रविवार, 25 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-2)


इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1) मे आप ने पढ़ा की तमाम संधियों और युद्धों के बाद भी किस प्रकार  इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद अब अरबों यहूदियों,यूरोप और संयुक्त राष्ट्र के बीच एक जटिल समस्या बन गया ॥ भाग 1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे 

अरब बिद्रोह के बाद ब्रिटेन की सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया जिसके अनुसार हर साल मे 10 हजार यहूदी परिवारों को फिलिस्तीन मे 5 सालो के लिए बसने की अनुमति होगी। उसके बाद अरबों के अनुमोदन के बाद ही वो फिलिस्तीन मे रह सकते है। यहूदियों ने इस श्वेत पत्र को सिरे से नकार दिया । अब यहूदियों और अरबों का फिलिस्तीन पर कब्जे के लिए संघर्ष भूमिगत सशस्त्र समूहो के माध्यम से शुरू हो गया जिसमे प्रकारांतर से ब्रिटेन ,नाजी और अरब देश भी सहायक होने लगे । स्वेत पत्र के बाद यहूदियों ने अरबों के साथ साथ ब्रिटेन को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया था । अब सारे यहूदी बिद्रोही समूह एकजुट होकर ब्रिटेन के अधिकारियों क्लबो और ट्रेनों को निशाना बनाने लगे । वो किसी भी प्रकार ब्रिटेन को फिलिस्तीन से बाहर कर देना चाहते थे ।
सन 1945 मे ब्रिटेन मे लेबर पार्टी की सरकार आई और उसने यहूदियों को ये आश्वासन दिया की वो  ब्रिटेन सरकार के स्वेत पत्र को वापस लेंगे और यहूदियों की मातृभूमि का समर्थन करेंगे साथ ही साथ विश्व के हर कोने से यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वसन की प्रक्रिया दोगुनी की जाएगी ।हालांकि यहूदी बिद्रोही समूहों के लिए ये आश्वासन भर सिर्फ काफी नहीं था उन्होने अवैध रूप से यहूदियों को फिलिस्तीन मे लाना जारी रखा । अमरीका और अन्य देशो ने भी अब ब्रिटेन पर फिलिस्तीन मे यहूदियों के पुनर्वास के लिए दबाव डालना शुरू किया । एक एंग्लो - अमेरिकन जांच के लिए समिति ने तत्काल 1 लाख यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वास की सिफ़ारिश की । इसका अरबों ने विरोध किया और वो भी ब्रिटेन पर दबाव डालने लगे ॥ 
ये वो समय था जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो रहा था । अब ब्रिटेन के लिए फिलिस्तीन एक गले की हड्डी बन गया था ब्रिटेन ने कोई सूरत न देखते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र के हवाले करके खुद को विवाद से अलग करने मे भलाई समझी और फिलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण अब संयुक्त राष्ट्र के हाथो मे था ॥
संयुक्त राष्ट्र ने अर्ब और यहूदियों का फिलिस्तीन मे टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित कर दिया । जेरूसलम जो ईसाई 
,अरब और यहूदी तीनों के लिए धार्मिक महत्त्व का क्षेत्र था उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन के अंतर्गत रखे जाने का प्रस्ताव हुआ ।इस व्यवस्था में जेरुसलेम को " सर्पुर इस्पेक्ट्रुम "(curpus spectrum) कहा गया ।  29 नवम्बर 1947 को संयुक्त राष्ट्र मे  ये प्रस्ताव पास हो गया । यहूदियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि अरबों ने इसे नकार दिया। इस प्रस्ताव के अंतर्गत फिलिस्तीन को दो बराबर हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित किया जाना था मगर इस विभाजन मे सीमा रेखा काफी जटिल और उलझी हुई थी। इस कारण थोड़े ही दिन मे ये परिलक्षित हो गया की ये विभाजन लागू नहीं किया जा सकेगा। इस विभाजन मे फिलिस्तीन की 70% अरब लोगो को 42% क्षेत्र मिला था जबकि यही लोग विभाजन के पहले 92% क्षेत्र पर काबिज थे अतः किसी भी प्रकार से ये विभाजन अरबों को मान्य नहीं था । 
सन 1948 के मई महीने मे ब्रिटेन की सेनाएँ वापस लौट गयी हलाकी इस समय तक इज़राइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पायी थी। अब यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों मे खूनी टकराव शुरू हो गया । १४ मई, १९४८ को यहूदियों ने स्वतन्त्रता की घोषणा करते हुए इज़राइल नाम के एक नए देश का ऐलान  कर दिया। अगले ही दिन अरब देशों- मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक़ ने मिलकर इज़राइल पर हमला कर दिया। इसे 1948 का युद्ध का नाम दिया गया और यही से अरब इज़राइल युद्ध की शुरुवात हो गयी। इज़राइल के इस संघर्ष को अरबों ने "नक़बा" का नाम दिया हजारो अरब बेघर हुए और इज़राइली कब्जे वाले इलाको से खदेड़ दिये गए। हालांकि इज़राइली हमेशा ये कहते आए की ये सारे अरब लोग अरब की सेनाओं को रास्ता देने के लिए भाग गए थे ,मगर इज़राइल ने एक कानून पारित किया जिसके अनुसार जो फिलिस्तीनी (अब इज़राइली अरब) नक़बा के दौरान भाग गए थे वो इज़राइल वापस नहीं आ सकते और उनकी जमीनो पर विश्व के सभी हिस्सों से आने वाले यहूदियों को बसाने लगी इज़राइली सरकार ।युद्ध के शुरुवाती कुछ महीनो मे अरब देशो  की सेना इज़राइल पर भारी पड़ रही थी जून 1948 मे एक  युद्ध विराम ने अरबों और इजराइलियो दोनों को पुनः तैयारिया करने का मौका दिया यही अरब देश गलती कर बैठे और इजराइलियों ने तैयारी पूरी की चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से अब युद्ध का पलड़ा इजराइलियों की तरफ झुक गया और अंततः इजराइलियों की विजय और अरबों की इस युद्ध मे हार हुई । इसके साथ साथ शरणार्थी समस्या की शुरुवात ।
इज़राइल फिलिस्तीन का मानचित्र समयानुसर 
1949 मे समझौते से जार्डन और इज़राइल के बीच ग्रीन लाइन नामक सीमा रेखा का निर्धारण हुआ। वेस्ट बैंक(जार्डन नदी के पश्चिमी हिस्से) पर जार्डन और गाजा पट्टी पर मिस्र(इजिप्ट) का कब्जा हो गया । इस पूरे घटनाक्रम मे लगभग 1 लाख फिलिस्तीनी बेघर हुए॥ ये सभी फिलिस्तीनी आस पास के अरब देशो मे जा शरणार्थी के रूप मे जीवन व्यतीत कर रहे थे ॥  इज़राइल को ११ मई ,१९४९  को सयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल  हुई । हलाकी अरब देशो  ने कभी भी इस समझौते को स्थायी शांति समझौते के रूप मे स्वीकार नहीं किया । और दूसरी तरफ इज़राइल भी फिलिस्तीनी  शरणार्थीयों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद इजराइलियों और फिलिस्तीनीयों अरबों के बीच खूनी संघर्ष जारी रहा । सन 1964 मे फिलिस्तीन लिबरेशन के गठन के बाद 1965 मे फिलिस्तीनि क्रांति की शुरुवात हो गयी।फिलिस्तीन लिबरेशन का गठन इज़राइल को खतम करने के उद्देश्य से हुआ था । इधर अमरीका ने अरब मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इज़राइल को हथियारों और आर्थिक मदद देनी शुरू की। जून ५,१९६७ को इजराइल ने मिस्त्र ,जोर्डन सीरिया तथा इराक के खिलाफ युद्ध घोषित किया और ये युद्ध 6 दिनो तक चला इस युद्ध ने अरब जगत के सभी समीकरणों को बदल के रख दिया इज़राइल ने 1947 के यूएन क्षेत्र से कई गुना अधिक भू भाग एवं पर कब्जा कर लिया  और अब गाजा पट्टी पर भी इज़राइली कब्जा था । 6 अक्तूबर 1973 को एक बार फिर सीरिया और मिस्र ने इज़राइल पर हमला किया मगर इसमे भी उन्हे हार का सामना करना पड़ा और भूभाग गंवाना पड़ा ।1974 के अरब अरब शिखर सम्मेलन मे पीएलओ को फिलिस्तीनी लोगो का प्रतिनिधि के रूप मे अधिकृत किया ।  अब संयुक्त राष्ट्र संघ मे फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व पीएलओ के नेता यासर अराफात कर रहे थे । इसके बाद एक तरफ कंप डेविड से लेकर ओस्लो तक शांति समझौते होते रहे तो दूसरी ओर पीएलओ और मोसाद मे खूनी संघर्ष जारी था। मगर इज़राइल और फिलिस्तीन की सीमा का निर्धारण नहीं हुआ ।
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात इज़राइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने. अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया ।अनवर सादात  ने  1977 मे इसराइली संसद में भाषण दिया. सादत ने चुकी इजराइलियो से संधि की अतः अरब चरमपंथियों ने बाद मे उनकी 1981 मे हत्या कर दी। 1987 मे फिलिस्तीनीयों ने मुक्ति के लिए आंदोलन किया और उनका इज़राइली सेनाओं से टकराव शुरू हो गया । 13 सितंबर 1993 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मध्यस्थता मे इज़रायली प्रधानमंत्री यित्साक राबीन और फिलस्तीनी स्वायत्त शासन के अध्यक्ष यासिर अराफत ने नार्वे की राजधानी ओस्लो मे ओस्लो शांति समझौता किया, समझौता के अनुसार इज़राइल 1967 से अपने क़ब्ज़े वाले फिलस्तीनी इलाकों से हटेगा। एक फिलस्तीनी प्रशासन स्थापित किया जाएगा और एक दिन फिलस्तीनियों को एक देश के तौर पर स्वतंत्रता मिलेगी। गाजा पट्टी के फिलिस्तीन के कब्जे मे आते ही हमास की हिंसक गतिविधियां और तेज हो गयी और उसी अनुपात मे इज़राइली प्रतिरोध । ओस्लो समझौते से जिस अरब इज़राइल संघर्ष पर विराम लगता प्रतीत हुआ समस्या पुनः वही आ के खड़ी  हो गयी॥ समय समय पर हमास द्वारा इज़राइल पर गाजा पट्टी से हमले किए जाते रहते हैं और इज़राइल के लिए अपने नागरिकों की  आत्मरक्षा के लिए बार बार युद्ध ॥॥इजरायल हर हमले के बाद कहता है की वो हमास को निशाना बना रहा है लेकिन अरब  देश इन हमलो मे आम मुसलमानो के मारे जाने की बात कहते हैं॥   इस्लाम यहूदी और ईसाई धर्म के उत्पत्ति काल से जुड़ी हुई ये समस्या अरब और पश्चिमी जगत के  सामरिक हितो के कारण और भी जटिल होती जा रही है आज भी लाखो फिलिस्तीनी शरणार्थी घर वापसी की रह देख रहे हैं तो दूसरी ओर इज़राइल हमास के हमलो से निपट रहा है। 
गाजा पट्टी पर इज़राइली बमबारी का एक दृश्य 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)

