षियों की तरह खाने-पीने और प्रजनन की क्रियाएं मनुष्य भी करता है। उनकी तरह मनुष्य भी अपनी, अपने परिवार की और अपने समूह की देखभाल करता है। इन बातों में समानता के बावजूद पशु-पक्षियों से जो चीज़ उसे अलग करती है, वह है उसकी नैतिक चेतना। पशु-पक्षियों में भी भले-बुरे की तमीज़ पाई जाती है लेकिन एक तो वह मनुष्य के मुक़ाबले बहुत कम है और दूसरे वह उनके अंदर स्वभावगत है यानि कि अगर वे चाहें तो भी अपने स्वभाव के विपरीत नहीं कर सकते जबकि मनुष्य में भले-बुरे की तमीज़ भी बहुत बढ़ी हुई होती है और उसे यह ताक़त भी हासिल है कि वह अपने स्वभाव के विरूद्ध जाकर बुरा काम भी कर सकता है।

भले-बुरे का ज्ञान और उनमें चुनाव का अधिकार ही मनुष्य की वह विशेषता है जो कि उसे पशु-पक्षियों से अलग और ऊंची हैसियत देती है।मनुष्य सदा से ही समूह में रहता है और समूह सदैव किसी न किसी व्यवस्था के अधीन हुआ करता है। हज़ारों साल पर फैले हुए मानव के विशाल इतिहास को सामने रखकर देखा जाए और जिन जिन व्यवस्थाओं के अधीन वह आज तक रहा है, उन सबका अध्ययन किया जाए

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

मैकाले की प्रासंगिकता

भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव


मैकाले नाम हम अक्सर सुनते है मगर ये कौन था? इसके उद्देश्य और विचार क्या थे कुछ बिन्दुओं की विवेचना का प्रयास हैं करते.
मैकाले: मैकाले का पूरा नाम था थोमस बैबिंगटन मैकाले|अगर ब्रिटेन के नजरियें से देखें तो अंग्रेजों का ये एक अमूल्य रत्न था .. एक उम्दा इतिहासकार, लेखक प्रबंधक, विचारक और देशभक्त ..इसलिए इसे लार्ड की उपाधि मिली थी और इसे लार्ड मैकाले कहा जाने लगा..अब इसके महिमामंडन को छोड़ मैं इसके एक ब्रिटिश संसद को दिए गए प्रारूप का वर्णन करना उचित समझूंगा जो इसने भारत पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए दिया था...

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में-

" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

शिक्षा क्षेत्र में प्रस्तावित नयी कानूनी रचनाये ...

सुव्यवस्था सूत्रधार मंच व्यवस्थाओं के सम्बन्ध में चर्चा करने का मंच है और अच्छी चर्चाओं और गंभीर विमर्शों के लिए इस मंच पर कुछ संग्रहनीय लेख भी लगाये जायेंगे उन व्यक्तियों के द्वारा लिखे हुए जो की ब्लॉग जगत पर नहीं हिं परन्तु इस विषय पर उन्होंने कुछ अच्छे लेख लिखे हैं | इसी श्रंखला में देवेन्द्र शर्मा जी का शिक्षा व्यवस्था लिखा हुआ लेख हम इस मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं |

gurukul
शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों के सर्वांगीण,उत्कॄष्ट विकास का माध्यम है।व्यक्तिगत ही नही वरन समाजिक एवं राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने का एकमात्र उपक्रम है। शिक्षा के इसी मह्त्व के ध्यान मे रखते हुये संसार के प्रत्येक राष्ट्र के मनीषियों, चिन्तकों ने शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार करते हुये इसे राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कॄति का अभिन्न अंग माना है। शिक्षा उस राष्ट्र-समाज के जीवन मुल्यों को संरक्षित एवं संवर्धित करती है। अतःशिक्षा का जितना संबंध शिक्षार्थी उससे अधिक समाज से है, नये विद्यार्थी, नयी पीढी जीवन-मुल्यों एवं संस्कॄति के प्रति निष्ठा शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त करती है। यह माध्यम ही एक विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक, नैतिक विकास कर उसका समाजीकरण करता है।

हमारे भारत मे आदिकाल से ही ग्यान की साधना अनवरत चलती रही है।"नास्ति विद्यासमं चक्षुः" अर्थात् विद्या के समान् कोई दूसरे नेत्र् नही होते है। ऐसे उच्च् आदर्शों एवं अपनी विशिष्ट शिक्षा पद्धति के कारण ही हमारे देश भारत ने सह्स्त्रॊं वर्षों तक संपूर्ण विश्व का सांस्कॄतिक नेतॄत्व करते हुये विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। हमारी शिक्षा परंपरा मे ऐसा माना गया है "न हि ग्यानेन् सदॄशम् पवित्रमिह् विद्यते"