बुधवार, 28 नवंबर 2012

सृजन : ( Creation by Brahma )

मुझे ये जान के आश्चर्य होता है कि लोग विज्ञान को , आध्यात्म से दूर ले जाने वाली चीज समझे हैं।मेरा मानना है विज्ञान  ही  हमें सही मायने में आध्यात्मिक होने की सीख देती है। परमाणु में इलेक्टोनों की अद्भुद गति को देख के ऐसा लगता है जैसे भगवान् शिव का तांडव नृत्य ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में मौजूद है।"

-डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम( Wings of fire )
   
एक सवाल जो वैज्ञानिक जगत में बार बार उठता है कि किसी विद्वान् ने ये सृष्टि बनायी है या सृष्टि ने विद्वानों को बनाया है ?

ये सवाल बिलकुल मुर्गी और अंडे वाले सवाल की तरह है.
इस पोस्ट में प्राचीन ग्रंथों में वर्णित 'रचना प्रक्रिया Creation-Phenomenon'  का संक्षेप  में उल्लेख करने कि कोशिश कि गयी है और साथ ही साथ उनमें छिपे वैज्ञानिक तथ्यों  को भी सामने लाने की कोशिश की गयी है.
स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारतीय दर्शन "विद्वान्" और "तत्व" दोनों विचारधाराओं के अलग चलते हुए "पुरुष" का वर्णन करता है. पुरुष -मतलब स्वयं , जो विद्वता का द्योतक है .
यही आदि-पुरुष या मौलिक-जीव(Original Being)  भगवत पुराण के अनुसार है -सर्व शक्तिमान भगवान् विष्णु .

Adi-Purush: Supreme God Vishnu
सृष्टि निर्माण के लिए दो क्षेत्र (Realms) अस्तित्व में हैं - निर्गुण क्षेत्र (Spiritual Realm) और आकार क्षेत्र (Material Realm).
निर्गुण क्षेत्र (Spiritual Realm) सभी शुद्ध आत्माओं का निवास स्थल है जो कि वैकुण्ठ ग्रह पर रहती हैं.
आकार आत्माएं ( आपकी और मेरी तरह ) आकार क्षेत्र(Material Realm) के विभिन्न ब्रह्मांडों , विभिन्न गैलेक्सियों, विभिन्न ग्रहों पर जन्म लेती हैं.
आकार क्षेत्र में भगवान् विष्णु के तीन रूप मौजूद हैं:
  1. श्री कारणओदक -शई महा विष्णु / नारायण
  2. श्री गर्भोदक-शई विष्णु / हिरण्यगर्भ
  3. श्री क्षीरोदक-शई विष्णु / परमात्मा
विष्णु का पहला रूप श्री कारणओदक-शई महा विष्णु हैं जो कि लौकिक जल (cosmic water) पर लेटे हुए हैं.'लौकिक जल' या कारण-ओदक (Causal ocean) (जो सब चीजों का कारण हैं) - विष्णु के ही शरीर से निर्गत होता है और आकार क्षेत्र (Material Realm) का निचला आधा हिस्सा इसी से भरा होता है.

Shri Maha Vishnu, lying on the Causal Ocean generated from His own Self
इस समय श्री महा विष्णु आकार निर्माण एक मात्र  की जीवित इकाई हैं.विष्णु के इस रूप को "काल-स्वभाव:" कहा गया है यानी टाइम- स्पेस की नींव (Foundation of time-space Continuum). इन्होने Quantum Physics का आधार बनाया जो सभी दुनिया में हर जगह (at Sub-Atomic as well as Super-Galactic level ) मौजूद है .
भगवान् के इस पहले रूप के साथ की आकार क्षेत्र में सृष्टि रचना की शुरुवात होती है.
Material nature की इस प्रथम अव्यक्त अवस्था को 'प्रधान' कहा जाता था है.
इस चरण तक कोई शब्द, कोई भाव नहीं थे, न ही कोई मन न ही कोई तत्व था, न ही जीवन न ही बुद्धि, न देवता न राक्षस, न ख़ुशी न दुख. इस समय तक न पृथ्वी थी न आकाश न जल न वायु न अग्नि, जीवन के कोई लक्षण जैसे जागना, सोना कुछ भी नही था .
इसीलिए ये ‘प्रधान’  Material Nature का मूल पदार्थ (Original Substance) था जो कि आगे की रचना का आधार बना.
'प्रधान' की तुलना हाल ही खोजे गए Higgs Boson या God Particle से की जा सकती है. 
विज्ञान की दृष्टि में Higgs Boson ही मूल पदार्थ है जिस से सभी चीजों का निर्माण हुआ है. 