हम अक्सर अरब इज़राईल और इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के बारे मे सुनते रहते हैं। अभी हाल  के दिनो मे भी दोनों देश के मध्य हुए  भयानक युद्ध के कारण जानमाल की काफी क्षति दोनों पक्षो को उठानी पड़ी॥ इस विवाद के मूल मे जाए तो इस विवाद की शुरुवात 19वी शताब्दी के अंत मे प्रखर होते अरब राष्ट्रवाद और यहूदी राष्ट्रवाद मे है।
यहूदी धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म से पूर्व का धर्म है । इनकी धार्मिक पुस्तक को ओल्ड टेस्टामेण्ट कहते हैं,जिसे बाइबिल का प्रथम भाग  या पूर्वार्ध भी कहते हैं।" पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम), जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे उन्हे इस धर्म का प्रवर्तक कहा जाता है  । पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। हजरत अलै. याकूब का एक नाम इजरायल भी था,जिसके नाम पर आज का यहूदी राष्ट्र इजरायल है । हजरत अलै. याकूब के एक पुत्र का नाम जूदा या यहूदा था यहूदा के नाम पर ही इसके वंशज यहूदी कहलाए । अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहम, अब्राहम से मूसा, यहाँ तक ईसाई इस्लाम और यहूदी सभी धर्मो के पैगंबर एक ही है
मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह को अब्राहम का वंशज मान कर एक समुदाय ने ईसाई धर्म को मानना शुरू किया जबकि बाइबिल के ओल्ड टेस्टमेंट को मानने वालों ने ईसा मसीह  को ईश्वर का पुत्र स्वीकार नहीं किया और वो अब तक अपने मसीहा के अवतार के इंतजार मे है। ओल्ड टेस्टामेण्ट मे कही भी ये स्पष्ट नहीं है की ईश्वर का मसीहा कब अवतरित होगा। इस्लाम की तरह ये एकेश्वरवाद मे विश्वास रखते हैं । मूर्ति पूजा के विरोधी यहूदी खतने पर भी इस्लाम के साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं।
4000 साल पुराने यहूदी धर्म का आधिपत्य मिस्र,इराक, इजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। धीरे धीरे यहूदी भी इज़राइल और जुड़ाया कबीलो मे बट गए ये लोग फारसी यूनानी और ग्रीक कई शासनो के अधीन रहे। रोमन साम्राज्य के बाद जब ईसाई धर्म का उदय हुआ तो यहूदियो पर अत्याचार शुरू हो गए॥ इस्लाम के उदय के बाद इन पर अत्याचार का बढ़ाना  स्वाभाविक था। धीरे धीरे यहूदियों के हाथ  से उनका देश इज़राइल जाता रहा और प्राचीन काल से 20वी शदी तक यहूदियों पर जितने अत्याचार हुए हैं शायद ही किसी जाति पर हुआ हो ॥हिटलर की यहूदियों से दुश्मनी और लाखों यहूदियों की सामूहिक नर संहार इसी कड़ी का उदाहरण है। आज भी पूरा अरब जगत इज़राइल का नामोनिशान मिटा देना चाहता है ।
निरंतर होते अत्याचारो के कारण यूरोप के कई हिस्सों मे रहने वाले यहूदी विस्थापित हो कर फिलिस्तीन आने लगे। 19वी शताब्दी के  के अंत तक यहूदी मातृभूमि (Jewish Homeland") इज़राइल  की मांग जोरों शोरों से उठने लगी ।यहूदियों ने  फिलिस्तीन के अंदर एक अलग राज्य यहूदी मातृभूमि  की मांग की जो जर्मनी या तुर्की के अधीन हो । उन्होने उस समय फिलिस्तीन की मुसलमान जनसंख्या को नजरंदाज कर दिया । यहूदियों का ये सोचना की मुसलमान जनसंख्या यहूदी मातृभूमि की मांग स्वीकार होने के बाद आस पास के अरब देशो मे चली जाएगी ,इस विवाद की नीव मे था ।  यहूदियों ने उस फिलिस्तीन की कल्पना की जिसमे यूरोप से आए हुए लाखो यहूदी निर्णायक बहुमत मे होंगे । प्रथम जियोनिस्ट कांग्रेस की बैठक स्विट्जर लैंड मे हुआ और वहाँ World Zionist Organization (WZO). की स्थापना की गयी । तमाम बैठको और वार्तालापों के बाद 1906 मे विश्व यहूदी संगठन (WZO) ने फिलिस्तीन मे यहूदी मातृभूमि बनाने का निर्णय लिया ।इससे पूर्व अर्जेन्टीना को यहूदी मातृभूमि बनाने को लेकर भी चर्चा हुई थी।
यहूदियों की ये यहूदी मातृभूमि  की कल्पना फिलिस्तीन की बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या के कारण एक कभी न खत्म होने वाले विवाद का कारण बन रही थी 1914 तक फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या लगभग 7 लाख थी जिसमे 6 लाख अरब मूस्लिम थे और लगभग 1 लाख यहूदी । प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने जर्मनी आस्ट्रिया और हंगरी के साथ मित्र सेनाओं (जिनमे ब्रिटेन भी शामिल था) के विरोध मे  गठबंधन कर लिया। उस समय फिलिस्तीन पर तुर्की सेना का शासन था । इस युद्ध से अरबों और यहूदियों दोनों का भरी नुकसान हो रहा था उसी समय तुर्की के सैनिक शासन ने फिलिस्तीन से उन सभी यहूदियों को खदेड़ना शुरू किया जो रूस और यूरोप के अन्य देशो से आए हुए थे । इसी समय ब्रिटेन ने  अरब और फिलिस्तीन को तुर्की शासन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्धता जताई बशर्ते अरब देश और फिलिस्तीन तुर्की के विरोध मे मित्र सेनाओं का साथ दे।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने एक गुप्त समझौते  जिसे Sykes-Picot Agreement भी कहते है के अंतरगत  पूरे अरब जगत को दो "प्रभाव क्षेत्रों" मे बाट दिया गया जिसमे रूस की भी स्वीकृति थी । इसके अंतरगत सीरिया और लेबनान फ्रांस के प्रभाव क्षेत्र मे जॉर्डन इराक और फिलिस्तीन ब्रिटेन के क्षेत्र मे और फिलिस्तीन का कुछ क्षेत्र मित्र देशो की संयुक्त सरकार  के क्षेत्र मे था । रूस को  लिए इस्तांबुल, तुर्की और अर्मेनिया का कुछ इलाका मिल गया ।
ब्रिटेन को यूएन जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन और यहूदी मातृभूमि का क्षेत्र  
सन 1917 मे  ब्रिटेन के विदेश सचिव लार्ड बेलफोर और यहूदी नेता लार्ड रोथसचाइल्ड के बीच एक पत्रव्यवहार हुआ जिसमे लार्ड बेलफोर ने ब्रिटेन की ओर से ये आश्वासन दिया था की फिलिस्तीन को यदियों की मातृभूमि के रूप मे बनाने के लिए वो अपना सम्पूर्ण प्रयास करेंगे हालाँकि जनसंख्या के हिसाब से फिलिस्तीन मे  मुसलमान आबादी उस समय फिलिस्तीन की कुल आबादी की तीन चौथाई से भी ज्यादा थी। इस पत्रव्यवहार को बाद मे “The Balfour declaration”. का नाम दिया गया। मगर अब फिलिस्तीन मुस्लिमो ने "Balfour declaration" का विरोध करना शुरू किया।15 अप्रैल सन 1920 को इटली मे हुए San Remo Conference(सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे मित्र देशो ने अमरीका ने फिलिस्तीन के लिए ब्रिटेन को अस्थायी जनादेश  दिया समझौते के अनुसार ब्रिटेन जो की फिलिस्तीन का प्रशासन देखेगा वो फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि के रूप मे विकसित करने के लिए राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाएगा। 

