गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

ना कोंसो अब हमें

i-next में उठाये गये प्रश्न ‘तो क्या लड़कियां ही हैं रेप की जिम्मेदार?’ के मुख्य दो कारण हैं- एक, कि यह प्रश्न वास्तव में जानना चाहता है कि रेप का वास्तविक कारण है क्या? दूसरा, इस प्रकार की शर्मनाक एवं दुखद घटनाओं के प्रति आने वाले वे असंवेदनशील संवाद जो उच्च पदों पर विराजमान शिरोमणियों के मुख से प्रकट हुए। डिप्टी कमिश्नर, डीजीपी, दिल्ली पुलिस कमिश्नर, सीएम दिल्ली एवं दिल्ली पुलिस, सभी के अनुसार लड़कियां अपने साथ हुई किसी भी दुर्घटना के लिए स्वतः जिम्मेदार है। किसी के अनुसार लड़कियों का पहनावा दोषी है तो किसी के अनुसार असमय उनका असुरक्षित यात्रा अथवा नौकरी करना। कितनी विचित्र स्थिति है कि एसी आफिस में बैठने वाले अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए ‘चोरी और ऊपर से सीना जोरी’ कर रहे है! पुलिस एवं सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा के भाव का अहसास कराना है। ऐसे में ये उल्टी नसीहत उन्हें नागरिकों द्वारा कष्ट प्रदान न किये जाने का आदेश दे रही है। उन्नति की दौड़ में अपेक्षाओं से अधिक परिणाम प्रस्तुत कर अपने वजूद का लौहा मनाने वाली महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर कैसे घर बैठकर आलू-गोभी काटने का हुक्म सुनाया जा सकता है? और इस प्रकार कैद महिलाओं की आन्तरिक सुरक्षा की क्या गारंटी? 15 मार्च 2012 को अमर उजाला में प्रकाशित समाचार ‘ नौ साल की उम्र में पहला एबार्शन’ लड़कियों की घरेलु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह आरोपित करने के साथ-साथ दी जाने वाली नसीहतों को शर्मिंदा भी करता है। नाबालिकों के साथ आये दिन होने वाले दुर्व्यवहारों के लिए हमारे इन आलाकमानों के पास क्या नसीहत है? ऑफिस में बैठकर सुझावों एवं सलाहों के भँवरों में आम आदमी की सोच को गुमराह करने से बेहतर है एक सटीक रणनीति का निर्माण किया जाए और एक ऐसा समाधान प्रस्तुत किया जाये जिससे वास्तव में लड़कियों को सुरक्षित संरक्षण प्राप्त हो सके और वे अपने सपनों का आकाश पा सकें।

बुधवार, 14 मार्च 2012

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत

अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" के लेखक साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर "अरब" हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव बसते थे, इस इलावर्त में एशियाई रूस का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, ईरान का पूर्वी भाग तथा गिलगित का निकटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। आदित्यों का आवास स्थान-देवलोक भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हिमालयी क्षेत्रों में रहा था। बेबीलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्त्विक खोज में जो भित्ति चित्र मिले है, उनमें विष्णु को हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष से युद्ध करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।
उस युग में अरब एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा था, इसी कारण देवों, दानवों और दैत्यों में इलावर्त के विभाजन को लेकर 12 बार युद्ध 'देवासुर संग्राम' हुए। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपनी पुत्री ज्यन्ती का विवाह शुक्र के साथ इसी विचार से किया था कि शुक्र उनके (देवों के) पक्षधर बन जायें, किन्तु शुक्र दैत्यों के ही गुरू बने रहे। यहाँ तक कि जब दैत्यराज बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना, तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व के पास अरब में आ गये और वहाँ 10 वर्ष रहे। साइक्स ने अपने इतिहास ग्रन्थ "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" में लिखा है कि 'शुक्राचार्य लिव्ड टेन इयर्स इन अरब'। अरब में शुक्राचार्य का इतना मान-सम्मान हुआ कि आज जिसे 'काबा' कहते है, वह वस्तुतः 'काव्य शुक्र' (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। कालांतर में 'काव्य' नाम विकृत होकर 'काबा' प्रचलित हुआ। अरबी भाषा में 'शुक्र' का अर्थ 'बड़ा' अर्थात 'जुम्मा' इसी कारण किया गया और इसी से 'जुम्मा' (शुक्रवार) को मुसलमान पवित्र दिन मानते है।
"बृहस्पति देवानां पुरोहित आसीत्, उशना काव्योऽसुराणाम्"-जैमिनिय ब्रा.(01-125)
अर्थात बृहस्पति देवों के पुरोहित थे और उशना काव्य (शुक्राचार्य) असुरों के।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ 'सेअरूल-ओकुल' के 257वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
"अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।"
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात 'ज्ञान का पिता' कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल जिहाल 'अज्ञान का पिता' कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। 'Holul' के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात 'संगे अस्वद' को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ' सेअरूल-ओकुल' के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । 'उमर-बिन-ए-हश्शाम' की कविता नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
" कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् - (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।
- विश्वजीत सिंह 'अनंत'

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

वैलेंटाइन डे: प्रेम का पर्व या संस्कारों का अवमूल्यन :