God Particle-Higgs Boson: The original matter

 

आकार क्षेत्र में रचना की शुरुवात :

यहाँ सृष्टि निर्माण के प्रकिया को विभिन्न चरणों में वर्गीकृत किया गया है जिन्हें सर्ग कहते हैं .
1. प्रथम सर्ग:
श्री महा विष्णु कि इच्छा के कारण 3 गुणों (सत्व, तमस और रजस) की साम्यावस्था में विक्षोभ उत्पन्न हुआ और इसकी वजह से एक अति सूक्ष्म पदार्थ (subtle imperceptible ) 'महत तत्व' का निर्माण हुआ.

इस  अति सूक्ष्म पदार्थ को हम अपनी भौतिक इन्द्रियों से नहीं देख सकते और इसी महत तत्व से बुद्धि (Intellegence) के साथ साथ अहम् (Ego) का निर्माण हुआ.
यानी यहाँ पे एक सवाल का जवाब मिल जाता है. पुरुष ने ही Subtle Matter और Intelligence दोनों का निर्माण किया है और आगे चल कर इसी से 'मन' का निर्माण होता है.

2.द्वितीय सर्ग:
इस दूसरे चरण में 5 तत्वों का निर्माण होता है.जिन्हें पञ्च महाभूत कहते हैं.इन्ही के विभिन्न combinations से अनगिनत वस्तुओं का निर्माण होता है.

  1. निर्माण के लिए पर्याप्त space (अन्तरिक्ष)
  2. ठोस (थल)
  3. द्रव (जल)
  4. गैस (वायु)
  5. सबसे महत्वपूर्ण: 'ऊष्मा' (अग्नि)
हालांकि वैज्ञानिक आविष्कार ने सृष्टि निर्माण के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है लेकिन मूल कण Higgs  Boson  की खोज 2011 में हो पाना इस बात का सूचक है की ऐसे असंख्य तथ्य हैं जो अभी तक विज्ञान की दृष्टि में नहीं आये हैं. Higgs Boson से ही अन्य subatomic particles जैसे प्रोटोन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रान का निर्माण हुआ है . यहाँ तक की क्वार्क कण भी मूल नहीं हैं वे भी Higgs  Boson  से बने हुए हैं.

यानी प्रधान से महत तत्व का बनना और फिर महत तत्व से पञ्च महा भूत का बनाना वैज्ञानिक रूप से पुष्ट होता है.
पञ्च महा भूत और कुछ नहीं बल्कि द्रव्य-ऊर्जा मॉडल (Mass -Energy  model ) है.
अन्तरिक्ष(1) में उपस्थित पदार्थ(Mass) 'ठोस(2), द्रव(3) और गैस(4)' और ऊष्मा(Energy )(5).





Comparision:Mass-Energy Model and Panch Mahabhut

3. तृतीय सर्ग:
तृतीय सर्ग में दसेंद्रियों (10 Organs) का निर्माण होता है.
जिनमें से 5 ज्ञानेन्द्रियाँ ( sensory organs ) और 5 कर्मेन्द्रियाँ (organs of  action) कहलाती हैं.
ज्ञानेन्द्रियाँ : दृष्टि, श्रवण ,गंध , स्वाद और स्पर्श.
कर्मेन्द्रियाँ : मुख , हाथ , जनद, गुदा और पैर.
निर्माण के इन तीन चरणों को सामूहिक रूप से ‘प्रकृति सर्ग’ कहा जाता है है.
ये निर्माण ब्रह्मा के द्वारा नही हुया है बल्कि भगवान की Natural Energy की वजह से ये सब अस्तित्व में आया जिसे प्रकृति कहते हैं.