इस जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदी हितो को देखने वाली अजेंसी "The Jewish Agency for Palestine,"  से ब्रिटेन का प्रशासन सामंजस्य बना के यहूदी हितों एवं उनके पुनर्वास को आसान करेगा। सन 1920 मे ही ब्रिटेन ने सर हरबर्ट सैमुएल को ब्रिटेन  के फिलिस्तीन कमे पहले  उच्चायुक्त के रूप मे भेजा। (सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे जो क्षेत्र यहूदी मातृभूमि के लिए निर्धारित किया गया था वो यहूदी संगठनो की मांग की अपेक्षा काफी बड़ा क्षेत्र था । ये बात भी काही जाने लगी की ये निर्धारण चर्च ने किया और कही कही ऐसे भी विचार रखे गए की ब्रिटेन के पास यहूदी मातृभूमि के लिए कोई सुदृढ़ खाका नहीं था।
सन 1922 मे ब्रिटेन ने जनादेश  वाले हिस्से को दो हिस्सों मे बाट दिया पहला हिस्सा जो अपेक्षाकृत बड़ा था वो ट्रांसजार्डन(बाद मे जार्डन) कहा गया और छोटा हिस्सा फिलिस्तीन कहा गया। दोनों हिस्से ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र मे ही थे । बाद मे जार्डन को एक स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता मिल गयी । मगर इसके साथ यहूदियों का एक बड़ा हिस्सा इसे अपने साथ किए गए विश्वासघात के रूप मे देखने लगा क्यूकी  प्रस्तावित यहूदी मातृभूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा ट्रांसजार्डन के रूप मे उनके हाथ से निकाल चुका था ।
ट्रांसजार्डन अलग करने के बाद बचा क्षेत्र 
अब जैसा की मित्रदेशों का ब्रिटेन को जनादेश था फिलिस्तीन मे एक स्थानीय और स्वशासनीय सरकार का प्रबंध मगर यहूदी ऐसे किसी भी स्वशासनीय सरकार  के प्रबंध से डरे हुए थे क्यूकी इसमे जनसंख्या के अनुपात से अरबों की  बहुलता हो जाती दूसरी तरफ अरबों को कोई भी ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं थी जिसमे यहूदियों की कोई भी भागीदारी हो। अतः किसी भी प्रकार की व्यवस्था नहीं बन पायी॥ 

अब धीरे धीरे अरबों और यहूदियों मे टकराव शुरू हो गया और दंगे होने लगे । अरबों के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदियों के विश्व के अन्य हिस्सो से आ के बसने  के कारण फिलिस्तीनी अरबों को निर्वासित होना पड़ेगा । नाजियों से पहले भी पोलैंड और पूर्वी यूरोप के कई भागो से यहूदी फिलिस्तीन आने लगे हिटलर के नाजी शासन मे यहूदी एजेंसियों ने हिटलर से एक समझौता कर हजारो लोगो को फिलस्तीन मे बसाकर उनकी जान बचाई। सन 1936 मे अरबों ने विद्रोह  कर दिया। विद्रोह का कारण ब्रिटेन के फौजों द्वारा  एक मुस्लिम धर्मगुरु की हत्या थी जो फिलिस्तीन मे यहूदियों और ब्रिटेन के खिलाफ झण्डा उठाए हुए था। इस विद्रोह मे हजारो अरब और यहूदी मारे गए। इस विद्रोह को हवा देने मे यहूदियों का कट्टर दुश्मन हिटलर और इटली के फासिस्ट शामिल थे । इसके बाद इंग्लैंड ने एक प्रस्ताव रखा जिसमे एक  यहूदी मातृभूमि दूसरा फिलिस्तीनी अरबों का क्षेत्र होगा इसे अरब देशो ने नकार दिया ॥
गाजा पर बमबारी का एक दृश्य 

अगले लेख मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा इज़राइल फिलिस्तीन का विभाजन ,गजापट्टी का स्थानातरण और फिलिस्तीन इज़राइल के मध्य हुए कई समझौते एवं कभी न खतम होने वाले युद्ध का वर्णन 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी




आज सुबह अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गयी ॥ सभी हिंदुस्थानियों के लिए खुशी की मगर अप्रत्याशित खबर और पिछले 8 साल के कांग्रेस शासन की सबसे अप्रत्याशित खबर । हालांकि  मुंबई पर हमलावर के लिए ये सजा कोई अप्रत्याशित नहीं थी मगर अप्रत्याशित है फाँसी देने का समय । गुजरात चुनावों मे 1 महीने का भी समय नहीं बचा है । और ये बात पूरी तरह से काही जा सकती है की कहीं न कहीं कांग्रेस सरकार के नीति निर्धारक अफजल और कसाब के मुद्दे पर चुनावो से पहले हाथ डालकर कोई नया प्रयोग नहीं करना चाहते होंगे।  इसलिए भी फाँसी की टाइमिंग पर सवाल उठने लाज़मी है । कुछ दिनो पहले खबर आई थी की कसाब को डेंगू है ।दबे जबान मे ये बाते भी उठने लगी है कसाब डेंगू से मरा सरकार ने इज्जत बचाने के उद्देश्य से आनन फानन मे इसे फाँसी मे तब्दील कर दिया । कुछ विचारणीय है की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री  के अनुसार कसाब को यरवडा जेल में ही दफना दिया गया मगर जेल मैन्युएल के अनुसार उस धर्म का कोई धर्मगुरु फाँसी देने के बाद अंतिम क्रिया के समय उपस्थित रहना चाहिए ध्यान रहे ओसामा को दफनाने की खबर मे भी ये ध्यान रखा गया था मगर भारत सरकार की जल्दी का कारण क्या था ? फाँसी की सजा की रेकार्डिंग(फाँसी होने के पूर्व तक की) या कोई अन्य साक्ष्य भी जारी नहीं किए गए जिससे पता चले की कसाब को फाँसी ही हुई है ।। इन सारे सवालो से बचने के लिए सरकार को कसाब के फाँसी के पहले तक की रेकार्डिंग सार्वजनिक करनी चाहिए ।जो कांग्रेस अफजल गुरु की फाँसी पर चीख चीख कर बोलती थी की राष्ट्रपति के पास फाँसी की  दया याचिका क्रमानुसार भेजी जाएगी इसलिए अफजल को अभी फाँसी नहीं दे सकते उसी कांग्रेसी गृहमंत्रालय ने अचानक 17वें नंबर के कसाब को पहले नंबर पर क्यू रखा?? इधर कसाब का वकील ने प्रश्न उठाया है जी इसकी जानकारी उसे नहीं दी गयी॥ ऐसे सारे कई प्रश्न है जिसका जबाब आने वाले भविष्य मे कांग्रेस सरकार को देना पड़ेगा ।
प्रश्न ये भी है की सिर्फ कसाब की फाँसी ही काफी है मुंबई के गुनहगारो को सजा देने के लिए । कसाब एक  मोहरा था आईएसआई और उसके गुर्गों का ॥बाकी मास्टरमाइंड पर कोई कार्यवाही करने मे भारत सरकार सफल होगी या डोजीयर के आदान प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री कर लेगी । एक ओर जहां इज़राइल जैसा छोटा सा देश घर मे घुसकर हर कीमत पर अपने नागरिकों की हत्या का बदला लेता है हमारी कांग्रेस सरकार पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के साथ ट्वेन्टी ट्वेन्टी खेलने मे व्यस्त है ॥
यदि ये तथकथित फाँसी सही मान भी ली जाए तो इसे कांग्रेस की इच्छाशक्ति से ज्यादा मजबूरी कहा जा सकता है ,वैसे भी सरकार की साख गिर रही है 26/11 की चौथी बरसी से पहले कसाब को लटकाकर कांग्रेस अपने बिखरते हुए अस्तित्व को बचाने का एक आखिरी प्रयास कर रही है ॥
 हम ये कैसे भूल सकते हैं की जिन शहीदो ने अपनी जान दे कर भारतीय संसद और संसद के कर्णधारो की रक्षा की थी उनकी हत्या करने वाला अफजल अब भी जेल मे मजे से बिरयानी का आनंद ले रहा है और पिछले कई सालो से कांग्रेस ने मुस्लिम वोटो की खातिर उसे खुलेआम संरक्षण दे रखा है । इस तथाकथित फाँसी के घटनाक्रम से अब पाकिस्तान मे हिंदुस्थानी कैदी “सरबजीत सिंह” को जल्द से जल्द फाँसी देने की मांग उठने लगेगी और इसमे संदेह नहीं की पाकिस्तान अपनी जन्मजात मक्कारी दिखते हुए सरबजीत को फाँसी दे कर कसाब की फाँसी का जबाब दे ।
बहरहाल डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी का ये समय  मुंबई हमलो मे बलिदान हुए लोगो और उनके परिवार वालों समेत समस्त हिंदुस्थानियों को शांति और खुशी देने वाला है और दिग्विजय सिंह जैसे नेता के मुह पर एक करारा तमाचा जिसके अनुसार इन हमलो मे आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी  संगठन का हाथ था ॥