वर्तमान महानगरीय परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करने की जो यात्रा शुरू हुई है उसका एक पड़ाव फ़रवरी महीने की १४ तारीख है,हालाँकि प्रेम की अभिव्यक्ति किसी भी प्रकार की हो सकती हैI माँ-बाप,बेटा,भाई,बहन किसी के लिए मगर ये त्यौहार वर्तमान परिवेश में प्रेमी प्रेमिकाओं के त्यौहार के रूप में स्थापित किया गया हैI आज कल के युवा या यूँ कह ले आज कल कूल ड्यूड्स बड़े जोर शोर से इस त्यौहार को मना कर आजादी के बाद भी, अपनी बौधिक और मानसिक गुलामी का परिचय देते मिल जायेंगे Iपिछले १५-२० वर्षों में इस त्यौहार ने भारतीय परिवेश में अपनी जड़े जमाना प्रारम्भ किया और अब इस त्यौहार के विष बेल की आड़ में हमारी युवा पीढ़ी में बचे खुचे हुए भारतीय संस्कारो का अवमूल्यन किया जा रहा हैI इस त्यौहार के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है में उनका जिक्र करके उनका विरोध या महिमामंडन कुछ भी नहीं करना चाहूँगा क्यूकी भारतीय परिवेश में ये पूर्णतः निरर्थक विषय हैI

मेरे मन में एक बड़ा सामान्य सा प्रश्न उठता है की प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हम एक खास दिन ही क्यों चुने??जहाँ तक प्रेम के प्रदर्शन की बात है हमारे धर्म में प्रेम की अभिव्यक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है मीरा और राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम I मगर महिमामंडन वैलेंटाइन डे का?कई बुद्धिजीवी(या यूँ कह ले अंग्रेजों के बौधिक गुलाम) अक्सर ये कुतर्क करते दिखते हैं की इसे आप प्रेमी प्रेमिका के त्यौहार तक सीमित न करे, मेरी बेटी मुझे वैलेंटाइन की शुभकामनायें देती है,और पश्चिम में फादर डे,मदर डे भी मनाया जाता है I मेरा ऐसे बौधिक गुलाम लोगो से प्रश्न है की,अगर पश्चिम में मानसिक और बौधिक रूप से इतना प्रेम भरा पड़ा है की, वहां से प्रेम का त्यौहार, हमे उस धरती पर आयात करना पड़ रहा है जहाँ निष्काम प्रेम में सर्वस्व समर्पण की प्रतिमूर्ति मीराबाई पैदा हुई, तो पश्चिम में ओल्ड एज होम सबसे ज्यादा क्यों हैं?? क्यों पश्चिम  का निष्कपट प्रेम वहां होने वाले विवाह के रिश्तों को कुछ सालो से ज्यादा आगे नहीं चला पाता.उस प्रेम की मर्यादा और शक्ति तब कहा होती  है ,जब तक बच्चा अपना होश संभालता है ,तब तक उसके माता पिता कई बार बदल चुके होते हैं और जवानी से पहले ही वो प्रेम से परे एकाकी जीवन व्यतीत करता है I ये कुछ विचारणीय प्रश्न है उन लोगो के लिए जो पाश्चात्य सभ्यता की गुलामी में अपनी सर्वोच्चता का अनुभव करते हैं I
ये कैसी प्रेम की अनुभूति है जब पिता पुत्र  से कहता है की तुम्हारा कार्ड मिला थैंक्यू सो मच..और फिर वो एक दूसरे से सालो तक मिलने की जरुरत नहीं समझते I ये कौन से प्रेम की अभिव्यक्ति है जब प्रेमी प्रेमिका विवाह के समय अपने तलाक की तारीख भी निश्चित कर लेते हैं,और यही विचारधारा हम वैलेंटाइन डे:फादर डे मदर डे के रूप में आयात करके अपने कर्णधारो को दे रहे हैंI
मैं किसी धर्म या स्थान विशेष की मान्यताओं के खिलाफ नहीं कह रहा मगर  मान्यताएं वही होती है जो सामाजिक परिवेश में संयोज्य हो I आप इस वैलेंटाइन वाले प्रेम की अभिव्यक्ति सायंकाल किसी भी महानगर के पार्क में एकांत की जगहों पर देख सकते हैंI
क्या ये वासनामुक्त निश्चल प्रेम की अभिव्यक्ति है?? या ये वासना की अभिव्यक्ति हमारे परिवेश में संयोज्य है? शायद नहीं,तो इस त्यौहार का इतना महिमामंडन क्यों?? मेरे विचार से भारतीय परिवेश में प्रेम की प्रथम सीढ़ी वासना को बनाने में इस त्यौहार का भी एक योगदान होता जा रहा है I आंकड़े बताते हैं की वैलेंटाइन डे के दिन परिवार नियोजन के साधनों की बिक्री बढ़ जाती हैI क्या इसी वीभत्स कामुक नग्न प्रदर्शन को आप वैलेंटाइन मनाने वाले बुद्धिजीवी प्रेम कहते हैं? 
इस अभिव्यक्ति में बाजारीकरण का भी बहुत हद तक योगदान है कुछ वर्षो तक १-२ दिन पहले शुरू होने वाली भेडचाल वैलेंटाइन वीक से होते हुए वैलेंटाइन मंथ तक पहुच गयी है. मतलब साफ़ है इस नग्न नाच के नाम पर उल जलूल  उत्पादों को भारतीय बाज़ार में भेजनाIटेड्डी बियर, ग्रीटिंग कार्ड से होते हुए,भारत में वैलेंटाइन का पवित्र प्यार कहाँ तक पहुच गया है नीचे एक विज्ञापन से आप समझ सकते हैं?? 



वस्तुतः ये वैलेंटाइन डे प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन न होकर हमारे परिवेश में बाजारीकरण और अतृप्त लैंगिक इच्छाओं की पाशविक पूर्ति का एक त्यौहार बन गया है,जिसे महिमामंडित करके गांवों के स्वाभिमानी भारत को पश्चिम के  गुलामो  का इंडिया बनाने का कुत्षित प्रयास चल रहा हैIउमीद है की युवा पीढ़ी वैलेंटाइन डे के इतिहास में उलझने की बजाय गुलाम भारत के आजाद भारतीय विवेकानंद के इतिहास को देखेगी,जिन्होंने पश्चिम के आधिपत्य के दिनों में भी अपनी संस्कृति और धर्म का ध्वजारोहण शिकागो में कियाI


"वन्दे मातरम"

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

महिमा गौ माता की.


