मंगलवार, 7 मई 2013

चीन के हाथो एक और पराजय की गवाही देता दौलतबेग ओल्डी


दौलत बेग ओल्डी से चीनी सेना के बनकर हटाये जाने का कांग्रेस सरकार और कांग्रेस पोषित मिडिया

कुछ इस प्रकार ढिंढोरा  पिट रहे हैं जैसे उन्होंने ६२ में चीन द्वारा कब्ज़ा की हुई हजार वर्ग मिल की जमीं वापस पा ली हो .. ज्ञातव्य को की चीन का सीमा विवाद दशको पहले तिब्बत विद्रोह के बाद सन १९५९ में दलाई लामा को भारत में शरण देने के बाद से ही चला है जिसकी परिणिति कांग्रेस के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु  के शासन काल में १९६२ में हुए भारत चीन युद्ध के रूप में हुआ .. हिंदी चीनी भाई  भाई के नारे को देकर तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ इन लाई ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया और आधार बनाया मैकमोहन रेखा और हिमालय क्षेत्र की सीमा के निर्धारण को .. उस युद्ध में भारत की पराजय हुई और हमारा लद्दाख और अक्साई चीन की लगभग ७२ हजार वर्गमील जमीं चीन ने कब्ज़ा कर ली .. साथ ही साथ तिब्बत पर चीनी प्रभुत्त्व स्थापित हो गया . हमारे तात्कालिक प्रधानमत्री जवाहर लाल नेहरु उस समय कोट पर लाल गुलाब और सफ़ेद कबूतर उड़ने में व्यस्त थे और हमारा कैलाश जैसा धार्मिक क्षेत्र चीन के कब्जे में चला गया.. इस पराजय के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा को सीमा रेखा के रूप में मान कर विवादों का निपटारा द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से करने का समझौता हुआ जो की भारत के लिए एकतरफ़ा था.. आज त५अक चीन ने अरुणांचल प्रदेश से अपना दावा नहीं छोड़ा है . यहाँ चीन की दोगली नीति इसी बात से परिलक्षित होती है की जिस मैकमोहन रेखा को चीन ने कभी मान्यता नहीं दी उसी के अंतर्गत उसने पाकिस्तान के साथ अपना सीमा निर्धारण कर लिया. 



१९६२ की हार के बाद हिंदुस्थानी सेना ने अपने सामरिक तैयारियों में तेजी तो ले आया मगर कमुनिस्ट शासन में चीन की तैयारियां हिन्दुस्थान से दो कदम आगे ही रही. रक्षा उपकरणों की खरीद में दलाली एवं लालफीताशाही के कारन रक्षा सौदों में देरी ने चीन और भारत की सामरिक तैयारियों और चीन की सामरिक क्षमता में एक बहुत बड़ा अन्तर आ गया जिसे बढ़ने में भारतीय राजनेताओं की ढुलमुल इच्छाशक्ति ने बहुत बड़ा योगदान दिया. युद्ध के बाद सिर्फ इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया अन्यथा ज्यादातर प्रधानमंत्री चीन के सामने घुटने टेकने की नीति पर लगे रहे और इसमें सबसे शर्मनाक योगदान मनमोहन सिंह की वर्तमान कांग्रेस सरकार का रहा जिसने संसद में  ये बाद स्वीकारी की चीन ने सैकड़ो बार सीमा का उलंघन किया और भारत सरकार अपनी राजनितिक नपुंसकता का परिचय देते हुए इसे छोटी घटना माना.. सत्य ये है की कांग्रेसी सरकार भय खाने लगी है चीन से और रोज नए नए घोटालों से घरेलू मोर्चे पर दो चार होती कांग्रेस सरकार के पास बिदेशी नीति के स्तर पर आत्मसम्मान ख़तम हो चूका है . इसी कारण पाकिस्तान जैसा देश भी हमारे सैनिको के सर काट के भेजता है और हिन्दुस्थान की सरकार जबाब देने के स्थान पर सांकेतिक विरोध प्रदर्शन में व्यस्त रही है तो कभी हमारे विदेशमंत्री पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बिरयानी परोसने में व्यस्त रहते हैं .