जय श्री राम

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

विकल्प सेवा संस्थान-Vikalp Sewa Sansthan : वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण

विकल्प सेवा संस्थान-Vikalp Sewa Sansthan : वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण
ॐ ,
पूर्ण इतिहास अबलोकन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है भारत स्वर्णिम भबिश्य को बचाने के लिए उस समय श्री नाथू राम गोड से जी के लिए ऐसी दुस्त्तात्मा का अंतर्ध्यान करना मज़बूरी थी ,अगर ऐसा नहीं करता तो आज भारत,भारत न होकर इस्लामिस्थान होता ,उनके एबम उनके चेले की करतूतों की बजह से भारत ,भारत न बन क्र इंडिया बना हुआ है और ये काले अंग्रेज(कांग्रेसी लुट-खाशोत क्र भारत में सर्वत्र त्राहि-त्राहि मचाने में आज भी अग्रसर है इनका अंतर्ध्यान होना ही देश हितार्थ हो सकता है |
वन्देमातरम/
जय हिन्द .

सोमवार, 27 अगस्त 2012

बेटी बचाओ अभियान में जोड़ें एक नया अध्याय


कितना तड़पी होगी वो! क्या वो इसका मतलब भी समझती होगी? मानसिक एवं शारीरिक रूप से शोषित होती यह बच्ची, जब माँ बनने के अर्थ को समझ आने की अवस्था में होगी, तब उस सुंदर अहसास से परे घृणित भाव से भरी होगी और घिरी होगी प्रश्नों के जंजाल में कि क्यों उसके माता-पिता ने ही उसके विश्वास को तार-तार किया? क्यों नहीं कर पाये वे उसकी रक्षा? क्यों ईश्वर उसकी किस्मत लिखते समय इतना निष्ठुर हो गया? कहाँ रहा नौ महीने ‘लड़कियों का रक्षक समाज’? क्या उसकी पीड़ा की चीख़ किसी के कानों में नहीं पड़ी? क्या इतने दिन किसी की दृष्टि उसके उभारों से प्रश्न न कर सकी? क्या किसी के मन में उसके लिए करूणा नहीं उमड़ी? यहाँ तक कि उसके अपने माँ-बाप के मन में भी नही! वह तेरह वर्ष की उम्र में एक बच्ची की माँ बन गई। अभी तो वह खुद माँ की गोद में सिर रख दुलार के हाथ की प्रतीक्षा कर रही थी कि स्वयं उसकी गोद से किलकारियों की आवाजें आने लगी! कौन है इसका जिम्मेदार? वे जो उसके संरक्षक हैं या वह जो अपने हसरतें पूरी कर चला गया? क्या एक बार भी उन बाल अंगों पर तरस नहीं आया उसे? अब क्या? क्या अब उस मासूम को उन हाथों की कठपुतली बनने के लिए छोड़ देना चाहिये? क्या उनके साथ उसका व उसकी बच्ची का भविष्य सुरक्षित है? क्या गारंटी है कि भविष्य में वह बच्ची व उसकी बच्ची उन संरक्षकों के लिए कमाई का साधन नहीं बनेगी? क्या आयेगा कोई उन दोनों की रक्षा के लिए? और इन सबके साथ-साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न-चिन्हः आखि़र कब तक चलेंगी ये कहानियाँ? और कितनी लम्बी होगी यह कतार? ज़रा कचौटिये अपनी मृत भावनाओं को, शायद कोई हल निकल आये और बचपन की मीठी यादें ज़हरीले भाग्य से मुक्त हो जायें।

शुक्रवार, 29 जून 2012

भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र !