जैव विकास की प्रक्रिया का अध्ययन करने पे आपको पता चलेगा की दुनिया में आये शुरुवाती जीवों में सभी १० अंग नहीं थे. लेकिन जैसे जैसे विकास का प्रक्रम आगे बढ़ा एक के बाद एक इन्द्रियों का विकास होना शुरू हुआ. और आज जब हम सबसे विकसित प्रजाति को देखते हैं तो हम पाते हैं कि इनमें ये सभी १० इन्द्रियाँ पूर्ण विकसित रूप में हैं.
इसका अर्थ ये ही है इन सभी इन्द्रियों का विकास पहले से ही योजनाबद्ध था. प्रकृति में ये सारी इन्द्रियाँ मौजूद थी पर शुरूआती जीवो में विकसित नहीं हुयी थीं.

हमारे ब्रह्माण्ड का निर्माण :

सभी आधार भूत संरचनाओं के बाद हमारे ब्रह्माण्ड और अन्य ब्रह्माण्ड का निर्माण शुरू हुआ.
4. चतुर्थ सर्ग:
महा विष्णु के लौकिक शारीर (Cosmic-Body) पर मौजूद असंख्य छिद्रों से अनेक ब्रह्माण्ड निकले.
हिरन्यगर्भ नाम के एक केंद्र से संपूर्ण ब्रह्माण्ड के निकलने की इस घटना को विज्ञान में बिग बैंग कहा गया है।
भगवान् फिर अपने दूसरे रूप में (श्री गर्भोदक-शई विष्णु) प्रत्येक अंडाकार ब्रह्माण्ड में प्रवेश करते हैं.
विष्णु के इस दूसरे रूप में वे के बहुत बड़े सांप 'अनंत' पर  लेटे  हुए हैं. अनंत अपने अपने ब्रह्माण्ड का संरक्षक है.
विष्णु के इस रूप को हिरन्यगर्भ (Born-of-The-Golden-Egg) भी कहते हैं क्योंकि वे ब्रह्म अंड (Universal Egg) में आकार लेते हैं.



Each Universe emerging from Maha-Vishnu contains a Garbhodak-shayi Vishnu

1000 महा युग के बाद में भगवान के नाभि से एक कमल की कलि निकलती है जिसमे से जन्म होता है 'ब्रह्मा' का.
'ब्रह्मा' : प्रत्येक ब्रह्मांड की पहली अमर इकाई ( Mortal Being ).

Shri Garbhodakshayi Vishnu becomes visible to Lord Brahma 
एक नवजात शिशु की तरह ब्रह्मा हर चीज से अनजान थे. उन्होंने अपने मुख  से सबसे पहला शब्द बोला 'ऊं' .उन्हें अपने होने का कारण भी नहीं पता था .अपने चारों ओर उन्हें अन्धकार के अलावा कुछ भी नहीं दिख रहा था.
तब उन्होंने कमल के तने के साथ आगे बढ़ना तय किया किन्तु वहां भी उन्हें Dead End मिला.
फिर ब्रह्मा ने 100 महा युग तक ध्यान योग किया और अंत में उन्हें श्री गर्भोदक शई विष्णु नजर आये. विष्णु के द्वारा दी गयी दिव्य दृष्टि से ब्रह्मा को गर्भ सागर पे लेटे हुए नीले शरीर वाले विष्णु का दर्शन हुआ.
श्री हरी विष्णु ने तब ब्रह्मा को उनके होने का कारण बताया और ये भी बताया की उन्हें कितना बड़ा काम करना है.
ब्रह्मा निरुत्तर थे . ये बिलकुल उसी तरह की बात है जैसे आपके बॉस ने आपको एक बहुत बड़ा नया प्रोजेक्ट बनाने को कहा हो आपको ये भी न पता हो की ये प्रोजेक्ट है क्या और कैसे करना है ? सौभाग्य से यहाँ पे बॉस स्वयं आदि पुरुष भगवान् विष्णु थे जिन्होंने ब्रह्मा को बताया की सृजन का काम भगवान् के अपने शरीर के हिस्से की सहायता से शुरू किया जाए.
यहाँ से ब्रह्मा के द्वारा वास्तविक निर्माण का काम शुरू होता है.
Lord Brahma, First MORTAL Living Being in EACH Universe