अभी हाल की घटना में पुनः एक बार चीन ने हिंदुस्थानी सीमा क्षेत्र में लद्दाख के निकट दौलत बेग ओल्डी जो की लद्दाख में आता है में लगभग १९ किलोमीटर तक  अतिक्रमण कर लिया और अपने टेंट लगा लिए . हलाकि भारत सरकार इसे एक स्थानीय मुद्दा मान के आँखें चुरा रही थी मगर इसके पहले भी यदि हम देखें तो मनरेगा के तहत होने वाले काम को लद्दाख में चीन ने पहले भी रुकवाया है और भारत सरकार नपुन्सको की तरह झुकते हुए कार्य बंद कर दिया ..
हाल के दिनों में भारतीय सेना के चीन से सटी सीमा पर दौलत बेग ओल्डी
, फुक्चे और न्योमामें ढांचागत सुविधाओं के निर्माण कार्य से चीन असहज हो रहा था और उसे रोकने के उद्देश्य से ये बार बार अतिक्रमण किया गया .
अबकी बार चीन ने पीछे हटने की शर्त रखते हुए गतिरोध तो सुलझाने के लिए चुमार जो की एक सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पोस्ट थी वह से भारतीय सेना के बंकर हटाने और भविष्य में  पूर्वी लद्दाख में स्थायी निर्माण का काम बंद करने और कोई गतिविधि न करने की शर्त रख दी कांग्रेस सरकार ने चीन के सामने घुटने टेकते हुए और अपनी इज्जत बचने के उद्देश्य से चुमार से सेनाएं वापस बुला ली  वर्तमान स्थिति ये है की  चीनी सेना लद्दाख के देपसांग से तब गई, जब इंडियन आर्मी चुमार से बंकर नष्ट करने के लिए राजी हुई। और पुनः चीन ने चालबाजी दिखाते हुए 19 किलोमीटर अतिक्रमण की हुई जमीन से सिर्फ २ किलोमीटर ही पीछे हटा है यानि अभी भी भारतीय भूभाग में चीन का अतिक्रमण है और भारतीय सेना पीछे हटती जा रही है हालत छोटे स्तर वैसे ही हैं जैसे १९६२ में थे अंतर इतना है की उस समय हमारे जवानों को प्रतिउत्तर देने की छुट थी आज उनके हाथ कांग्रेस सरकार की निकृष्ट बिदेश नीति  ने बांध रखें हैं.
एक दलाल किस्म के पत्रकार ने इसे कारगिल से बड़ी विजय के रूप में दिखाया मगर कारगिल में वाजपेयी जी के आदेश पर हमारे सीमा में घुस आये पाकिस्तानियों को हमने भगाया था न की अपने ही क्षेत्र में पीछे हटते हुए स्वयं के बनकर नष्ट किये थे .. आज स्थिति है की जिस जगह से भारतीय सेना चीन के दबाव एवं कांग्रेस सरकार के आदेश से पीछे हटी है वो अब भारतीय क्षेत्र से नो मैन्स लैंड(NO MANS LAND)  बन गया है और थोड़े दिन बाद चीन के कब्जे में ... 
चीन के लिए हिन्दुस्थान एक बड़ा बाजार है शायद हिन्दुस्थान की सरकार ने दृढ राजनितिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया होता तो हम सरे व्यापारिक सम्बन्ध चीन से ख़तम करके उस पर एक दबाव बना सकते थे इस कार्य में सहर्ष चीन का प्रतिद्वंदी अमरीका भी हमारे साथ होता . यथार्थ ये है की कांग्रेस शासन में चीन को उसकी भाषा में जबाब देने का सामर्थ्य किसी को नहीं है और हमारे सभी पडोसी धीरे धीरे हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं कभी बांग्लादेश में तो कभी पाकिस्तान तो कभी चीन यहाँ तक की नेपाल जैसा  देश भी अब भारत की सीमाओं में घुसने लगा है ..
शायद ये कांग्रेस की नपुंसक बिदेशनीति और रक्षानीति का पार्श्व प्रभाव है. दुखद ये है की मिडिया का एक तबका कांग्रेस की इस नाकामी और हिन्दुस्थान की एक और हार को अपनी विजय के रूप में प्रदर्शित कर रहा है और वास्तविकता के धरातल पर हमने कई किलोमीटर भूमि फिर खो दी भारत माँ का एक और अंग भंग कांग्रेस सरकार की नीतियों ने कर दिया.. 

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

आजाद हिंदुस्थान के गुलाम क़ानून(British colonial law in indian constitusion)



1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए
आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" |
तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो |
फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% मतलब 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | तो भारत की जो गरीबी आयी है वो लुट में से आयी गरीबी है | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए | इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | तो हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है | हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है लेकिन कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ |

Indian Education Act - 1858 में Indian Education Act बनाया गया | इसकी    ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोले ने की थी | लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के    शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के    शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी | अंग्रेजों का एक अधिकारी था    G.W.Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय    सर्वे किया था | 1823 के आसपास की बात है ये | Litnar , जिसने उत्तर भारत का    सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण    भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब    भारत में इतनी साक्षरता है | और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को    हमेशा-हमेशा  के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा    व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा    व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से  अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में    काम करेंगे, और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है "कि जैसे किसी खेत में  कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और  अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी " | इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता  जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी  घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा  दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला | 1850 तक इस देश  में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में Higher Learning Institute हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया   जाता था, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन
   गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी | इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म  किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला  कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास  यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं | और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है

   वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे  में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी "

और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब  साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है |  और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा  बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम  तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा | लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है | शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की  भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती  थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी |  संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में  होता है | जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही   मैकोले की रणनीति थी |