गाय मईया की महिमा तो अपार है जिसका उलेख शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है संत महात्माओ ने गो माता की महिमा के सम्बन्ध में अनेको व्याख्यान दिए है !
मातर: सर्वभूतानां गाव:
गाय सनातन संस्कृति की रीढ़ है !वेद शास्त्रों के अनुसार गाय माता पृथ्वी के समस्त प्राणियो की जननी है !
गाय के सींगो में ब्रह्मा,ललाट में शंकर,कानो में अश्वनी कुमार,नेत्रों में सूर्य चन्द्र,जीवा में पृथ्वी, पीठ पर नक्षत्रगण,गोबर में महालक्ष्मी,और थनों  में चारो समुद्र निवास करते है !
ब्राह्मणों और गुरु के पूजन से जो फल मिलता है ,वही फल गो माता के स्पर्श मात्र से प्राप्त हो जाता है ! बाल्मीक रामायण में आया है
विद्यते गोषु समभाव्यम विद्यते ब्रह्मणे तप:!
विद्यते स्त्रीषु चापळयम विद्यते ज्ञातितो भयम !!
इस श्लोक के प्रथम चरण में देखा जाए तो गाय माता पे ही तेनो लोक स्थित है ! अत: गाय माता प्रत्यक्ष देव है ! शास्त्रों में गाय के गोबर में महालक्ष्मी का निवास बतलाया है ,गो मूत्र में भागीरथी माँ गंगा का निवास है !
अरे वाह सरकार क्या कृपा है श्री युगल सरकार की लेख लिखते लिखते गाय माता के भी दर्शन हो गये, भगवती गाय माता घर की चोखट पे खड़ी है , गो रक्षक श्री गोपाल भी देखो क्या संयोग बनाते है ! श्री राधा श्री राधा श्री राधा !
गाय माता की रक्षा न केवल हर मानव का कर्तव्य है बल्कि धर्म भी है !
गावो ल्क्षम्या: सदा मुलं गोषु पाप्मान विद्यते !
अत्न्मैव सदा गावो देवानां परमं हवि :!!
गाय माता महालक्ष्मी का मूल है,उनमे पाप का लेश मात्र भी नहीं है ! गो माता ही मानव को अन्न और देवताओ को ग्रास प्रधान करती है !
निवटं गोकुलं यत्र श्वासं मुचित निर्भयम !
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकषति !!
गाय माता जहा बेठ कर श्वास लेती है, उस स्थान की शोभा में वृद्धि होती है और वहा पे किया हुआ सारा पाप उतर जाता है !
गो माता की सेवा वास्तव में श्री गोपाल सेवा ही है, भगवान श्री कृष्ण गो माता से अपनी माता का भाव रखते थे,और ऐसे कई उदहारण आपको श्री भागवत महापुराण में देखने को मिल जायेंगे !

source : http://www.facebook.com/note.php?note_id=185578701480173

मँहगाई डायन बच्चे खात है.........


‘‘सखी सैंया तो खूब कमात हैं, मँहगाई डायन खाए जात है’’। पीपली लाइव फिल्म का यह गीत वर्तमान निर्मम मँहगाई व सरकारी नीतियों पर तीखा व्यंग्य है। इन पंक्तियों को माध्यम बना बहुत से लेखकों ने विभिन्न समस्याओं की आलोचना की एवं जनजागरूकता का प्रयास किया। मँहगाई की काली छाया के प्रकोप से भयभीत एक नवीन विचारधारा हमारे समाज में विसरित हो रही है। ‘हम दो हमारा एक’ की नई सोच। नई पौध एक बच्चे की समर्थक है। उनके अनुसार भावी जीवन अत्यन्त जटिल है और उन परिस्थितियों की कल्पना ही उन्हें भयभीत कर देती है। वर्तमान परिस्थितियों में ही दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना अत्यन्त कठिन हो गया है। ऐसे में दो बच्चों का खर्चा वहन करना सरल नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि वे एक बच्चे की परवरिश में सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं। चौबीस घण्टे वे बच्चे के रहन-सहन एवं रख-रखाव पर अपनी नज़र रख सकते हैं। निःसन्देह इस निर्णय में नई पीढ़ी की सोच सकारात्मक एवं समाज हितवादी है। ‘एक बच्चा नीति’ का अनुसरण कर चीनी का बढ़ती जनसंख्या पर नियन्त्रण करने का प्रयास अभी तक जारी है। भारत की बढ़ती जनसंख्या भी चिंता का विषय है। ऐेसे में नई पीढ़ी यह निर्णय समझारी का प्रतीक है, सरहानीय है। बहरहाल देखना यह है नई पीढ़ी एवं उनके पूर्वजों के मध्य इस विषय पर चलने वाले वैचारिक संघर्ष में कौन विजयी होता है? परन्तु सार तो यही है कि ‘मँहगाई डायन’ ने अब बच्चों को भी खाना शुरू कर दिया है।