प्रिय राष्ट्र प्रेमियों -
एक वो समय था जब गाय माँ की रक्षा के लिये 1857 ईश्वी में क्रांति हो गई थी और हमारे पूर्वजों ने 4 लाख गद्दारों व अंग्रेजों को काट डाला था, ओर एक समय ये है जब 3500 हजार कत्लखानों में रोज माँ को काटा जा रहा है और हम तथाकथित अहिंसा व सेक्यूलरिज्म की आड़ में नपुंसकता की चादर ओढ़े घरों में दुबके बैठे है। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से 'गौ मांस खाना मेरा मौलिक अधिकार है' कहने का दुश्साहस करती है, किन्तु देश में उसके खिलाप कोई सशक्त प्रतिक्रिया नहीं आती, कारण भारत के नेतृत्व का भारतीयता विरोधी छद्म सेक्यूलरों के हाथों में होना, इनके द्वारा नित्य प्रति भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने के कुचक्र रचे जा रहे है। देश की सीमाओं, संस्कृति, पुरातन धरोहर, हमारी शिक्षा पद्धति, हमारे मंदिर, साधु - सन्यासी, हमारी परंपराओं एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान पर सदैव सुनियोजित रीति से बहु - आयामी आक्रमण किये जा रहे है। हमारा देश छद्म सेक्यूलर नेताओं के कारण भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है।
भारत में छद्म सेक्यूलरिज्म की संगठित शुरूआत 20 अगस्त 1920 को मोहनदास गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के नाम से खिलापत आंदोलन (अरबपंथी कट्टर जेहादियों द्वारा तुर्की के खलीपा के समर्थन में चलाया गया एक विशुद्ध साम्प्रदायिक आंदोलन, जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई संबंध नहीं था।) को अपना नेतृत्व प्रदान करने से हुई। गांधी के शब्दों में - मुसलमानों के लिए स्वराज्य का अर्थ है - जो होना ही चाहिए खिलापत की समस्या के लिए भारत की क्षमता का, प्रभाव पूर्ण व्यवहार, इस दृष्टिकोण के साथ सहानुभूति न रखना एकदम असंभव है, खिलापत आंदोलन की पूर्ति के लिए आवश्यक लगने पर मैं स्वराज प्राप्ति की कार्यवाही को सहर्ष स्थगित करने के लिए आग्रह कर दूंगा। जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो अरबपंथी जेहादियों का गुस्सा हिन्दुओं पर उतरा, मोपला में हिन्दुओं की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बड़ा हमला हुआ। हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियों के अपमान हुये। गांधी जो अपनी नीतियों के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे। प्रत्युत यह कहना शुरू कर दिया कि मालाबार में हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बनाया गया। यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रों ने यह स्वीकार किया कि सैकड़ों घटनाऐं हुई है। और उल्टे मोपला मुसलमानों के लिए फंड शुरू कर दिया।
मोहनदास गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआता में हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कुछ साम्प्रदायिक मुसलमान इसे पसंद नहीं करते, तो वे उन्हें खुश करने के लिए हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी (फारसी लिपि में लिखे जाने वाली उर्दू भाषा) का प्रचार करने लगे। बादशाह दशरथ, शहजादा राम, बेगम सीता, मौलवी वशिष्ठ जैसे नामों का प्रयोग होने लगा। सम्प्रदाय विशेष को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी भाषा विद्यालयों में पढ़ाई जाने लगी। इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ, जिसके मूल से ही उन्नीसवीं सदी की सबसे भयानक त्रासदी साम्प्रदायिक आधार पर हिन्दुस्थान का पाकिस्तान और भारत के रूप में विभाजन हुआ, जिसमें लगभग 25 लाख निर्दोष लोगों को अपने प्राण गवाने पड़े।
14 - 15 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में हिन्दुस्थान विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था कि गांधी ने वहां पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन कराया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं कहा था कि देश का बटवारा उनकी लाश पर होगा। देश का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन हुआ, मुसलमानों का पाकिस्तान और हिन्दुओं का भारत, तो जिन्ना ने सम्पूर्ण साम्प्रदायिक जनसंख्या के स्थानांतरण की बात रखी, जिसे गांधी और नेहरू ने अस्वीकार कर दिया। नास्तिक नेहरू ने हिन्दू विद्वेषवश भारत को हिन्दू राष्ट्र न बनाकर सेक्यूलर राष्ट्र बना दिया। विभाजन के पश्चात भारत में कुल 3 करोड़ मुस्लिम जनसंख्या थी, जो आज बढ़कर 23 करोड़ हो गयी है, दूसरी ओर पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या 21 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 1.4 प्रतिशत रह गयी है। तुर्क और मुगलों की प्रापर्टी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए वफ्फ तैयार किया गया और और उनको पाकिस्तान में प्रापर्टी वफ्फ के द्वारा सौपी गयी और कमी समझने पर उनकी जमीन का पेमेन्ट भी किया गया। मुसलमानों के हिस्से की जमीन पाकिस्तान में चली गयी और वफ्फ के द्वारा मुसलमानों को सभी सुविधाऐं दी गयी, परन्तु पाकिस्तान से भारत आने वाले हिन्दुओं के लिये कुछ नहीं किया गया। आखिर ऐसा विद्वेष हिन्दुओं के साथ क्यों किया गया और यह विद्वेष आज भी जारी क्यों है ! जो मुसलमान पाकिस्तान चले गये उनकी संपत्ति की खातिर सरकार फिर ऐसा कानून बनाना चाहती है कि वह संपत्ति उन पर पहुँच जाये। मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुस्लिमों के लिए अलग होता था, आज भी वह नियम लागू है, जब कोई हिन्दू मेला या तीर्थयात्रा होती है तो टैक्स या किराया बढ़ा दिया जाता है और मुसलमानों को हज यात्रा में आर्थिक अनुदान दिया जाता है। छात्रवृत्ति, बैंक लोन, शिक्षा, रोजगार आदि क्षेत्रों में सम्प्रदायिक तुष्टिकरण व मजहबी आरक्षण की भेदभाव पूर्ण नीति अपनायी जाती है। इसपर स्वयं भारत का सुप्रीम कोर्ट सभी भारतीय नागरिकों के लिए समान कानून बनाने का सुझाव दे चुका है तथा साम्प्रदायिक समुदायों के पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं करने पर केन्द्र सरकार को लताड़ चुका है। लेकिन फिर भी भारत का छद्म सेक्यूलर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के समस्त संसाधनों पर पहला अधिकार एक सम्प्रदाय विशेष (मुसलमानों) का बताता है। साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने के लिए कट्टर साम्प्रदायिक चरित्र वाले व्यक्तियों की सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद गठित कर सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण विधेयक 2011 बनाया जाता है तो कभी राजिन्द्र सच्चर के नेतृत्व में कमेटी गठित कर मुसलमानों के लिए विशेषाधिकार की बात की जाती है।लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान कहते है कि असली प्रजातंत्र हम जब समझेगें जब देश का प्रधानमंत्री मुसलमान होगा। हैदराबाद का एक विधायक मौलाना ओवैसी दुर्गा मंदिर में बजने वाले घण्टे को गैर इस्लामी बताकर प्रतिबंधित कराने का प्रयास करता है, तो बरेली की खचाखच भरी एक चुनावी सभा में एक मौलवी सार्वजनिक रूप से कहता है कि शहजिल इस्लाम (प्रत्यासी) को वोट देकर इतना मजबूत कर दो कि वो गैर मुस्लिम का सिर कलम कर सके। चुनाव जितने पर विधायक शहजिल इस्लाम ओसामा बिन लादेन को आतंकी नहीं जेहादी बताता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार पहले तलवार के बल पर कत्ले आम मचाकर नंगा नाच होता था, मतांतरण कराया जाता था, कच्चे चमड़े के बोरों में जीवित लोगों को ठूँस - ठूँस भरकर सीलकर तडफते हुये मरने के लिये डाल दिया जाता था, नारियों का शील भंग किया जाता था, इन जेहादियों के आतंक से कन्याओं की भ्रुण हत्या कर दी जाती थी तथा नारियाँ सामूहिक रूप से एकत्र होकर अग्नि में प्राण गवाँ देती थी, जैसे मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुसलमानों के लिए अलग थे आज भी वो प्रक्रिया जारी है । जब हकीकत को मौत की सजा सुनाई गई तो हकीकत ने कहा अगर यह बोलने पर मैं दोषी हूँ तो मेरे से पहले यह मुस्लिम बच्चे दोषी है , जिन्होनें दुर्गा माता के लिए यह शब्द कहे थे मैंने तो केवल उनके शब्द दोहराये है। मुसलमान सेक्यूलरिज्म को नहीं मानता है और सरकार सेक्यूलरिज्म को मानती है तो मजहब (आधुनिक शब्दों में धर्म) के नाम पर आरक्षण क्यों देती है। सरकार में बैठे हुये व्यक्ति मजहब के आधार पर आतंकवादियों की मदद क्यों करते है। बाटला हाऊस में इस्पेक्टर शर्मा आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो जाते है, इस्पेक्टर शर्मा के बलिदान को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उल्टा कांग्रेस का महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जिले के सरजूपुर ग्राम में आतंकवादियों के घर जाकर मुठभेड़ को फर्जी बताता है और उनका उत्साहवर्धन करता है कि हम स्पेशल अदालत बैठाकर आपके बच्चों को न्याय दिलायेगे। हापुड़ के पास मंसूरी ग्राम में आतंकवादियों की सूचना मिलने पर पुलिस छापा मारती है तो एक आतंकवादी उसी समय गाडी में बैठकर आता है तो गाडी ड्राइवर व मकान मालिक को भी पुलिस हिरासत में ले लेती है तो सेक्यूलर नेता चिल्लाते है कि मानव अधिकार का हनन हो रहा है। इसी प्रकार एक दरगाह में 40 आतंकवादी थे तो सरकार कहती है दरगाह पर हमला मत करना और मौका पाकर आतंकवादी फरार हो जाते है, स्वर्ण मंदिर को तो तहस नहस कर सकती है सरकार लेकिन दरगाह में आतंकवादी पाकर हमली नहीं कर सकती। जामा मस्जिद का इमाम कहता है कि मैं आई एस आई का एजेन्ट हूँ सरकार में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करे। एक योगगुरू काले धन के लिए शांतिपूर्वक अनशन करता है तो सरकार सोते हुये बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गो पर घिनौने तरीके से बल प्रयोग करती है। हिन्दू साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कोई पुष्ट प्रमाण न मिलने पर भी अमानवीय यातनाऐ दी जाती है और आतंकवादियों को बिरयानी खिलायी जाती है, जामा मस्जिद के इमाम के नाम पर गर्दन नीची कर ली जी जाती है। 
सरकार की भारत विरोधी मानसिकता देखिये भारतीय नगरों के नाम अरब साम्राज्यवादी आक्रांताओं के नाम पर रखे गये, भारतीय महापुरूषों को हाशिये पर फेंक दिया गया, देखिये विजयनगर हिन्दू राज्य था उसका नाम बदलकर सिकंदराबाद रख दिया गया। महाराणी कर्णावती के नाम से नगर का नाम कर्णावती रखा गया परन्तु इसका नाम बदलकर क्रुर आतंकी के नाम पर अहमदाबाद रख दिया गया और अकबर ने प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद रख दिया और साकेतनगर जो राम के राज्य से नाम था उसे बदलकर फैजाबाद कर दिया गया, शिवाजी नगर का नाम बदलकर आतंकी औरंगजेब के नाम पर औरंगाबाद कर दिया गया, लक्ष्मीनगर का नाम बदलकर नबाब मुजफ्फर अली के नाम पर मुजफ्फरनगर रख दिया, भटनेरनगर का नाम गाजियाबाद रख दिया, इंद्रप्रस्थ का नाम दिल्ली रख दिया गया। इसी प्रकार आज भी हमारे उपनगरों व रोडों के नाम आतंकवादियों के नाम पर रखे जा रहे है, तुगलक रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड, आसफ अली रोड, शाहजहाँ मार्ग, जहागीर मार्ग, लार्ड मिन्टो रोड, लारेन्स रोड, डलहोजी रोड आदि - आदि। जरा विचार करो, नीच किस्म के आतंकवादियों के नामों का इस प्रकार से भारत पर जबरदस्ती थोपा जाना एक षडयन्त्र है नहीं है क्या, यह वैचारिक गुलामी का प्रतिक है। अयोध्या के श्री राम मंदिर को विश्व जानता है कि यहां राम का जन्म हुआ और उसका भव्य मंदिर था, एक अरबपंथी लुटेरा जेहादी सेना लेकर आया उसने लूट मचाई, भारतीय स्वाभिमान को नीचा दिखाने के लिए उसने मंदिर को तोड दिया, लुटेरा भी चला गया और देश का एक भाग भी चला गया, परन्तु फिर भी मुकदमा भारतीय स्वाभिमान के प्रतिक श्रीराम और एक लुटेरे के बीच में ? कैसी है यह आजादी ! 
आज भारतीयों की मानसिकता देखकर मुझे दुःख होता है और मैं विचार करता हूँ कि जब आर्य महान थे तो उनकी संतान इतनी निकृष्ट कैसे हो गई। जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर कुछ संकिर्ण विचारधारा के व्यक्ति आपत्ति जताते है तो तुरंत वंदे मातरम् गायन को स्वैच्छिक कर दिया जाता है और राष्ट्रगान जन गन मन जो जार्ज पंचम का स्वागत गीत था, उस पर कोई आपत्ति नहीं सुनी जाती। इसी प्रकार भारत माता व हिन्दू देवी - देवताओं की मूर्तियां बनाकर भारतीयता को अपमानित करने वाले को सहयोग और उसके खिलाप बोलने वालों पर मुकदमे। आज भारतीय हिन्दू समाज के छद्म सेक्यूलर नेता तात्कालिक लाभ के लिए देश को गद्दारों के हवाले करने का काम कर रहे है। भारत के सात राज्यों में तो हिन्दू अल्पसंख्य हो ही चुका है, अब सम्पूर्ण भारत की बारी है। हे भारत वंशियों अभी भी समय है चेत जाओं, वरना आने वाले समय में तुमको भयंकर यातनाओं का शिकार होना पडेगा और तुम्हारी बहन - बेटियों को जेहादी विधर्मीयों की रखैल बनकर रहना पडेगा, इसका इतिहास साक्षी है। 
- विश्वजीत सिंह ' अनंत ' 
वन्दे मातरम् 
जय माँ भारती ।