Indian Police Act - 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के  पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ  उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह/क्रांति को दबाया जा  सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए | उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | पुलिस को एक डंडा थमा दिया गया और ये अधिकार  दे दिया गया कि अगर कहीं 5 से ज्यादा लोग हों तो वो डंडा चला सकता है यानि लाठी  चार्ज  कर सकता है और वो भी बिना पूछे और बिना बताये और पुलिस को तो Right to  Offence  है लेकिन आम आदमी को Right to Defense नहीं है | आपने अपने बचाव के लिए  उसके डंडे को पकड़ा तो भी आपको सजा हो सकती है क्योंकि आपने उसके ड्यूटी को पूरा  करने में व्यवधान पहुँचाया है और आप उसका कुछ नहीं कर सकते | इसी कानून का  फायदा उठा कर लाला लाजपत राय पर लाठियां चलायी गयी थी और लाला जी की मृत्यु हो  गयी थी और लाठी चलाने वाले सांडर्स का क्या हुआ था ? कुछ नहीं, क्योंकि वो अपनी ड्यूटी कर रहा था और जब सांडर्स को कोई सजा नहीं हुई तो लालाजी के मौत का बदला भगत सिंह ने सांडर्स को गोली मारकर लिया था | और वही दमन और अत्याचार वाला  कानून "इंडियन पुलिस एक्ट" आज भी इस देश में बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले चल  रहा है | और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने  ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की | और  जेल मैनुअल के अनुसार आपको पूरे कपडे उतारने पड़ेंगे आपकी बॉडी मार्क दिखाने के   लिए भले ही आपका बॉडी मार्क आपके चेहरे पर क्यों न हो | और जेल के कैदियों को  अल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था ताकि वो जल्दी मरे, वो अल्युमिनियम  के बर्तन में खाना देना आज भी जारी हैं हमारे जेलों में, क्योंकि वो अंग्रेजों  के इस कानून में है |
Indian Civil Services Act - 1860 में ही इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट    बनाया गया | ये जो Collector हैं वो इसी कानून की देन हैं | भारत के Civil Servant जो हैं उन्हें Constitutional Protection है, क्योंकि जब ये कानून बना   था उस समय सारे ICS अधिकारी अंग्रेज थे और उन्होंने अपने बचाव के लिए ऐसा कानून  बनाया था, ऐसा विश्व के किसी देश में नहीं है, और वो कानून चुकी आज भी लागू है   इसलिए भारत के IAS अधिकारी सबसे निरंकुश हैं | अभी आपने CVC थोमस का मामला देखा   होगा | इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता | और इन अधिकारियों का हर तीन साल पर  तबादला हो जाता था क्योंकि अंग्रेजों को ये डर था कि अगर ज्यादा दिन तक कोई   अधिकारी एक जगह रह गया तो उसके स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध हो जायेंगे और वो ड्यूटी उतनी तत्परता से नहीं कर पायेगा या उसके काम काज में ढीलापन आ जायेगा  | और वो ट्रान्सफर और पोस्टिंग का सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है और हमारे यहाँ   के कलक्टरों की जिंदगी इसी में कट जाती है | और ये जो Collector होते थे उनका  काम था Revenue, Tax, लगान और लुट के माल को Collect करना इसीलिए ये Collector   कहलाये और जो Commissioner होते थे वो commission पर काम करते थे उनकी कोई  तनख्वाह तय नहीं होती थी और वो जो लुटते थे उसी के आधार पर उनका कमीशन होता था  | ये मजाक की बात या बनावटी कहानी नहीं है ये सच्चाई है इसलिए ये दोनों  पदाधिकारी जम के लूटपाट और अत्याचार मचाते थे उस समय | अब इस कानून का नाम  Indian Civil Services Act से बदल कर Indian Civil Administrative Act हो गया है, 64 सालों में बस इतना ही बदलाव हुआ है|

Indian Income Tax Act - इस एक्ट पर जब ब्रिटिश संसद में चर्चा हो रही   थी तो एक सदस्य ने कहा कि "ये तो बड़ा confusing है, कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा    रहा है",  तो दुसरे ने कहा कि हाँ इसे जानबूझ कर ऐसा रखा गया है ताकि जब भी    भारत के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वो हमसे ही संपर्क करें | आज भी भारत के आम  आदमी को छोडिये, इनकम टैक्स के वकील भी इसके नियमों को लेकर दुविधा की स्थिति  में रहते हैं | और इनकम टैक्स की दर रखी गयी 97% यानि 100 रुपया कमाओ तो 97 रुपया टैक्स में दे दो और उसी समय ब्रिटेन से आने वाले सामानों पर हर तरीके के टैक्स की छुट दी जाती है ताकि ब्रिटेन के माल इस देश के गाँव-गाँव में पहुँच  सके | और इसी चर्चा में एक सांसद कहता है कि "हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू  है, अगर भारत के लोग इतना टैक्स देते हैं तो वो बर्बाद हो जायेंगे या टैक्स की  चोरी करते हैं तो बेईमान हो जायेंगे और अगर बेईमान हो गए तो हमारी गुलामी में आ  जायेंगे और अगर बरबाद हुए तो हमारी गुलामी में आने ही वाले है" | तो ध्यान  दीजिये कि इस देश में टैक्स का कानून क्यों लाया जा रहा है ? क्योंकि इस देश के  व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, उत्पादकों को, उद्योगपतियों को, काम करने  वालों को या तो बेईमान बनाया जाये या फिर बर्बाद कर दिया जाये, ईमानदारी से काम  करें तो ख़त्म हो जाएँ और अगर बेईमानी करें तो हमेशा ब्रिटिश सरकार के अधीन  रहें | अंग्रेजों ने इनकम टैक्स की दर रखी थी 97% और इस व्यवस्था को 1947 में  ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आपको जान के ये आश्चर्य होगा कि  1970-71 तक इस देश में इनकम टैक्स की दर 97% ही हुआ करती थी | और इसी देश में भगवान श्रीराम जब अपने भाई भरत से संवाद कर रहे हैं तो उनसे कह रहे है कि प्रजा पर ज्यादा टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए और चाणक्य ने भी कहा है कि टैक्स ज्यादा   नहीं होना चाहिए नहीं तो प्रजा हमेशा गरीब रहेगी, अगर सरकार की आमदनी बढ़ानी है   तो लोगों का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करो | अंग्रेजों ने   तो 23 प्रकार के टैक्स लगाये थे उस समय इस देश को लुटने के लिए, अब तो इस देश  में VAT को मिला के 64 प्रकार के टैक्स हो गए हैं | महात्मा गाँधी के देश में  नमक पर भी टैक्स हो गया है और नमक भी विदेशी कंपनियां बेंच रही हैं, आज अगर  गाँधी जी की आत्मा स्वर्ग से ये देखती होगी तो आठ-आठ आंसू रोती होगी कि जिस देश  में मैंने नमक सत्याग्रह किया कि विदेशी कंपनी का नमक न खाया जाये आज उस देश  में लोग विदेश कंपनी का नमक खरीद रहे हैं और नमक पर टैक्स लगाया जा रहा है |  शायद हमको मालूम नहीं है कि हम कितना बड़ा National Crime कर रहे हैं |