सोमवार, 30 जनवरी 2012

पचपन और बचपन


पचपन की उम्र का सेहरा पहने मिश्रा जी बगीचे में अकेले बैठे उबासी ले रहे थे। तभी उनका पाँच वर्ष का पौता, करन कुछ टूटे हुए खिलौने लिए भागा-भागा उनके पास आया और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘ दादा जी बचाओ-बचाओ दादा जी। मम्मी मेरे खिलौने कबाड़ी वाले को दे रही हैं। ये मेरे खिलौने हैं, मैं नही दूँगा इन्हें।’’ रूआँ सा करन दादा जी के पीछे खुद को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था और खिलौने वाले हाथों को अपनी कमर के पीछे छिपा रहा था।
‘‘क्या हुआ बहू? क्यों ले रही हो इसके खिलौने?’’, दादा जी ने पूछा।
‘‘पिताजी! ये सारे टूटे हुए खिलौने हैं। मैं कह रही हूँ कि इन्हें छोड़ दे, हम इससे भी अच्छे नये खिलौने इसे दिला देंगे। पर ये है कि मानता ही नही। पुराने-टूटे खिलौनों से घर भर रखा है।
करन, बेटा नये खिलौने ले लेना........इन्हंे मम्मी हो दे दो। मैं तुम्हें बिलकुल ऐसे ही नये खिलौने दिला दूँगा।
नहीं दादा जी, मुझे इन्हीं से खेलना है। मैं नहीं दूँगा।
अच्छा बहू, रहने दो। मत दो इसके खिलौने। खेलने दो इन्ही से इसे।
परेशान मम्मी वापस लौट जाती हैं।
अच्छा करन! ज़रा दिखा तो क्या खिलौने हैं तेरे पास, जिनके लिए तू मम्मी से इतना लड़ रहा था।
दिखाऊँ? मासूमियत से पूछते हुए करन ने एक टूटा ट्रक, कुछ तिल्लीनुमा लकड़ी, एक कपड़ा और पतंग का मंज्ज़ा आगे बढ़ा दिया।
दादा जी भी उस सामान को देखकर हैरान थे। परन्तु खिलौनों के प्रति करन का अनुराग देखकर उनकी उन खिलौनों में उत्सुकता बढ़ गई।
करन, इनसे खेलोगे कैसे?
आप खेलोगे दादा जी मेरे साथ?
हाँ-हाँ, क्यों नही! बताओ कैसे खेलना है?
मैं बताता हूँ। पहले तो आप ये स्टिक पकड़ो। अब इन्हें है ना इस ट्रक के चारों कोना पर लगाओ। इन छेदों में इन्हें लगा देते हैं। अब उस मंज्ज़ा से है ना इन स्टिक्स् को बाँधो, नी तो ये गिर जायेंगी। अब ये कपड़ा इन स्टिक्स् पर ऐसे लगा दो। ये बन गया हमारा घर। देखो दादा जी अच्छा है ना? और पता है ये चल भी सकता है।
दादा जी हैरान, करन को देख रहे थे। बच्चों के जो खिलौने हमारे लिए व्यर्थ का सामान होते हैं उन्हें लेकर कितनी कल्पनाएँ उनके संवेदनशील संसार में होती हैं। कैसा अद्भुत सान्निध्य उन सड़क पर ठोकर खाने वाले पत्थरों के प्रति, जो इनकी दुनिया में आकर सुंदर इमारत का रूप धर लेते हैं। ये बच्चें ही तो हैं जो पुरानी निर्जीव चीजों में से भी व्यर्थ का विशेषण हटा, उनके महत्व को बढ़ा देते हैं अन्यथा आज तो जीवित प्राणी भी का अस्तित्व भी अर्थहीन हो चला है। तभी तो पचपन का बचपन को किया गया प्यार लौटाने का समय आता है तो बचपन पचपन से उकता जाता है।
दादा जी के एकाग्रता के तार को करन की आवाज ने झनकारा और ‘चलो दादा जी खेलते हैं’ का सुर उत्पन्न हुआ। और एक बार फिर बचपन-पचपन का खेल प्रारम्भ हो गया।


रविवार, 1 जनवरी 2012

नव वर्ष में नवीनता क्या ?

इस समय पूरे देश में 2012 आने के उत्सव मनाये जा रहे हैं और इन उत्सवों का स्वरूप भी 'विशुद्ध आधुनिक' है दूसरी तरफ इन्टरनेट पर हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी लोग इन उत्सवों की प्रासंगिकता पर चर्चाएँ कर रहे हैं | उत्सवों का रंग बड़े नगरों में कुछ ज्यादा ही चटख है और विरोधी स्वर्रों में जोर इस बात पर है की इस नववर्ष का मूल विदेश में है  या ये किसी दुसरे धर्म के प्रवर्तक के जन्म के  आधार पर है | सभी के पास अपने तर्क हैं और मेरे पास भी हैं |

मुझे इस बात से कोई समस्या नहीं है की इस नववर्ष का मूल भारत भूमि से दूर एशिया और यूरोप की सीमा पर स्थित बेथेहलम में है | हम अभी भी उन वेद ऋचाओ के अनुसार चलते हैं जिनका कहना है की "यज्ञ अर्थात अच्छे विचार समस्त दिशाओं से हमारे पास आयें " या "ज्ञान यदि शत्रु से भी मिले तो उसे ले लेना चाहिए" परन्तु हम यह अवश्य देखना चाहेंगे की जो हमें मिल रहा है ये ज्ञान है या अज्ञान है ; और यदि ज्ञान है भी तो मंगलकारी है या नहीं लोकहितकारी है या नहीं है |
सबसे पहले बात करते है ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा के जन्म दिन की ; अगर ईसा का जन्म 25 दिसंबर को हुआ था तो नववर्ष 1 जनवरी को क्यूँ ? इसके अतिरिक्त ईसा का जन्म बेथेहलम में हुआ था और उनके जन्म के समय एक गुफा में भेड़ों और गडारियों की भी कथा है | परन्तु बेथेहलमने जनवरी के इस ठन्डे मौसम में गडरिये अपनी भेड़ों को लेकर बाहर नहीं निकलते हैं , इस संबंधमे मार्च या अप्रैल वाली परंपरा अधिक उचित प्रतीत होती है | जिस प्रकार "ईसा इश्वर का पुत्र है " ये बात का 'निर्णय' ईसा की मृत्यु  के 300 वर्षों बाद पादरियों की सभा में लिया गया था उसी प्रकार इस बात का भी निर्णय लिया गया हो की ईसा का जन्म नववर्ष के अवसर पर हुआ था | एक दूसरी संभावना ये दिखती है की ईसा का जन्म हिन्दू नववर्ष के दिन हुआ हो