प्रत्येक ब्रह्माण्ड के लिए विष्णु का अपना एक रूप था और साथ में ब्रह्मा का भी .
यानी वहां करोड़ों करोड़ों ब्रह्मा अपने अपने ब्रह्माण्ड के निर्माण कार्य में लगे हुए थे.
ब्रह्मा ने पहले निर्जीव चीजें बनायी जैसे ग्रह, पर्वत , भूमि इत्यादि. जिनमें स्वयं गति करने की क्षमता नहीं थी.
निर्माण के इस चौथे चरण को ‘मुख्य सर्ग’ कहते हैं.

Lord Brahma begins Creation

5. पंचम सर्ग:
अगले चरण जिसे तिर्यक सर्ग कहते हैं में ब्रह्मा ने 6 विभिन्न प्रकार की vegetation का निर्माण किया. यहीं पे पेड़ पौधों वनस्पतियों की रचना हुयी. 28 प्रकार के पशुओं और 12 प्रकार के पक्षियों का निर्माण हुआ.

बिग बैंग थ्योरी के अनुसार एक केंद्र से सभी ब्रह्मांडों का निष्कासन हुआ. द्रव्य-ऊर्जा के प्रादर्श से सभी ग्रहों पर रासायनिक अभिक्रियाँ शुरू हुयी और निर्जीव चीजों का निर्माण शुरू हुआ. पहले छोटे अणु ( जैसे N2 , H2, O2 ,H2O,NH3 आदि) बने फिर थोड़े वृहद् अणु (जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि ) का निर्माण हुआ. इन वृहद् अणुओं से निम्न स्तरीय वनस्पति (जैसे कवक,शैवाल आदि ) बने और फिर वृहद् वनस्पतियाँ बनीं.
और इसके बाद पहले निम्न स्तरीय जंतु और उच्च स्तरीय जंतु बने.
जैव विकास के प्रक्रम का विस्तार से वर्णन अगली पोस्ट "दसावतार" में किया जायेगा.

6.छठा सर्ग:
छठे चरण में Demigods (यक्ष) का उद्भव हुआ. इसीलिए इसे देव सर्ग कहा गया है.
सभी प्रकार की दिव्य रचनाएं इसी चरण में बनीं:
सबसे पहले 4 चिरकालिक कुमारों (4 Eternal  Kumaras ) आये. ब्रह्मा के बनाये हुए चार बच्चे ब्रह्मा के सामान ही चिरंजीवी हैं लेकिन वे ब्रह्मा के बजाए विष्णु के अनुयायी बने.
इस बात से क्रोधित ब्रह्मा के ललाट से गहरे लाल और नील रंग के शिशु का जन्म हुआ.
इस चिल्लाते-रोते शिशु का नाम रखा गया - रूद्र .
लेकिन रूद्र ने भी तपस (Penance) का रास्ता अपनाना तय किया. इस बात से ब्रह्मा निराश हुए. लेकिन अंत में उन्होंने उसे अपनी सहायता करने के लिए मना लिया. तब रूद्र स्वयं के समान ११ भागों में विभाजित हो गया.
 


सृष्टि निर्माण के समय ये सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि ऎसी इकाई बनायी जाए जो गुणन (जनन)  करने की क्षमता रखती हो. शुरुवात में बने चारों मुख्य घटक - जल, प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट और वसा जनन करने की क्षमता नहीं रखते थे.
इसीलिए इसके बाद ऐसी इकाई बनी जिसमें जनन के शुरूआती लक्षण दिखाई दिए.
'बैक्टीरिया' ऐसे जीव जिनमें Binary  Fission होना संभव हुआ. यानी अपने ही सामान अनेक जीवों में विभाजित होने की क्षमता. यहाँ कायिक जनन की शुरुवात हुयी.