Indian Forest Act - 1865 में Indian Forest Act बनाया गया और ये लागू   हुआ 1872 में | इस कानून के बनने के पहले जंगल गाँव की सम्पति माने जाते थे और   गाँव के लोगों की सामूहिक हिस्सेदारी होती थी इन जंगलों में, वो ही इसकी देखभाल   किया करते थे, इनके संरक्षण के लिए हर तरह का उपाय करते थे, नए पेड़ लगाते थे  और इन्ही जंगलों से जलावन की लकड़ी इस्तेमाल कर के वो खाना बनाते थे | अंग्रेजों  ने इस कानून को लागू कर के जंगल के लकड़ी के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया |  साधारण आदमी अपने घर का खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं काट सकता और अगर काटे तो    वो अपराध है और उसे जेल हो जाएगी, अंग्रेजों ने इस कानून में ये प्रावधान किया  कि भारत का कोई भी आदिवासी या दूसरा कोई भी नागरिक पेड़ नहीं काट सकता और आम  लोगों को लकड़ी काटने से रोकने के लिए उन्होंने एक पोस्ट बनाया District Forest  Officer जो उन लोगों को तत्काल सजा दे सके, उसपर केस करे, उसको मारे-पीटे |  लेकिन दूसरी तरफ जंगलों के लकड़ी की कटाई के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू की गयी जो  आज भी लागू है और कोई ठेकेदार जंगल के जंगल साफ़ कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता |  अंग्रेजों द्वारा नियुक्त ठेकेदार जब चाहे, जितनी चाहे लकड़ी काट सकते हैं | हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है जो वर्षों से ये काम कर रही है, उसका नाम है   ITC पूरा नाम है Indian Tobacco Company इसका असली नाम है American Tobacco Company, और ये कंपनी हर साल 200 अरब सिगरेट बनाती है और इसके लिए 14 करोड़ पेड़  हर साल काटती है | इस कंपनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी को आज तक जेल की सजा  नहीं हुई क्योंकि ये इंडियन फोरेस्ट एक्ट ऐसा है जिसमे सरकार के द्वारा अधिकृत  ठेकेदार तो पेड़ काट सकते हैं लेकिन आप और हम चूल्हा जलाने के लिए, रोटी बनाने  के लिए लकड़ी नहीं ले सकते और उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति अब हो गयी है, आप  अपने जमीन पर के पेड़ भी नहीं काट सकते | तो कानून ऐसे बने हुए हैं कि साधारण  आदमी को आप जितनी प्रताड़ना दे सकते हैं, दुःख दे सकते है, दे दो विशेष आदमी को  आप छू भीं नहीं सकते | और जंगलों की कटाई से घाटा ये हुआ कि मिटटी बह-बह के   नदियों में आ गयी और नदियों की गहराई को इसने कम कर दिया और बाढ़ का प्रकोप   बढ़ता गया |


Indian Penal Code - अंग्रेजों ने एक कानून हमारे देश में लागू किया  था जिसका नाम है Indian Penal Code (IPC ) | ये Indian Penal Code अंग्रेजों के एक और गुलाम देश Ireland के Irish Penal Code की फोटोकॉपी है, वहां भी ये IPC   ही है लेकिन Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वहीं भारत में इस "I" का   मतलब Indian है, इन दोनों IPC में बस इतना ही अंतर है बाकि कौमा और फुल स्टॉप   का भी अंतर नहीं है | अंग्रेजों का एक अधिकारी था .वी.मैकोले, उसका कहना था    कि भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाना है तो इसके शिक्षा तंत्र और न्याय  व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करना होगा | और आपने अभी ऊपर Indian Education  Act पढ़ा होगा, वो भी मैकोले ने ही बनाया था और उसी मैकोले ने इस IPC की भी  ड्राफ्टिंग की थी | ये बनी 1840 में और भारत में लागू हुई 1860 में |   ड्राफ्टिंग करते समय मैकोले ने एक पत्र भेजा था ब्रिटिश संसद को जिसमे उसने  लिखा था कि "मैंने भारत की न्याय व्यवस्था को आधार देने के लिए एक ऐसा कानून  बना दिया है जिसके लागू होने पर भारत के किसी आदमी को न्याय नहीं मिल पायेगा |   इस कानून की जटिलताएं इतनी है कि भारत का साधारण आदमी तो इसे समझ ही नहीं सकेगा  और जिन भारतीयों के लिए ये कानून बनाया गया है उन्हें ही ये सबसे ज्यादा तकलीफ  देगी | और भारत की जो प्राचीन और परंपरागत न्याय व्यवस्था है उसे जडमूल से  समाप्त कर देगा"| और वो आगे लिखता है कि " जब भारत के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तभी हमारा राज मजबूती से भारत पर स्थापित होगा" | ये हमारी न्याय  व्यवस्था अंग्रेजों के इसी IPC के आधार पर चल रही है | और आजादी के 64 साल बाद  हमारी न्याय व्यवस्था का हाल देखिये कि लगभग 4 करोड़ मुक़दमे अलग-अलग अदालतों में  पेंडिंग हैं, उनके फैसले नहीं हो पा रहे हैं | 10 करोड़ से ज्यादा लोग न्याय के  लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं लेकिन न्याय मिलने की दूर-दूर तक सम्भावना नजर  नहीं आ रही है, कारण क्या है ? कारण यही IPC है | IPC का आधार ही ऐसा है | और   मैकोले ने लिखा था कि "भारत के लोगों के मुकदमों का फैसला होगा, न्याय नहीं   मिलेगा" | मुक़दमे का निपटारा होना अलग बात है, केस का डिसीजन आना अलग बात है,  केस का जजमेंट आना अलग बात है और न्याय मिलना बिलकुल अलग बात है | अब इतनी साफ़  बात जिस मैकोले ने IPC के बारे में लिखी हो उस IPC को भारत की संसद ने 64 साल   बाद भी नहीं बदला है और ना कभी कोशिश ही की है |