सोमवार, 14 मई 2012

महाभारत ,गाय और राजा रन्तिदेव :एक और इस्लामिक कम्युनिस्ट कुटिलता


कुछ लोग हमारी गौ माता को यह तर्क देकर काटते है की हिन्दू धर्म मे ही इस सब को मान्यता प्रदान की गयी है पर हमारे प्रिय मित्र श्री अंकित पांडे जी द्वारा लिखित यह प्रयास  तमाचा है उन लोगों के मुंह पर जो की गौ हत्या की वकालत करते हैं धर्म हमारे महान भारत देश का प्राणभूत तत्व रहा है और इसीलिए भारत के शत्रुओं ने बार बार हिन्दू धर्म पर प्रहार किया है और इसी कड़ी कुछ लोग यह हास्यास्पद बात कह रहे हैं की भारत में पुराने समय में गौ-मांस खाया जाता था और वो महाभारत के राजा रान्तिदेव को गौ हत्या करने वाला सिद्ध करने का मुर्खतापूर्ण परन्तु कुटिल प्रयत्न करते हैं |सबसे पहले तो देखे की महाभारत की रचना किसने की और इसे किसने लिखा था |महाभारत के श्लोक वेदव्यास रचित हैं और उन्हें श्री गणेश ने स्वयं लिपिबद्ध किया है | लेखन कार्य प्रारंभ होने से पहले श्री गणेश के यह शर्त रखी थी की मेरी लेखनी रुकनी नहीं चाहिए और वेदव्यास ने शर्त राखी थी की आप बिना समझे हुए कुछ नहीं लिखेंगे और इसके बाद व्यास जी ने जटिल और गूढ़ शब्दों का प्रयोग किया था |महाभारत के सम्बन्ध में स्वयं भगवन श्रीकृष्ण कहते हैं की "इसमें ८८८०  श्लोक हैं जिनका अर्थ मैं जनता हूँ , सूत जी जानते हैं और संजय जानते हैं या नहीं ये मैं नहीं जनता .."| अब आप स्वयं ही सोचये की जिनके अर्थ को संजय जानते हाँ या नहीं इसमें संशय है वो क्या इतने सीधे होंगे की उनकी गूढता और प्रसंग का विचार किये बिना केवल शाब्दिक अर्थ (वो भी व्याकरण को छोड़कर) ले लिया जाय ?अब देखते हैं महाभारत के वनपर्व के वो श्लोक जिसके आधार पर राजा रंतिदेव को गोहयता करने वाला कहा जाता है -
 राज्ञो महानसे पूर्वं रंतिदेवस्य वै द्विज |
द्वे सहस्त्रे तु वध्येते पशुनंन्वहनं तदा |
अहन्यहनि वध्येते द्वे सहस्त्रे गवां तथा ||
हास्यास्पद कम्युनिस्ट - इस्लामिक अर्थ- रान्तिदेव नामक एक राज प्रतिदिन  लोगों  को मान्स  बांटने के लिए दोहजर पशुओं और दो हजार गायों की हत्या करता था |

व्याकरणगत अशुद्धि - 
 इस श्लोक में 'वध्येते'" का अर्थ मारना लिया गया है जो की संस्कृत व्याकरण के अनुसार पूर्णतयः अशुद्ध है क्यूँकी संस्कृत में 'वध' धातु स्वतन्त्र है ही नहीं जिसका अर्थ 'मारना' हो सके ,मरने के अर्थ में तो 'हन्' धातु का प्रयोग होता है |पाणिनि का सूत्र है "हनी वध लिङ् लिङु च " इस सूत्र में  कर्तः हन् धातु को वध का आदेश होता है अर्थात वध स्वतन्त्र रूप से प्रयोग नही हो सकता है |अतः व्याकरण के आधार पर स्पस्ट है की की ये 'वध्येते ' हिंसा वाले वध के रूप में नहीं हो सकते हैं | तब हंमे यह ढूढ़ना पड़ेगा की इस शब्द का क्या अर्थ है और निश्चय ही ये हत्या वाले 'हिंसा' नहीं अपितु बंधन वाले ' बध बन्धने' धातु है |
इसके अतिरिक्त २ और पंक्तियाँ है जिनके आधार पर राजा रान्तिदेव को गोवध करने वाला , ऐसा सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है -
समांसं ददतो ह्रान्नं रन्तिदेवस्‍य नित्‍यशःअतुला कीर्तिरभवन्‍नृप्‍स्‍य द्विजसत्तम
सदा मान्स सहित भिजन देने वाले राज रान्तिदेव कि अतुलित कीर्ति हुयी |
यहाँ पर 'समांसं'  का अर्थ पशुमंस से युक्त उचित नहीं होगा और कारन आगे बताया जाएगा |पुराने समय में सभी शब्दों के विस्तृत अर्थ हुआ करते थे परन्तु आज उनका अर्थ अत्यंत सीमित हो गया है उदहारणतयः 'मृग' का अर्थ पहले सभी वन्य पशुओं के लिए था जबकि वर्त्तमान में यह केवल 'हिरण' के लिए हैं और वृषभ का अर्थ बैल , अपने विषय में सर्वश्रेष्ठ , तेज गति से चलने वाला , शक्तिशंली इस भांति के १६ अर्थ थे परन्तु आज केवल बैल अर्थ लिया जाता है इसी भांति पुराने समय में मांस का अर्थ पशुमांस के साथ साथ गौउत्पाद  अर्थात दूध , दही भी था परन्तु आज वहग केवल पशुमांस का पर्याय बन कर रह गया है | वर्त्तमान पंक्तियों के सन्दर्भ में , राजा रातीदेव के चरित्र ,पंक्तियों के प्रसंग ,गौ की महत्तता तथा तात्कालिक सामाजिक मान्यताओं के कारन यहाँ पर पशुमांस नहीं अपितु दूध यह अर्थ ही उचित होगा |इसके अतिरिक्त 

आलाभ्यंत शतं गवः सहस्त्राणि च विशन्ति
हिंदुत्व विरोधी आलाभ्यंत का अर्थ हिंसा करते हैं 
इसी भांति महाकवि कालिदास र्षित मेघ दूत में रंतिदेव से सम्बंधित पंक्ति
व्यालाम्बेथः सुरभितानाया - आलम्भ्जाम मनिष्यन 
में आलम्भ्जाम का अर्थ हिंसक कहते हैं |
जबकी इसका अर्थ स्पर्श या प्राप्त है और यह परंपरा रही है की दान देने वाला व्यक्ति दान दी जारी  वास्तु को छूकर दान दे देता  है| आलाभ्यंत शब्द का वेदों अन्य स्थानों पर भी इसी भांति प्रयोग हुआ है यथा -
ब्रहामाने ब्राहमण अलाभ्ते - ज्ञान के लिए ज्ञानी को प्राप्त करता है
क्षत्राय राज्न्यम आलाभ्ते -शौर्य के लिए शूर को प्राप्त करता है