ब्रह्मा के अनुरोध पर रूद्र अर्धनारीश्वर के रूप में आये और मादा सिद्धांत का जन्म हुआ जिसका नाम था रुद्राणी .

बैक्टीरिया के बनने तक उसमें नर और मादा का विभेद नहीं था किन्तु कुछ उच्च स्तरीय बैक्टीरिया में + स्ट्रेन और - स्ट्रेन बनने लग गयी. यहाँ अलैंगिक जनन की शुरुवात हुयी.और फिर थोड़ी और विकसित प्रजातियों में पूर्ण रूप से नर और मादा का विभेद हो गया.

अपने बनाई कृति रूद्र को संख्या में बढ़ते देख कर ब्रह्मा को कुछ संतुष्टि तो मिली , रूद्र के इस भयंकर रूप के कारण उसे भगवान की विनाशक शक्ति (Supreme Lord's power of Destruction) के रूप में देखा गया.

जिस तरह से जगत में जीवों का जन्म आवश्यक है उसी तरह से उनका विनाश भी आवश्यक है.आज हम देखते हैं की पृथ्वी पर असंख्य जीव जंतु पैदा होते हैं अगर इनका विनाश न होता तो पृथ्वी कई सतह अनगिनत जीवों और लाशों से भर गयी होती.किन्तु बैक्टीरिया ऐसे जीव हैं जो हर समय अन्य जीवों का विनाश करने में लगे रहते हैं. और मृत शरीरों का भक्षण करते पृथ्वी को साफ़ बनाये रखते हैं.

Bacteria:The destructor


ब्रह्मा को यह महसूस हुआ की रूद्र की संतान वो नहीं हैं जो वे बनाना चाहते थे तब उन्होंने १० मानसपुत्र बनाए.
मन निर्मित ब्रह्मा के ये १० मानस पुत्र थे- अत्री, अंगीरस, अथर्व, भृगु, दक्ष, मरीचि, पुलह, पुलत्स्य, वसिष्ठ और सबसे छोटा नारद .
जब इन १० पुत्रों ने भी विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बनने की बजाय कुमारों के रास्ते पे चलना तय किया तब ब्रह्मा फिर नकारात्मक ऊर्जा से भर गए.
इसके परिणाम स्वरुप ब्रह्मा ने असुरों का निर्माण किया. ब्रह्मा ने इन्हें इनके तामसिक रास्ते पे चलने दिया, ये रात्री समय का निर्माण था.

Asuras or Demons

अपनी शक्तियों को केन्द्रित करके ब्रह्मा ने फिर से सात्विक रास्ता अपनाते हुए देवताओं का निर्माण किया. प्रत्येक देव आकार निर्माण के विभिन्न घटक के संरक्षक बने. ये दिन के समय का निर्माण था.

Devas or Demigods

इसके बाद ब्रह्मा ने पित्र का निर्माण किया. और फिर अन्य देवी देवताओं जैसे गायत्री , सरस्वती , प्रसूति , चार वेद, भावनाएं , संगीत और ऋषि कर्मकांड.
प्रसूति पहले मानस पुत्र यक्ष की पत्नी बनी और यहीं से लैंगिक जनन की शुरुवात हुयी.
Copulative Reproduction between Yaksh and Prasuti

इसी के साथ देव सर्ग समाप्ति की ओर बढ़ा ,ब्रह्मा ने जो काफी थक चुके थे अब एक विराम का निर्णय किया. वे अपने अब तक के निर्माण कार्य को देखने लगे और उन्होंने तीसरा रूप लिया राजसिक (mode-of-passion).
इसी समय उन्होंने अपने ही समान दिखने वाली महान कृति का निर्माण किया , जिसका नाम था 'स्वम्भू मनु' . पहला मानव जो कि 'काया' के साथ पैदा हुआ (का- ब्रह्मा , या- रूप).
Swayambhu Manu, the First Man