Land Acquisition Act - एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था डलहौजी    | ब्रिटिश पार्लियामेंट ने उसे एक ही काम के लिए भारत भेजा था कि तुम जाओ और   भारत के किसानों के पास जितनी जमीन है उसे छिनकर अंग्रेजों के हवाले करो |   डलहौजी ने इस "जमीन को हड़पने के कानून" को भारत में लागू करवाया, इस कानून को  लागू कर के किसानों से जमीने छिनी गयी | जो जमीन किसानों की थी वो ईस्ट इंडिया   कंपनी की हो गयी | डलहौजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि " मैं गाँव गाँव जाता  था और अदालतें लगवाता था और लोगों से जमीन के कागज मांगता था" | और आप जानते  हैं कि हमारे यहाँ किसी के पास उस समय जमीन के कागज नहीं होते थे क्योंकि ये   हमारे यहाँ परंपरा से चला आ रहा था या आज भी है कि पिता की जमीन या जायदाद बेटे   की हो जाती है, बेटे की जमीन उसके बेटे की हो जाती है | सब जबानी होता था, जबान  की कीमत होती थी या आज भी है आप देखते होंगे कि हमारे यहाँ जो शादियाँ होती हैं
   वो सिर्फ और सिर्फ जबानी समझौते से होती है कोई लिखित समझौता नहीं होता है, एक   दिन /तारीख तय हो जाती है और लड़की और लड़का दोनों पक्ष शादी की तैयारी में लग  जाते है लड़के वाले निर्धारित तिथि को बारात ले के लड़की वालों के यहाँ पहुँच जाते है, शादी हो जाती है | तो कागज तो किसी के पास था नहीं इसलिए सब की जमीनें   उस अत्याचारी डलहौजी ने हड़प ली | एक दिन में पच्चीस-पच्चीस हजार किसानों से  जमीनें छिनी गयी | परिणाम क्या हुआ कि इस देश के करोड़ों किसान भूमिहीन हो गए |  डलहौजी के आने के पहले इस देश का किसान भूमिहीन नहीं था, एक-एक किसान के पास कम  से कम 10 एकड़ जमीन थी, ये अंग्रेजों के रिकॉर्ड बताते हैं | डलहौजी ने आकर इस   देश के 20 करोड़ किसानों को भूमिहीन बना दिया और वो जमीने अंग्रेजी सरकार की हो
   गयीं | 1947 की आजादी के बाद ये कानून ख़त्म होना चाहिए था लेकिन नहीं, इस देश   में ये कानून आज भी चल रहा है | हम आज भी अपनी खुद की जमीन पर मात्र किरायेदार  हैं, अगर सरकार का मन हुआ कि आपके जमीन से हो के रोड निकाला जाये तो आपको एक  नोटिस दी जाएगी और आपको कुछ पैसा दे के आपकी घर और जमीन ले ली जाएगी | आज भी इस  देश में किसानों की जमीन छिनी जा रही है बस अंतर इतना ही है कि पहले जो काम  अंग्रेज सरकार करती थी वो काम आज भारत सरकार करती है | पहले जमीन छीन कर  अंग्रेजों के अधिकारी अंग्रेज सरकार को वो जमीनें भेंट करते थे, अब भारत सरकार  वो जमीनें छिनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भेंट कर रही है और 
Special Economic Zone उन्हीं जमीनों पर बनाये जा रहे हैं और ये जमीन बहुत बेदर्दी से लिए जा रहे
   हैं | भारतीय या बहुराष्ट्रीय कंपनी को कोई जमीन पसंद आ गयी तो सरकार एक नोटिस  देकर वो जमीन किसानों से ले लेती है और वही जमीन वो कंपनी वाले महंगे दाम पर  दूसरों को बेचते हैं | जिसकी जमीन है उसके हाँ या ना का प्रश्न ही नहीं है, जमीन की कीमत और मुआवजा सरकार तय करती है, जमीन वाले नहीं | एक पार्टी की सरकार वहां पर है तो दूसरी पार्टी का नेता वहां पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है और दूसरी पार्टी की सरकार है तो पहले वाला पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है लेकिन  दोनों पार्टियाँ मिल के इस कानून को ख़त्म करने की कवायद नहीं करते और 1894 का ये अंग्रेजों का कानून बिना किसी परेशानी के इस देश में आज भी चल रहा है | इसी देश में नंदीग्राम होते हैं, इसी देश में सिंगुर होते हैं और अब नोएडा हो रहा है | जहाँ लोग नहीं चाहते कि हम हमारी जमीन छोड़े, वहां लाठियां चलती हैं,   गोलियां चलती है | आपको लगता है कि ये देश आजाद हो गया है ? मुझे तो नहीं लगता   |