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

परतंत्र शिक्षातंत्र



नवजात शिशु असहाय अवस्था में होता है। उसका पालन-पोषण तो परिवार में माता-पिता के संरक्षकत्व में होता है किन्तु उसकी बौद्धिक चेतना का दीप शिक्षा के द्वारा ही प्रज्वलित होता है। शिक्षा के द्वारा ही बालक की शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता है। इस प्रकार व्यंिक्तत्व के पूर्ण विकास के लिए शिक्षा अनिवार्य है। यह प्रगति का आधार है। जिस देश और समाज में अधिकांश जनसंख्या अशिक्षित होती है, वह देश और समाज संसार में पिछड़ा हुआ कहलाया जाता है। अतः शिक्षा न केवल व्यक्ति के व्यंिक्तत्व विकास के लिए वरन् समाज व देश की पूर्ण उन्नति के लिए भी उत्तरदायी है।
शिक्षा का उपर्युक्त लिखा महत्व सर्वविदित है और सर्वस्वीकार्य भी। तथापि आज वर्तमान शिक्षा प्रणाली जर्जर होती जा रही है। विभिन्न आयोगों का गठन इसकी स्थिति सुदृढ़ करने हेतु किया जाता रहा है, परन्तु परिणाम ‘सिफर’ ही है। यह कथन पाठकों को निःसन्देह विचित्र प्रतीत हो रहा होगा, क्योंकि आाधुनिक पाठ्यक्रम व ऊँची-ऊँची स्कूल इमारतें व उत्कृष्ट परिणाम इत्यादि का तिलिस्म शिक्षा के मूल उद्देश्य को अदृश्य कर चुका है और अस्थायी उन्नति की चकाचौंध भावी परिणामों को दृष्टिगत होने नहीं दे रही है। इस भ्रमित भंवर से बाहर निकलने के लिए अग्रलिखित तथ्यों का विश्लेषण आवश्यक है-
‘‘हमारा शिक्षा-तंत्र तीन स्तरों में विभाजित है- प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा। वर्तमान में प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षण हेतु भर्ती के लिए मुख्यतः दो द्वार प्रचलित हैं- विशिष्ट बीटीसी एवं बीटीसी। दोनों ही द्वार कई महाद्वारों पर ‘माया भंेट’ के पश्चात् ही खुलते हैं। बी. एड. की ही भाँति बीटीसी का भी बाजार सज चुका है। और नौकरी की आस में बोली लगाने वाले अपने-अपने स्थान पर विराजमान हैं। आशा वही पुरानी है- ‘बीटीसी के उपरान्त सुरक्षित भविष्य की गारण्टी’ अर्थात् ‘सरकारी नौकरी’।
मगर अफसोस! टीइटी व सीटीइटी सरीखे द्वारपाल कटोरा लिए इन द्वारों पर क्रूर रूप धारण किये सुशोभित हैं। प्रतिवर्ष नौकरी की दरकार करने वाले बेरोजगारों को इन परीक्षाओं हेतु माया की भंेट तो चढ़ानी ही होगी। और यदि किसी का कोटा एक वर्ष में ही पूरा हो गया अर्थात् यह परीक्षा उत्तीर्ण हो गई तो प्रसन्नचित मुद्रा पर विराम लगाइये और पाँच वर्षों के पश्चात् पुनः उस कटोरे में भेंट चढ़ाइये। यहाँ से आप साँप-सीढ़ी की प्रथम पंक्ति से प्रोन्नत हो द्वितीय पंक्ति पर आ गये। यहाँ आपको मिलेंगे ‘मेरिट’ रूपी ‘नाग देवता’, जो कब आपको डस लें, यह आपका भाग्य। इस पंक्ति में आगे बढ़ने की आपकी चाल घोर प्रतिक्षा के उपरान्त ‘रिक्तियों’ की सूचना के पश्चात ही आयेगी। और फिर आरम्भ होगा पुनः सरकारी कटोरे में भंेट चढ़ाने का सिलसिला। फॉर्म भरने से मेरिट लगने तक खूब धन-धान्य की वृष्टि विभिन्न विभागों पर आपके द्वारा की जायेगी। भाग्यवश आप मेरिट में आ जाते हैं तो तैयार हो जाइये दुर्गम स्थानों की सैर के लिए। ये वे गाँव व बस्तियाँ होंगी जिनकी कल्पना आपने अपने स्वपन में भी नहीं की होगी। स्थिति इतनी असहनीय हो जायेगी कि आप भागेंगे एक नये जुगाड़ के लिए जहाँ आप घर बैठकर इन कोर्सों व नौकरियों का आनन्द ले सकें। लेकिन यहाँ कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता जनाब! याद है ना माया की भेंट। चलिए, अब थोड़ी सी प्रसन्नता आपको नौकरी पाने की अवश्य होगी परन्तु साथ ही चिन्तनीय है कि उस अपरिचित व घर से इतनी दूर कैसे रहा जाये? विशेषतः लड़कियों के लिए तो यह अत्यन्त विकट समस्या है। यहाँ आवश्यकता है आपकी याददाशत के पुर्नाभ्यास की और चढ़ाइये भेंट माया की। यहाँ विभिन्न समस्याओं का एकमात्र समाधान माया ही है।’’
विचारणीय है कि इस प्रकार की परिस्थितियों से उपजित शिक्षक क्या अपने दायित्वबोध से परिचित रह पायेंगे? प्राथमिक विद्यालयों में अवनत शिक्षा स्तर इसी के परिणाम का प्रदर्शन कर रहा है। मिड डे मील में कीड़े, अनुपस्थित शिक्षक और ज्ञानविहीन कोरे बालक, ऐसा प्रतीत होता है मानो शिक्षक आपबीती का प्रतिशोध ले रहे हों।
अधिकांशतः इन प्राथमिक विद्यालयों में अभावग्रस्त बच्चे ही प्रवेश लेते हैं। भाग्य को प्रतिपल चुनौती देना इनकी दिनचर्या में सम्मिलित है। संघर्ष इनकी नियति है। तो क्या इन बच्चों को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है? क्या गरीबी से आइएएस, पीसीएस की कल्पना व्यर्थ है? वस्तुतः निर्धनों के सुनहरे सपनों को तोड़ने का यह पाप अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा-तंत्र द्वारा ही किया जा रहा है।
शिक्षा का कोई भी स्तर हो प्राथमिक, माध्यमिक अथवा उच्च, एक समस्या सर्वव्यापी है- ‘अध्यापको द्वारा ट्यूशन के लिए बाध्य किया जाना’। ट्यूशन के लोभ में शिक्षकों के गिरते स्तर की पराकाष्ठा इनके द्वारा विद्यार्थियों का मानसिक, शारीरिक व आर्थिक शोषण है। प्रायः समाचार-पत्र शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के प्रति किये गये दुर्व्यवहार की घटनाओं से लबालब रहते हैं। शिक्षकों द्वारा अपने पेशे की गरिमा के परे छात्राओं का किया जाने वाला शारीरिक शोषण, शिक्षकों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह आरोपित करता है। कैसे निश्चिन्त हो जायें अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा के मंदिर में भेजकर?