तार्किक असम्भाव्यता -
 

तार्किक रूप से भी पशुओं के वध वाला अर्थ उचित नहीं  लगता है क्यूँकी सर्वप्रथम कभी भी रसोई में पशुओं का वध नहीं किया जाता है | वध स्थल में इतनी अधिक गन्दगी होती है की वहा रसोई से बहुत दूर और यदि संभव हो तो नगर के बाहर  होता है |दूसरी बात हिंदुत्व विरोधी कहते हैं  की मारी गयी गायों के चमड़े से निकले हुए पानी से चर्म्वती नदी बन गयी | एक तो न ही कभी मारे हुए पशुओं का चमडा रसोई में रखा जाता है और न ही गीले चमड़े से निकला हुआ जल इतनी अधिक मात्रा में होता हिया की बहता हुआ दिखाई दे हाँ यदि इसे पशुओं को धोने से बहता हुआ जल कहा जाय तो तर्कसंगत होगा|इसके अतिरिक्त महाभारत में ही सामान प्रसंग में कहा गया है की "रजा रंतिदेव के यज्ञ में प्रेमवश ग्रामो और वनों से पशु स्वयं उपस्थित हो जाते थे "; अब क्या वो अपने वध के लिए आते होंगे ?इसके अतिरिक्त महाभारत में कई स्थानों पर गौ दान के द्वारा कीर्ति प्राप्त होने की बात कही गयी है |


 राजा रान्तिदेव  का चरित्र -
 महाभारत के अनुशासन पर्व के पांच श्लोकों में बहुत से राजाओं के नाम गिनाये गए हैं जिन्होंने कभी मांस नहीं खाया और उसमे राजा रान्तिदेव का भी नाम है | जिस राजा ने कभी मांस न खाया हो क्या उसकी पाकशाला में प्रतिदिन २ हजार पशुओं की हत्या मांस केलिए की जा सकती है ??नारद जी राजा संजय से कहते हैं "संजय !सुना है की संकृति के पुत्र रान्तिदेव भी जीवित न रह सके |उन महामना के दरबार यहाँ दो लाख रसोइये थे जो घर आये हुए अतिथियों को दिन रात  कच्चे और पक्के उत्तम अन्न दिन रात परोसते थे |" , यहाँ पर स्पस्ट है की राजा रान्तिदेव के यहाँ अन्न परोसा जाता था |श्रीमदभगवतमहापुराण के नवे स्कंध में   रजा रंतिदेव की एक कथा आती है की उनको ४८ दिनों तक भूखा रहना पड़ा था |उसके बाद उनको खीर इस्यादी प्राप्त हुआ |जैसे ही वो भोजन करने बैठे एक ब्राहमण आया जिसके भीतर रन्तिदेव ने भगवन को ही देखा और उसका आदर पूर्वक स्वागत किया |जब ब्राहमण खाकर चला गया तब रजा अपने परिवार सहित बचा हुआ भोजन करने के लिए बैठे तभी एक शुद्र अतिथि आ गया| रजा ने उस अतिथि को भी भोजन करवा दिया |जैसे ही शुद्र अतिथि गया एक दूसरा अतिथि कुछ कुत्ते साथ लिए हुए पहुंचा तो रजा रन्तिदेव ने बचा हुआ सम्पूर्ण अन्न दे दिया और भगवन समझ कर प्रणाम किया |अब वे भोजन पकाए हुए बर्तनों का धोवन पानी सकुटुम्ब आपस में बांटकर उस पानी को पीने ही वाले थे की  पानी की खोज करता हुआ एक प्यासा चंडाल आ पहुंचा |रजा ने सारा पानी उसे दे दिया और सृष्टिकर्ता से प्रार्थना की "हे भगवन ! न तो मैं अष्टसीद्धियों से युक्त सरवोछ स्थान चाहता हूँ और न मुक्ति |मैं तो यह चाहता हूँ  की प्राणिमात्र के अन्तः कारन में बैठ कर उनके दुखों को स्वयं सहन कर हूँ जिससे की सभी प्राणी अपने सभी प्रकार के दुखों से बच सकें | " अब आप स्वयं ही निर्णय करें की क्या ऐसा राजा प्रतिदिन ४ हजार पशुओं को भोजन के लिए मरवा सकता है ?


महाभारत का मूल प्रसंग  - 
ये श्लोक महाभारत के वनपर्व के हैं तथा जिसमे एक वधिक द्वारा की गयी हिंसा की निंदा की गयी है |  जिस खंड का उद्देश्य ही वधिक द्वारा की गयी हिंसा की निंदा हो उस के अन्दर चार हजार निर्दोष पशुओं की हत्या करके कीर्ति प्राप्त करने की बात लिखी होना हास्यास्पद है |इस प्रसंग में पुत्र वध से दुखी राजा युधिषठिरको समझाते हुए भगवन श्री कृष्ण कहानते हैं की पूर्व काल के कई यशस्वी राजा भी जीवित नहीं रहे | इसी क्रम में भगवन सही कृष्ण ने कई राजाओं जैसे शिबी आदि के नाम बताये जिन्होंने गौ दान के द्वारा यश अर्जित किया था |कहीं भी गौ हत्या जैसा कोई प्रसंग नहीं है |महाभारत में उसके ठीक पहले वाले अध्याय में "अहिंसा परमो धर्मः" का सन्देश दिया गया है | एक अध्याय में अहिंसा परमो धर्मः का उपदेश देकर अगले ही अध्याय में हिंसा करने वाले राजा की कीर्ति कैसे गायी जा सकती है ?

राजा रान्तिदेव की कीर्ति का वास्तविक कारण - 
राजा रान्तिदेव  की कीर्ति का कारण गायों का दान करना तथा फल फूल द्वारा ऋषियों का स्वागत करना था | राजा रंतिदेव के बारे में कहा गया हिया की वो हजारों गायें और सहस्त्रों निष्क छूकर दान देते थे |निष्क एक राशी होती है जिसमे एक स्वर्ण माला से युक्त वृषभ , उसके पीछे एक हजार गायें और एक सौ आठ स्वर्ण मुद्राएँ होती हैं |राजा रान्तिदेव की रसोई में मणिमाय कुंडल धारण किये हुए रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे आप लोग खूब दाल भात खाइए |राजा रन्तिदेव की कीर्ति का वास्तविक कारण यही था | 

चर्मण्वती नदी - हिंदुत्व  के विरोधी एक  श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं की राजा रंतिदेव की 'रन्तिदेव' की रसोई में दो हजार गायें मारी जाती थी और उनका गीला चमडा रसोई में रखा जाता था |उसका टपका हुआ जो जल बहा वह एक नदी बन गया जो की कर्मवती नदी कहलाया | परन्तु यदी आप महा भारत में उस श्लोक के ठीक पहले वाला श्लोक उठा कर देखें तो आप को  इस तर्क की हास्यास्पदता पता चलेगी जिसमे की कहा गया है की कठोर व्रत का पालन करने वाले राजा रन्तिदेव के यहाँ गावों और जंगल से पशु  यज्ञ के लिए स्वयं उपस्थित हो जाते थे | अब आप स्वयं विचार करिए की क्या वो पशु स्वयं के वध के लिए उपस्थित होते रहे होंगे या दूध देने के लिए ?वास्तव में पशुओं को धोने के लिए जिस नाधि का जल प्रयोग किया जाता था उसका नाम चर्म्वती नदी था जो की आज चम्बल है |

गौ की अवध्यता -
 वेदों में पुराणो में तथा महाभारत में भी सभी स्थानों पर गौ को अवध्य कहा गया है |यहता महाभारात्र शांतिपर्व "श्रुति में गौवों को अवध्य कहा गया है  तो कौन उनके वध का विचार करेगा ? जो गायों और बैलों को मरता है वो महान पाप करता है  " | "अगर पशुओं की हत्या का फल स्वर्ग है तो नरक किन कर्मों का फल है  ? "आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु ऋग्वेद ७ ।५६।१७सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार |सूयवसाद भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्यामअद्धि तर्णमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ऋग्वेद १।१६४।४०

ऋग्वेद गौ- हत्या को जघन्य अपराध घोषित करते हुए मनुष्य हत्या के तुल्य मानता है और ऐसा महापाप करने वाले के लिये दण्ड का विधान करता है |अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय ऋग्वेद १ ।१६४।२७अघ्न्या गौ- हमारे लिये आरोग्य एवं सौभाग्य लाती हैं |यदि नो गां हंसि यद्यश्वम् यदि पूरुषंतं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो सो अवीरहा अर्थववेद १।१६।४यदि कोई हमारे गाय,घोड़े और पुरुषों की हत्या करता है, तो उसे सीसे की गोली से उड़ा दो |


पुरे विवेचन से स्पस्ट है की गाय सदा से हिन्दुओं के लिए पूज्य रही है और ये पुरे हिन्दू समाज को एक सूत्र में पिरोने  का कार्य करती रही है | गौ हत्या और गौमांस खाने के  विचार हिंदुत्व विरोधियों की गाय के पार्टी श्रद्धा को समाप्त करने का मात्र एक कुटिल प्रयास है जिससे की हिंदुत्व की एकता के सूत्र को ही समाप्त किया जा सके परन्तु यह संभव नहीं है | एक हिन्दू की तीन माताएं होती हैं एक जन्म देवे वाली माता , एक पृथ्वी माता और एक गौ माता ; और भला एक माता और पुत्र के स्नेह को काम करने में कौन की कुटिलता सफल हो सकती है ?