Indian Citizenship Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया था Indian   Citizenship Act, आप और हम भारत के नागरिक हैं तो कैसे हैं, उसके Terms और Condition अंग्रेज तय कर के गए हैं | अंग्रेजों ने ये कानून इसलिए बनाया था कि   अंग्रेज भी इस देश के नागरिक हो सकें | तो इसलिए इस कानून में ऐसा प्रावधान है  कि कोई व्यक्ति  (पुरुष या महिला) एक खास अवधि तक इस देश में रह ले तो उसे भारत  की नागरिकता मिल सकती है (जैसे बंगलादेशी शरणार्थी) | लेकिन हमने इसमें आज 2011  तक के 64 सालों में रत्ती भर का भी संशोधन नहीं किया | इस कानून के अनुसार कोई   भी विदेशी आकर भारत का नागरिक हो सकता है, नागरिक हो सकता है तो चुनाव लड़ सकता  है, और चुनाव लड़ सकता है तो विधायक और सांसद भी हो सकता है, और विधायक और सांसद बन सकता है तो मंत्री भी बन सकता है, मंत्री बन सकता है तो प्रधानमंत्री  और राष्ट्रपति भी बन सकता है | ये भारत की आजादी का माखौल नहीं तो और क्या है ?
   दुनिया के किसी भी देश में ये व्यवस्था नहीं है | आप अमेरिका जायेंगे और रहना  शुरू करेंगे तो आपको ग्रीन कार्ड मिलेगा लेकिन आप अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं  बन सकते, जब तक आपका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ होगा | ऐसा ही कनाडा में है,  ब्रिटेन में है, फ़्रांस में है, जर्मनी में है | दुनिया में 204 देश हैं लेकिन
   दो-तीन देश को छोड़ के हर देश में ये कानून है कि आप जब तक उस देश में पैदा नहीं   हुए तब तक आप किसी संवैधानिक पद पर नहीं बैठ सकते, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है  | कोई भी विदेशी इस देश की नागरिकता ले सकता है और इस देश के सर्वोच्च  संवैधानिक पद पर आसीन हो सकता है और आप उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि कानून है,    Indian Citizenship Act , उसमे ये व्यवस्था है | ये अंग्रेजों के समय का कानून  है, हम उसी को चला रहे हैं, उसी को ढो रहे हैं आज भी, आजादी के 64 साल बाद भी |   आप समझते हैं कि हमारी एकता और अखंडता सुरक्षित रहेगी ?
Indian Advocates Act - हमारे देश में जो अंग्रेज जज होते थे वो काला   टोपा लगाते थे और उसपर नकली बालों का विग लगाते थे | ये व्यवस्था आजादी के 40-50 साल बाद तक चलता रहा था | हमारे यहाँ वकीलों का जो ड्रेस कोड है वो इसी  कानून के आधार पर है, काला कोट, उजला शर्ट और बो ये हैं वकीलों का ड्रेस कोड |   काला कोट जो होता है वो आप जानते हैं कि गर्मी को सोखता है, और अन्दर की गर्मी   को बाहर नहीं निकलने देता, और इंग्लैंड में चुकी साल में 8-9 महीने भयंकर ठण्ड   पड़ती है तो उन्होंने ऐसा ड्रेस अपनाया, अब हम भारत में भी ऐसा ही ड्रेस पहन रहे  हैं ये समझ से बाहर की बात है | हमारे यहाँ का मौसम गर्म है और साल में नौ महीने तो बहुत गर्मी रहती है और अप्रैल से अगस्त तक तो तापमान 40-50 डिग्री तक  हो जाता है फिर ऐसे ड्रेस को पहनने से क्या फायदा जो शरीर को कष्ट दे, कोई और  रंग भी तो हम चुन सकते थे काला रंग की जगह, लेकिन नहीं | हमारे देश में आजादी  के पहले के जो वकील हुआ करते थे वो ज्यादा हिम्मत वाले थे | लोकमान्य बाल  गंगाधर तिलक हमेशा मराठी पगड़ी पहन कर अदालत में बहस करते थे और गाँधी जी ने कभी  काला कोट नहीं पहना और इसके लिए कई बार उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा था,   लेकिन उन लोगों ने कभी समझौता नहीं किया |


Indian Motor Vehicle Act - उस ज़माने में कार/मोटर जो था वो सिर्फ   अंग्रेजों, रजवाड़ों और पैसे वालों के पास होता था तो इस कानून में प्रावधान डाला गया कि अगर किसी को मोटर से धक्का लगे या धक्के से मौत हो जाये तो सजा   नहीं होनी चाहिए या हो भी तो कम से कम | साल डेढ़ साल की सजा हो ऐसी व्यवस्था  होनी चाहिए उसको हत्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि हत्या में तो धारा 302 लग  जाएगी और वहां हो जाएगी फाँसी या आजीवन कारावास, तो अंग्रेजों ने इस एक्ट में  ये प्रावधान रखा कि अगर कोई (अंग्रेजों के) मोटर के नीचे दब के मरा तो उसे कठोर   और लम्बी सजा ना मिले | ये व्यवस्था आज भी जारी है और इसीलिए मोटर के धक्के से  होने वाली मौत में किसी को सजा नहीं होती | और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस देश   में हर साल डेढ़ लाख लोग गाड़ियों के धक्के से या उसके नीचे आ के मरते हैं लेकिन  आज तक किसी को फाँसी या आजीवन कारावास नहीं हुआ |


Indian Agricultural Price Commission Act - ये भी अंग्रेजों के ज़माने   का कानून है | पहले ये होता था कि किसान, जो फसल उगाते थे तो उनको ले के मंडियों में बेचने जाते थे और अपने लागत के हिसाब से उसका दाम तय करते थे |  अंग्रेजों ने हमारे कृषि व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ये कानून लाया और किसानों को उनके फसल का दाम तय करने का अधिकार समाप्त कर दिया | अंग्रेज अधिकारी मंडियों में जाते थे और वो किसानों के फसल का मूल्य तय करते थे कि आज ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा और ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा, ऐसे ही हर अनाज  का दाम वो तय करते थे | आप हर साल समाचारों में सुनते होंगे कि "सरकार ने गेंहू   का,धान का, खरीफ का, रबी का समर्थन मूल्य तय किया" | ये किसानों के फसलों का  न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, मतलब किसानों के फसलों का आधिकारिक मूल्य होता  है | इससे ज्यादा आपके फसल का दाम नहीं होगा | किसानों को अपने उपजाए अनाजों का   दाम तय करने का अधिकार आज भी नहीं है इस आजाद भारत में | उनका मूल्य तय करना  सरकार के हाथ में होता है | और आज दिल्ली के AC Room में बैठ कर वो लोग किसानों के फसलों का दाम तय करते हैं जिन्होंने खेतों में कभी पसीना नहीं बहाया और जो खेतों में पसीना बहाते हैं, वो अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकते |
Indian Patent Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया Patent Act , और वो   बना था 1911 | Patent मतलब होता है एक तरह का Legal Right, कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक या कंपनी अगर किसी चीज का आविष्कार करती है तो उसे उस आविष्कार पर एक  खास अवधि के लिए अधिकार दिया जाता है | ये जा के 1970 में ख़त्म हुआ श्रीमती    इंदिरा गाँधी के प्रयासों से लेकिन इसे अब फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के  दबाव में बदल दिया गया है | अभी विस्तार से नहीं लिखूंगा मतलब इस देश के लोगों    के हित से ज्यादा जरूरी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित |
  