विद्यालयों को शिक्षा का मंदिर कहना अब उचित न होगा। विद्यालय-कॉलेज अब एक ऐसा व्यापार हो गये हैं जिसमें मुनाफा निश्चित है, घाटे का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। विद्यालय में बच्चे का दाखिला मानो शेयर मार्केट में पैसा लगाने जैसा है। जितना बड़ा निवेश उतना मोटा फायदा। तथापि सुरक्षा, अनिश्चित। डोनेशन से लेकर छोटे-बड़े कार्यक्रमों के नाम पर लूट, स्कूल यूनिफॉर्म से किताबों तक पर लुटाई, कभी टूर पर जाने के लिए विवश किया जाना तो कभी किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए इत्यादि। आखिर माता-पिता बच्चों को पढ़ायें तो पढ़ायें कैसे? प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक शिक्षा प्राप्ति का आधार योग्यता न रहकर पैसा हो गया है। जो जितना निवेश करेगा, उतना ही अधिक लाभान्वित होगा।
वर्तमान शिक्षा नीतियों ने शिक्षा की गुणवत्ता को भी संदिग्ध किया है। उदाहरण स्वरूप आठवीं कक्षा व दसवीं कक्षा में अब कोई भी विद्यार्थी अनुत्तीर्ण नहीं होगा। बेसिक स्तर पर ही यदि विद्यार्थी के फेल न होने के डर को संरक्षण मिल जायेगा तो भला विद्यार्थी के लिए परिश्रम का क्या महत्व रह जायेगा? दसवीं कक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी को पास करने का परिणाम हम देख ही चुके हैं। ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश के लिए होती मारामारी ने भ्रष्टाचार को उड़ान हेतु विस्तृत आकाश प्रदान कर दिया। अधिकतम अंक प्राप्तकर्ताओं को प्रवेश प्राप्त हो गया परन्तु कम अंक वाले विद्यार्थियों को अंधकारमय भविष्य ने भोग लगाया। यदि वे विद्यार्थी दसवीं मंे ही अनुत्तीर्ण हो जाते तो कम से कम उनके पास पुनः परिश्रम कर अच्छे अंक प्राप्त करने का अवसर सुरक्षित रहता । यद्यपि यह निर्णय विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को कम करने हेतु लिया गया था परन्तु इसके पश्चात् भी स्थिति यथावत् रही। कहीं प्रवेश न मिल पाने की कुण्ठा, अवसाद व हीनभावना ने उन्हें पुनः एक ही मार्ग की ओर प्रेरित किया। पलायनवादी प्रवृत्ति के विद्यार्थियों ने आत्महत्या के मार्ग का ही चयन किया। बहरहाल स्थिति अधिक विकट अवश्य हो गई। प्रवेश न मिल पाने के कारण घर खाली बैठने, छोटे-मोटे रोजगार में लगने व वैकल्पिक कोर्स करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हो गई। इस शिक्षा नीति ने बहुत से विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा से वंचित तो किया ही, साथ ही निराशा ने उन्हें अपराध की ओर प्रवृत भी किया।
इन चाणक्य नीतियों की भला और क्या तारीफ की जाये। इन्होंने बेरोजगारी की परिभाषा का स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया है। ‘‘शिक्षित वर्ग जो रोजगार प्राप्त नही कर पाता है, बेराजगार कहलाता है।’ इस शिक्षा नीति के अन्तर्गत न तो बालक शिक्षित हो सकेगें और न ही अच्छी नौकरी की आकांक्षा रख सकेंगे। वाह समाधान!
उच्च स्तरीय शिक्षा का आलम देखिए- पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश में शोध और प्रबंधन से जुड़े शीर्ष संस्थानों आइआइटी और आइआइएम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा, ‘‘विद्यार्थियों की गुणवत्ता के कारण ही हमारे आइआइटी और आइआइएम संस्थान उत्कृष्ट बने हुए हैं।’’ रमेश के अनुसार, ‘‘संस्थान नहीं, यहाँ के छात्र विश्वस्तरीय हैं। सरकारी तंत्र की मकड़जाल के चलते भारत विश्वस्तरीय शोध केन्द्र विकसित नहीं कर पाता है।’’
वस्तुतः माननीय रमेश जी की यह कोई कल्पना नही वरन् यर्थाथ का वह आइना जिसकी स्वीकार्यता लज्जित करती है। विश्वविद्यालयों व सम्बद्ध महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की उपस्थिति रजिस्टर में भले ही 75ः से अधिक है परन्तु वास्तविकता यह है कि विद्यार्थियों की आधे से अधिक संख्या ऐसी होती है जो परीक्षा देते समय ही कॉलेज के दर्शन करते हैं। नियमित उपस्थिति तो असंभव है। और जो कॉलेज में नियमित रूप से आने वाले विद्यार्थी हैं उन्हें प्रायः दूसरी कक्षाओं के बाहर लड़कियांे को ताकते हुए पाया जा सकता है।
यह सब निकृष्ट होते शिक्षा-तंत्र की मात्र कुछ झलकें हैं। यदि गम्भीरतापूर्वक व ईमानदारी का सानिध्य लेते हुए शिक्षा-तंत्र की वास्तविक स्थिति का अध्ययन किया जाये तो यूजीसी, एनसीटीई, सीबीएससी, आइसीएससी, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, स्कूल-कॉलेज, कोचिंग इंस्टीट्यूट इत्यादि प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार की होड़ लगी है। यह फहरिस्त इतनी लम्बी है कि इसके हर एक शब्द का अपना एक उपन्यास है। विस्मयबोधक है कि इस शिक्षा-तंत्र से जूझते हुए भी विद्यार्थी अपना विश्वास इसमें बनाये हुए हैं और उज्ज्वल भविष्य के लिए आशातीत हैं। निःसन्देह उम्मीद पर दुनिया कायम है। ईश्वर से प्रार्थना है कि इस उम्मीद की लौ यूँ ही रोशन रहे। परन्तु यह भी सच है कि ‘‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए’’। अब सटीक समाधान खोजा जाना नितांत आवश्यक है। अन्यथा सम्भावना है कि विश्वास की डोर छूटते ही काला भविष्य निर्दोष व निराश विद्यार्थियों को जुर्म की राह न दिखा दे। और गाँधी, नेहरू, सुभाष, भगतसिंह आदि जैसे महान व्यंिक्तत्वों के सपनों के भारत की भावी पीढ़ी उनके बलिदान को अज्ञानतावश कलंकित कर जाये। विषय वास्तव में गम्भीर है।



शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

धर्म आधारित आरक्षण भारत के लिए विष का प्याला


भारत में सत्ता हस्तांतरण के पश्चात आरक्षण उन वर्गो को दिया गया था जो बेहद दबे और कमजोर जाति से संबंध रखते थे तथा आरक्षण के बिना उनका आगे बढ़ना असम्भव था । ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में तो उनकी परछाई तक प्रदूषित मानी जाती थी । मूल रूप से इसे अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए 10 वर्षो के लिए रखा गया था । मगर यह आरक्षण न केवल 64 वर्षो से चला आ रहा है , बल्कि विभिन्न समुदायों में विद्वेष पैदा करने के लिए फैलता भी जा रहा है । इसमें उन समुदायों की आवश्यकता से अधिक वोट बैंक की राजनीति का हाथ है ।
अब ये आरक्षण विकराल रूप लेने लगा है । हिन्दू समाज की गुर्जर , कुम्हार आदि जातियों के साथ - साथ मुस्लिम व ईसाई समाज भी धार्मिक आधार पर आरक्षण मांगने लगे है । आखिर आरक्षण कब समाप्त होगा ? क्या यह देश को अखंड व सुरक्षित रहने देगा ? देश के अन्य वर्ग , जाति और समुदाय कब तक चुप रहेंगे ? एक दिन वह भी आरक्षण की मांग करेंगे । सामान्य कहे जाने वाली जातियां भी आरक्षण की मांग करेंगी । क्योंकि उनके लिए तो कुछ भी नहीं बचता , क्योंकि आरक्षित वर्ग आरक्षण के कारण तो अपना अधिकार लेता ही है । सामान्य वर्ग के हिस्से में भी भागीदार हो जाता है , ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या सामान्य वर्ग में गरीब व बेसहारा नहीं है ? या तो सरकार हर जाति और समुदाय के गरीब परिवार के युवाओं को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दें या फिर आरक्षण को समाप्त कर दें । वरना आरक्षण पाओ और आबादी बढ़ाओं ही चलता रहेंगा । देश की चिन्ता कोई नहीं करेगा ।
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने कहा था कि जातियां राष्ट्रविरोधी है । पहला , इसलिए कि ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती है । ये राष्ट्रविरोधी है क्योंकि ये समुदायों में ईष्या तथा घृणा पैदा करती है । यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनाना चाहते है तो हमें इन सभी कठिनाईयों से पार पाना होगा । भाईचारा होगा तो ही राष्ट्र बनेगा ।
पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर का कहना है कि जाति के आधार पर आरक्षण तथा अन्य उपाय समाज तथा राष्ट्रहित में नहीं है । उन्होंने कहा कि यह अत्यन्त गरीब तथा सभी समुदायों के जरूरतमंद लोगों को मिलना चाहिए ।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सबको समान अवसर देने का वचन देता है तो अनुच्छेद 15 ( 1 ) के द्वारा यह विश्वास दिलाया गया है कि जाति , धर्म , संस्कृति या लिंग के आधार पर राज्य किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा । मुसलमान व ईसाई आदि अल्पसंख्यकों को भी बहुसंख्यकों के बराबर स्वतंत्रता व रोजगार का अधिकार प्राप्त है । भारत का संविधान स्पष्ट शब्दों में धर्म आधारित आरक्षण की मनाही करता है । तो भी सन 2004 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन राजशेखर रेड्डी की सरकार ने संविधान की मूल भावना के विरूद्ध अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण हेतु धर्म के आधार पर विभाजित भारत के इतिहास में धर्म के आधार पर आरक्षण का एक नया पन्ना जोड़ा । जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ गौर कर रही है । अल्पसंख्यक वोटों के भूखे अन्य राजनीतिक दल भी इसका अनुकरण करने के लिए लालायित है ।
मुस्लिमों के लिए आरक्षण वस्तुतः उस मर्ज का इलाज ही नहीं है , जिससे मुस्लिम समुदाय ग्रस्त है । विडंबना यह है कि सेक्युलर दल अवसरवादी राजनीति के कारण उस मानसिकता को स्वीकारना नहीं चाहते । बुर्का प्रथा , बहुविवाह , मदरसा शिक्षा , जनसंख्या अनियंत्रण जैसी समस्याओं को दूर किए बगैर मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने की कवायद एक छलावा मात्र है । इस प्रतियोगी युग में भी अधिकांश मुस्लिम नेताओं द्वारा मदरसों की अरबी - फारसी शिक्षा को ही यथेष्ट माना जाना तथा अपने समुदाय के लोगों को जनसंख्या नियंत्रण के तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित न करना क्या दर्शाता है । वे अपनी बढ़ी आबादी के बल पर राजनीतिक दलों के साथ ब्लैकमेलिंग की स्थिति में है ।
हिन्दू और मुसलमानों की साक्षरता दर के साथ जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना करें तो मुस्लिमों के पिछड़ेपन का भेद खुल जाता है । केरल की औसत साक्षरता दर 90.9 प्रतिशत है । मुस्लिम साक्षरता दर 89.4 प्रतिशत होने के बावजूद जनसंख्या की वृद्धि दर 36 प्रतिशत है , जबकि हिन्दुओं में यह दर 20 प्रतिशत है । महाराष्ट्र में मुस्लिम साक्षरता दर 78 प्रतिशत होने के साथ ही जनसंख्या वृद्धि दर हिन्दुओं की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है । छत्तीसगढ़ में साक्षरता 82.5 प्रतिशत तो जनसंख्या दर हिन्दुओं की तुलना में 37 प्रतिशत अधिक है । संसाधन सीमित हो और उपभोक्ता असीमित तो कैसी स्थिति होगी ?
अल्पसंख्यक बोट बटोरने के लिए आरक्षण को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त कर रही राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को खुले मस्तिष्क से धर्म आधारित आरक्षण के दीर्घकालिक परिणामों पर सोचना चाहिए । धर्म के आधार पर आरक्षण कालांतरण में राज्य व केन्द्र स्तर पर अलग - अलग क्षेत्रों की मांग का भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है । जो भारत के लिए विष का प्याला सिद्ध होगा । जाति और धर्म आधारित आरक्षण समाज में मतभेद बढ़ाता है और राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का काम करता है ।
दूसरी ओर आर्थिक आधार पर आधारित आरक्षण कोई फूट नहीं डालता और विभिन्न समुदायों में कोई वैमनस्य नहीं बढ़ाता । अभी भी आरक्षण का आधार आर्थिक करने का एक अवसर है , इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है । यदि धर्म आधारित आरक्षण दिया गया तो इसके परिणाम राष्ट्रीय एकता के लिए विष के समान घातक सिद्ध होगे ।
- विश्वजीत सिंह