ये बात बहुत ही रोचक  है कि बाइबिल  भी यही  घटना लिखी है   'Man was created in the Image of His Maker!'
यह भी रोचक है कि जर्मनी की जन जातियां अपने पूर्वज को मानुष कहती है.
मनु शब्द अंग्रेजी के शब्द 'Man' का भी मूल है और हिंदी के शब्द 'मनुष्य' का भी मूल है.
मनु के साथ एक नारी भी बनाई गयी थी जिसका नाम था सतरूपा. ब्रह्मा ने मनु और सतरूपा को पृथ्वी ग्रह पे भेज दिया.
पृथ्वी पे मनु और सतरूपा के संततियों ने संपूर्ण ग्रह पर पीढ़ी दर पीढ़ी गुणन करना शुरू किया जो आज तक चल रहा है.
Manu and Shatrupa - Adam and Eve - Aadam and Houwa

7.सांतवे सर्ग में मनुष्य के विकास का वर्णन है इसलिए इसे मनुष्य सर्ग कहते हैं
8.आंठ्वे सर्ग जो की अनुग्रह सर्ग के नाम से जाना जाता है में अन्य प्रजातियों का वर्णन है
9.नवें और अंतिम सर्ग  में कुमारों के पुनरागमन की कहानी लिखी है.
और यहाँ पर ब्रह्मा के द्वारा निर्माण की प्रक्रिया का अंत होता है.
एक पाठक के रूप में आप इस पोस्ट को पढ़ते हुए और एक लेखक के रूप में मैं इस पोस्ट को लिखते हुए कितना थक गए हैं , इससे हम ब्रह्मा की उस समय की स्थिति की कल्पना कर सकते हैं.

Brahma heaves a sigh of relief!
समाप्ति से पहले विष्णु के तीसरे रूप की बात कर लेते हैं -श्री क्षीरोदक शयी विष्णु जो निर्माण की हर इकाई (परमाणु) में परमात्मा के रूप में मौजूद हैं.समाप्ति से पहले विष्णु के तीसरे रूप की बात कर लेते हैं -श्री क्षीरोदक शयी विष्णु जो निर्माण की हर इकाई (परमाणु) में परमात्मा के रूप में मौजूद हैं.
Lord Vishnu: Present in every Atom
इनका विस्तृत वर्णन मेरी अगली पोस्ट "दसावतार" में आएगा. क्योंकि विष्णु के इस तीसरे रूप से  ही सभी अवतारों का जन्म होता है.



Concept of creation according our scripture as well as according to modern science

रविवार, 25 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-2)


इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1) मे आप ने पढ़ा की तमाम संधियों और युद्धों के बाद भी किस प्रकार  इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद अब अरबों यहूदियों,यूरोप और संयुक्त राष्ट्र के बीच एक जटिल समस्या बन गया ॥ भाग 1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे 