साभार  http://nationalizm.blogspot.in/

गुरुवार, 10 मई 2012

लील गये दर्शक, ‘पाठक’


समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ की सूचनाओं पर यथासंभव प्रतिक्रिया करने के पश्चात् जैसे ही दूसरे पृष्ठ की ओर रूख किया तो झटके के साथ अखबार बंद हो गया और मुँह से निकला...............आ..........ऊ.........च। यह आऊच तो सामने बैठे श्रीमान् का ध्यान उस पृष्ठ से हटाने के लिए था जिसे खोलते ही पाठक शर्मींदा हो जाये। श्रीमान् तो मान बैठे कि हमें हो शारीरिक क्षति हुई है, पर कैसे बतायंे, यह तो मानसिक आघात था। ऐसे झटके हर शरीफ़ को आजकल के अख़बार खोलते ही लगते हैं। हर दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर ऐसी तस्वीरें चस्पा की जाती हैं, जिन्हंे देखकर आँखें शर्म से झूक जायें। टी0वी0, इंटरनेट पर वही तस्वीरें अगर बच्चे देखें तो निश्चित रूप से अश्लील तस्वीरें देखने के जुर्म में माता-पिता से मार खायेंगे। इसी परेशानी का हल शायद हमारे आधुनिक कहे जाने वाले समाचार-पत्रों ने निकाल दिया और माता-पिता व बच्चों के लिए सार्वजनिक रूप से गर्म मसाला परोस दिया। देखो और लज्जा त्यागो। हुआ भी यही कुछ दिनों तक तो हमने अखबार के पन्ने संभल-संभल कर खोलना शुरू किया, पर आखिर कब तक यह सब किया जा सकता था? बहरहाल हम ही बेशर्म हो गये। बच्चों के सम्मुख तो यह शर्म खुल गई है बस कुछ चिर-परिचित ऐसे हैं जिनके के लिए अभी कुछ और अभ्यास की आवश्यकता है। कुछ अख़बारों ने तो इसे परम्परा बना दिया है। मानो सांस्कृतिक प्रतीक हो गई हैं ये तस्वीरें। अखबार खोला और पाश्चात्य संस्कृति की दर्शन कराती नग्न देवियाँ निर्लज मुद्राओं में आपके सम्मुख प्रस्तुत हो गई। स्थिति यह है कि हमारे समाचार-पत्रों के ‘पाठक कम दर्शक ज्यादा’ हो गये हैं। समाचार-पत्रों को हमने अपनी नेक सलाह बिलकुल मुफ्त देनी चाही। पर यही गलती हो गई। बाजार के चार नये प्रत्यय समझकर हम अपना सा मुँह लेकर लौटे। यह मार्केटिंग का युग है। यहाँ वही छापा जाता है जो बिकता है और इसमें हमारा क्या दोष आप लोग पढ़ना ही....... मतलब देखना ही यह चाहते हो। आप देखना बंद कर दो, हम छापना बंद कर देंगे। बात तो कुछ हद तक सही है। पत्रकारिता दुकानदारी जो हो गई है। पर उलझन यह है कि कोठे पर बैठी तवायफ कहती है कि मैं पेट के लिए ज़िस्म बेचती हूँ, खरीदने वाले हैं इसलिए बिकती हूँ। मेरी मजबूरी ने मुझे कुलटा बना दिया पर वो शरीफ़ कैसे जिनके शौक ने मुझे यहाँ पहुँचा दिया? तो क्या वास्तव में हम पाठक समाचार-पत्रों को यह दिशा प्रदान कर रहे हैं? या समाचार-पत्रों ने नग्नता रूपी चरस की लत से पाठकों को दर्शक बना दिया! निश्चित परिणाम निकालना अत्यन्त कठिन है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि दोनांे ही कारण सामाजिक विकृति को बढ़वा अवश्य दे रहे हैं।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

ना कोंसो अब हमें

i-next में उठाये गये प्रश्न ‘तो क्या लड़कियां ही हैं रेप की जिम्मेदार?’ के मुख्य दो कारण हैं- एक, कि यह प्रश्न वास्तव में जानना चाहता है कि रेप का वास्तविक कारण है क्या? दूसरा, इस प्रकार की शर्मनाक एवं दुखद घटनाओं के प्रति आने वाले वे असंवेदनशील संवाद जो उच्च पदों पर विराजमान शिरोमणियों के मुख से प्रकट हुए। डिप्टी कमिश्नर, डीजीपी, दिल्ली पुलिस कमिश्नर, सीएम दिल्ली एवं दिल्ली पुलिस, सभी के अनुसार लड़कियां अपने साथ हुई किसी भी दुर्घटना के लिए स्वतः जिम्मेदार है। किसी के अनुसार लड़कियों का पहनावा दोषी है तो किसी के अनुसार असमय उनका असुरक्षित यात्रा अथवा नौकरी करना। कितनी विचित्र स्थिति है कि एसी आफिस में बैठने वाले अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए ‘चोरी और ऊपर से सीना जोरी’ कर रहे है! पुलिस एवं सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा के भाव का अहसास कराना है। ऐसे में ये उल्टी नसीहत उन्हें नागरिकों द्वारा कष्ट प्रदान न किये जाने का आदेश दे रही है। उन्नति की दौड़ में अपेक्षाओं से अधिक परिणाम प्रस्तुत कर अपने वजूद का लौहा मनाने वाली महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर कैसे घर बैठकर आलू-गोभी काटने का हुक्म सुनाया जा सकता है? और इस प्रकार कैद महिलाओं की आन्तरिक सुरक्षा की क्या गारंटी? 15 मार्च 2012 को अमर उजाला में प्रकाशित समाचार ‘ नौ साल की उम्र में पहला एबार्शन’ लड़कियों की घरेलु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह आरोपित करने के साथ-साथ दी जाने वाली नसीहतों को शर्मिंदा भी करता है। नाबालिकों के साथ आये दिन होने वाले दुर्व्यवहारों के लिए हमारे इन आलाकमानों के पास क्या नसीहत है? ऑफिस में बैठकर सुझावों एवं सलाहों के भँवरों में आम आदमी की सोच को गुमराह करने से बेहतर है एक सटीक रणनीति का निर्माण किया जाए और एक ऐसा समाधान प्रस्तुत किया जाये जिससे वास्तव में लड़कियों को सुरक्षित संरक्षण प्राप्त हो सके और वे अपने सपनों का आकाश पा सकें।

बुधवार, 14 मार्च 2012

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत

अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" के लेखक साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर "अरब" हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव बसते थे, इस इलावर्त में एशियाई रूस का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, ईरान का पूर्वी भाग तथा गिलगित का निकटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। आदित्यों का आवास स्थान-देवलोक भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हिमालयी क्षेत्रों में रहा था। बेबीलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्त्विक खोज में जो भित्ति चित्र मिले है, उनमें विष्णु को हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष से युद्ध करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।
उस युग में अरब एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा था, इसी कारण देवों, दानवों और दैत्यों में इलावर्त के विभाजन को लेकर 12 बार युद्ध 'देवासुर संग्राम' हुए। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपनी पुत्री ज्यन्ती का विवाह शुक्र के साथ इसी विचार से किया था कि शुक्र उनके (देवों के) पक्षधर बन जायें, किन्तु शुक्र दैत्यों के ही गुरू बने रहे। यहाँ तक कि जब दैत्यराज बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना, तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व के पास अरब में आ गये और वहाँ 10 वर्ष रहे। साइक्स ने अपने इतिहास ग्रन्थ "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" में लिखा है कि 'शुक्राचार्य लिव्ड टेन इयर्स इन अरब'। अरब में शुक्राचार्य का इतना मान-सम्मान हुआ कि आज जिसे 'काबा' कहते है, वह वस्तुतः 'काव्य शुक्र' (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। कालांतर में 'काव्य' नाम विकृत होकर 'काबा' प्रचलित हुआ। अरबी भाषा में 'शुक्र' का अर्थ 'बड़ा' अर्थात 'जुम्मा' इसी कारण किया गया और इसी से 'जुम्मा' (शुक्रवार) को मुसलमान पवित्र दिन मानते है।
"बृहस्पति देवानां पुरोहित आसीत्, उशना काव्योऽसुराणाम्"-जैमिनिय ब्रा.(01-125)
अर्थात बृहस्पति देवों के पुरोहित थे और उशना काव्य (शुक्राचार्य) असुरों के।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ 'सेअरूल-ओकुल' के 257वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
"अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।"
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात 'ज्ञान का पिता' कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल जिहाल 'अज्ञान का पिता' कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। 'Holul' के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात 'संगे अस्वद' को आदर मान देते हुए चूमते है।
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ' सेअरूल-ओकुल' के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । 'उमर-बिन-ए-हश्शाम' की कविता नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
" कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् - (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।
- विश्वजीत सिंह 'अनंत'