ये हैं भारत के विचित्र कानून, सब पर लिखना संभव नहीं है और ज्यादा बोझिल न हो जाये इसलिए यहीं विराम देता हूँ | इन कानूनों के किताब बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन मैंने इनके इतिहास को वर्तमान के साथ जोड़ के आपके सामने प्रस्तुत किया है, और इन कानूनों का इतिहास, उन पर हुई चर्चा को ब्रिटेन के संसद House of Commons की library से लिया गया हैं | 

साभार: राजीव भाई के व्याख्यान 

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

BEING HINDU T SHIRTS AND BADGES

 BEING HINDU
सूचना : सभी मित्रों की जानकारी के लिए। हमने विभिन्न रंगों में BEING HINDU T-SHIRTS और BADGES नए डिजाईन में ले कर आये हैं .ज्यादा जानकारी के लिए आप http://www.being-hindu.com/ पर जा सकते हैं। इस कार्यक्रम का हमारा स्पष्ट उद्देश्य है की "हिन्दू" शब्द हमारे सामान्य जीवन में परिलक्षित हो और सामान्य व्यक्ति की जिज्ञासा हमारी धार्मिक आस्थाओं में बढे।
जिस किसी भी बंधू को ये टी शर्ट चाहिए वो 09718847528 पर संपर्क कर सकता है या हमे hindu.being@gmail.com पर ईमेल लिख सकता है .
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जय श्री राम जय हिन्दू राष्ट्र ...  




रविवार, 20 जनवरी 2013

मै हिंदुस्थान का हिन्दू हूँ मै आतंकी हूँ

RSS HELPING MUSLIM PEOPLES

युवराज राहुल गांधी(रौल विंची) की ताजपोशी होते ही कांग्रेस ने हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया इसी कड़ी मे माननीय गृहमंत्री ने पाकिस्तान का आतंकवाद भूल कर हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने का एक अभियान शुरू कर दिया है॥ स्पष्ट है चुनाव का बिगुल बज चुका है और कांग्रेस ने हिंदुओं को आतंकवादी बता कर अपना मुसलमान वोट बैंक सुदृढ़ करने की शुरुवात कर दी है ॥ कांग्रेस की परिभाषा से मैन एक  घोषित एक हिन्दू आतंकवादी हूँ और ये है मेरी आतंक की इबारत और आवाज..."जय श्री राम"



मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ,
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ ,मैं सर्व धर्म समभाव सिखाता ,
मानवता की बात बताता,हर धर्मस्थल पर शीश नवाता,आतंकी हूँ। 
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ, मैं आतंकी हूँ॥ 

वो धरा गोधरा की हो या,वो जनमभूमि हो राम की,
हो मथुरा काशी की धरती,या सोमनाथ के धाम की॥ 
हर बार में अपनी बलि चढ़ाता आतंकी हूँ,
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ।।

मैं सत्य अहिंसा के दर्शन को ,जीने का आधार बनाता,
बाबर अब्दाली के वंशज को भी,मैं अपने गले लगाता।
नित नए नए अत्याचारों पर,धैर्य दिखता,सहता जाता आतंकी हूँ॥
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ ।

पर बहुत हो चुकी धैर्य परीक्षा, अब चन्दन अनल दिखायेगा,
भाई भाई के नारे को,अब फिर से परखा जायेगा.,
गर भाई हो कौरव जैसा,तो अर्जुन शस्त्र उठाएगा।
गाँधी का ये गाँधी दर्शन,अब चक्र सुदर्शन लाये,
डंडे वाला बूढ़ा गाँधी ,अब सावरकर बन जायेगा।
शत वर्षों से सहते आये,अब और नहीं सहा जायेगा.
अब हिन्दुस्थान का हर हिन्दू,राणा प्रताप बन जायेगा।
तब बाबर की जेहादी सेना में, उथल पुथल हो जाएगी,
गुजरात की कुछ बीती यादें, फिर से दोहराई जाएँगी।
जौहर की बाते बीत गयी,अब चंडी शस्त्र उठाएगी,
गर हुआ जरुरी तो बहने,प्रज्ञा ठाकुर बन जाएँगी॥
पर पांडव ने भी कौरव को,अंतिम सन्देश सुनाया था,
खुद योगेश्वर ने जाकर भी,दुर्योधन को समझाया था।
तुम हिंसक आतातायी हो,तुम कौरव हो पर भाई हो,
यदि जीना है तो जीने दो,या मरने को तैयार रहो,
ये बात सभी को समझाता मैं आतंकी हूँ॥
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ॥





लेखक "
आशुतोष नाथ तिवारी"