@ राष्ट्रभक्तों के नाम एक आत्मीय निवेदन :- मित्रों यदि आप इन्टरनैट की दुनियां से बाहर निकल कर धरातल पर राष्ट्रहित में कुछ ठोस करने का ध्येय रखते है तो अपना नाम , पता , मोबाईल नं. , ईमेल आई डी , शिक्षा व जॉब प्रोफाईल सहित मुझे vishwajeetsingh1008@gmail.com पर ईमेल करें , जिससे भविष्य में धरातल पर सुसंगठित तरीके से कार्यारम्भ किया जा सकें ।
वन्दे मातरम्

ये गुलामी क्यों?? :Why this slavery?:


इसे दास्ता की फितरत कहें या अज्ञानता। भौतिक रूप से स्वतंत्रता की प्रसन्नता भी हमें मानसिक गुलामी के भँवर से बाहर निकालने में असमर्थ है। जी हाँ, अँग्रेजों की गुलामी से वर्तमान मीडिया की गुलामी तक के सफ़र के विभेदीकरण में आज भी हम असमर्थ हैं। वैयक्तिक वैचारिक क्षमता, विश्लेषण-संश्लेषण की बौद्धिकता विलुप्त होती जा रही है। तभी तो आज हम मीडिया के नेत्रों से देखे दृश्यों तथा श्रवणेन्द्रियों से सुने शब्दों के दास हो गये हैं। व्यक्तिगत निर्णय लेने की क्षमता जैसी शब्दावली हमारे शब्दकोश में स्थान पाने में असफल होती जा रही है। हाल ही में धूम मचा रहे गीत ‘कोलावेरी डी’ की विवेचना करें तो यह गीत पहली बार सुनने पर कर्णप्रिय होने का विश्वास भी नहीं जीत पाता परन्तु मीडिया में इसकी चर्चा सुनते ही यह हमारा ‘प्रिय गीत’ बन जाता है। इसी प्रकार छोटे-छोटे बच्चों में भी ‘डर्टी पिक्चर’ की चर्चा मात्र ही रसानुभूति का संचार कर रही है। वही दूसरी ओर ‘बोल’ सरीखी गंभीर एवं अर्थयुक्त फिल्में योग्य स्थान पाने तक में भी लाचार रही। कितनी विचित्र पसंद हो गई है ना हमारी! चूँकि मीडिया ने इन्हें हाइप दी है तो यह हमें अवश्य पसंद करनी चाहिए अन्यथा लोग हमें ‘बैकवर्ड’ समझेंगे। इसी मानसिकता के दायरे में सीमित हो गये हैं आज हम। पर ज़रा सोचिये- अपनी पसंद-नापसंद न पहचानने व उसे सामाजिक रूप से स्वीकार न कर पाने की विवशता क्या हमारी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है? शिक्षित होते हुए भी इस अशिक्षित स्थिति में प्रवेश करना कितना शर्मनाक है??