बुधवार, 9 जनवरी 2013

स्वच्छ समाज का बाजारीकरण


बाजारीकरण के आधुनिक दौर में कोई भी क्षेत्र उसकी पहुँच से अछूता नहीं है ..हमारे बेड रूम से लेकर ड्राइंग रूम ,किचन या घर का कोई भी हिस्सा ,ऐसी न जाने कितनी वस्तुएं हमें मिल जाएँगी ,जिसकी आवश्यकता शायद हमें नहीं है ,लेकिन उन वस्तुओं को हमारी आवश्यकता थी और आखिरकार हमें उसने अपने अनुसार तैयार कर लिया !आज से दो -तीन दशक पहले शायद बाजार का प्रभाव इतना ज्यादा न था हम पर ,क्योंकि पहले वस्तुएं हमारी आवश्कता के अनुसार तैयार की जाती थी जबकि आज इसके उलट !
आज यहाँ सबकुछ बिकता है ,हर चीज़ की कीमत है ,चाहे हमारी संकृति हो ,हमारी सभ्यता ,हमारी विरासत और चाहे एक एक औरत की इज्ज़त ,जिसकी कीमत बखूबी लगाई जा रही है आज !एक औरत न जाने कितनो की कमाई का साधन है ..क्रीम ,पावडर ,साबुन ,तेल ,बॉडी स्प्रे ,मोटर ,बाइक और न जाने क्या -क्या ,सबकी कमाई का जरिया है एक औरत !उसके चीख- आबरू -जिस्म हर चीज़ की कीमत है ..!
हर रास्ते -चौराहे ,गली -कूंचों हर जगह खड़े नज़र आएंगे उसकी सौदेबाजी करते हुए लोग !
आजकल तो इसकी सबसे ज्यादा मांग हमारे साहित्य , कॉर्पोरेट सेक्टर और सिनेमा के गलियारों में हैं ..जहाँ औरत को एक प्रदर्शनी ,मनोरंजनकारी साधन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ..उसे भोग -विलास की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं माना जाता ..उसके लिए भी use and throw का रूल apply किया जाता है !आजकल तो इसकी सबसे ज्यादा मांग हमारे साहित्य , कॉर्पोरेट सेक्टर और सिनेमा के गलियारों में हैं ..जहाँ औरत को एक प्रदर्शनी ,मनोरंजनकारी साधन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ..उसे भोग -विलास की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं माना जाता ..उसके लिए भी use and throw का रूल apply किया जाता है ! भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल अधिकार माना गया है ,इस अधिकार के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को ये हक है की वो बिना किसी भय के अपने विचारों को प्रस्तुत कर सकता है ,अपने कला का जौहर दिखा सकता है ,अपना विकास कर सकता है ,जिससे हमारे देश का विकास हो हमारी संस्कृति का विकास हो !लेकिन आज जिस कला का प्रदर्शन हमारे साहित्य ,सिनेमा में हो रहा है .वो न केवल हमारी संस्कृति और सभ्यता का ह्रास कर रहे हैं बल्कि खुलेआम अश्लीलता को बढ़ावा भी दे रहे हैं ,जिस तरह साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है उसी तरह सिनेमा भी हमारे देश में हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है तो उसका प्रभाव भी हमारे जीवन पे पड़ता है जिस संविधान के मूल अधिकार की चर्चा हम बड़े जोर -शोर से करते हैं उसी संविधान में मूल कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है ...क्या इनका ये कर्तव्य नहीं की ये अपनी रचनाओं ,गीत -संगीत के द्वारा समाज में गंदगी न फैलाये !प्रसिद्द फिल्म निर्देशक महेश भट्ट का कहना है की कला को हम सीमा में नहीं बांध सकते तो क्या हम उन्हें "आजा चीर दूँ में तेरी पटियाला सलवार "जैसे lyrics लिखने की इज़ाज़त दे सकते हैं !
क्या उनका ये कर्त्तव्य नहीं की वो हमारे देश को हमारे समाज स्वच्छ बनाने में अपनी भूमिका निभाएं !
एक विज्ञापन मैंने देखा ..जिसमें लड़की कहती है की "मेरे इनको बीवी पसंद है खाते -पीते घर की और हॉट भी ",और विज्ञापनों का स्तर तो और गिरा है लड़की लड़के के गुणों को देख के नहीं बल्कि उसके बाइक और बॉडी स्प्रे को देखके आकर्षित होती है !क्या ये सब एक लड़की की सूझबूझ - समझ को नहीं नकारता ,उसे केवल एक वस्तु बना के नहीं पेश करता ??इनलोगों का कहना है की हम प्रयोग करते हैं अपनी कला में जो लोगों को पसंद आ रहा है ,तो क्या ये प्रयोग यूँ ही चलता रहेगा ....
हमारी संस्कृति तो ऐसी न थी ..मनुस्मृति में स्त्री और पुरुष को सामान दर्ज दिया गया है ,ब्रह्म को स्त्री और पुरुष के रूप में बांटा गया है !प्रसिद्द विद्वान् वराहमिहिर ने कहा है-"सती स्त्री सहस्त्रों पुरुषों का उद्धार कर सकती है !पतिव्रता का पति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है !सतियों के व्रत के प्रभावसे उनके पति को कर्मभोग नहीं भोगना पड़ता !"
किसी भी देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व स्त्रियाँ करती हैं !इसलिए सामाजिक ,आर्थिक ,राजनितिक और सांस्कृतिक तौर पे उनकी उपेक्षा करना समाज को आधी ताकत से वंचित करना है उनका विकास अतिआवश्यक है ..लेकिन विकास का रूप इतना घिनौना नहीं होना चाहिए जिसे सुनके हमारे कान फट जाएं ,हमारी रूह कांप जाएं , हमारी नज़रें शर्म से झुक जाएं !मैं एक लड़की हूँ मुझे नहीं पसंद है कोई वस्तु बनना ,देवी बनना ,मूर्ति बनना ..मैं इन्सान हूँ,मैं मानव हूँ ..हम चाहते हैं समान विकास ,हम चाहते हैं समान अवसर !

लेखिका: वंदना सिंह