अरब बिद्रोह के बाद ब्रिटेन की सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया जिसके अनुसार हर साल मे 10 हजार यहूदी परिवारों को फिलिस्तीन मे 5 सालो के लिए बसने की अनुमति होगी। उसके बाद अरबों के अनुमोदन के बाद ही वो फिलिस्तीन मे रह सकते है। यहूदियों ने इस श्वेत पत्र को सिरे से नकार दिया । अब यहूदियों और अरबों का फिलिस्तीन पर कब्जे के लिए संघर्ष भूमिगत सशस्त्र समूहो के माध्यम से शुरू हो गया जिसमे प्रकारांतर से ब्रिटेन ,नाजी और अरब देश भी सहायक होने लगे । स्वेत पत्र के बाद यहूदियों ने अरबों के साथ साथ ब्रिटेन को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया था । अब सारे यहूदी बिद्रोही समूह एकजुट होकर ब्रिटेन के अधिकारियों क्लबो और ट्रेनों को निशाना बनाने लगे । वो किसी भी प्रकार ब्रिटेन को फिलिस्तीन से बाहर कर देना चाहते थे ।
सन 1945 मे ब्रिटेन मे लेबर पार्टी की सरकार आई और उसने यहूदियों को ये आश्वासन दिया की वो  ब्रिटेन सरकार के स्वेत पत्र को वापस लेंगे और यहूदियों की मातृभूमि का समर्थन करेंगे साथ ही साथ विश्व के हर कोने से यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वसन की प्रक्रिया दोगुनी की जाएगी ।हालांकि यहूदी बिद्रोही समूहों के लिए ये आश्वासन भर सिर्फ काफी नहीं था उन्होने अवैध रूप से यहूदियों को फिलिस्तीन मे लाना जारी रखा । अमरीका और अन्य देशो ने भी अब ब्रिटेन पर फिलिस्तीन मे यहूदियों के पुनर्वास के लिए दबाव डालना शुरू किया । एक एंग्लो - अमेरिकन जांच के लिए समिति ने तत्काल 1 लाख यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वास की सिफ़ारिश की । इसका अरबों ने विरोध किया और वो भी ब्रिटेन पर दबाव डालने लगे ॥ 
ये वो समय था जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो रहा था । अब ब्रिटेन के लिए फिलिस्तीन एक गले की हड्डी बन गया था ब्रिटेन ने कोई सूरत न देखते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र के हवाले करके खुद को विवाद से अलग करने मे भलाई समझी और फिलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण अब संयुक्त राष्ट्र के हाथो मे था ॥
संयुक्त राष्ट्र ने अर्ब और यहूदियों का फिलिस्तीन मे टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित कर दिया । जेरूसलम जो ईसाई 
,अरब और यहूदी तीनों के लिए धार्मिक महत्त्व का क्षेत्र था उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन के अंतर्गत रखे जाने का प्रस्ताव हुआ ।इस व्यवस्था में जेरुसलेम को " सर्पुर इस्पेक्ट्रुम "(curpus spectrum) कहा गया ।  29 नवम्बर 1947 को संयुक्त राष्ट्र मे  ये प्रस्ताव पास हो गया । यहूदियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि अरबों ने इसे नकार दिया। इस प्रस्ताव के अंतर्गत फिलिस्तीन को दो बराबर हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित किया जाना था मगर इस विभाजन मे सीमा रेखा काफी जटिल और उलझी हुई थी। इस कारण थोड़े ही दिन मे ये परिलक्षित हो गया की ये विभाजन लागू नहीं किया जा सकेगा। इस विभाजन मे फिलिस्तीन की 70% अरब लोगो को 42% क्षेत्र मिला था जबकि यही लोग विभाजन के पहले 92% क्षेत्र पर काबिज थे अतः किसी भी प्रकार से ये विभाजन अरबों को मान्य नहीं था । 
सन 1948 के मई महीने मे ब्रिटेन की सेनाएँ वापस लौट गयी हलाकी इस समय तक इज़राइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पायी थी। अब यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों मे खूनी टकराव शुरू हो गया । १४ मई, १९४८ को यहूदियों ने स्वतन्त्रता की घोषणा करते हुए इज़राइल नाम के एक नए देश का ऐलान  कर दिया। अगले ही दिन अरब देशों- मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक़ ने मिलकर इज़राइल पर हमला कर दिया। इसे 1948 का युद्ध का नाम दिया गया और यही से अरब इज़राइल युद्ध की शुरुवात हो गयी। इज़राइल के इस संघर्ष को अरबों ने "नक़बा" का नाम दिया हजारो अरब बेघर हुए और इज़राइली कब्जे वाले इलाको से खदेड़ दिये गए। हालांकि इज़राइली हमेशा ये कहते आए की ये सारे अरब लोग अरब की सेनाओं को रास्ता देने के लिए भाग गए थे ,मगर इज़राइल ने एक कानून पारित किया जिसके अनुसार जो फिलिस्तीनी (अब इज़राइली अरब) नक़बा के दौरान भाग गए थे वो इज़राइल वापस नहीं आ सकते और उनकी जमीनो पर विश्व के सभी हिस्सों से आने वाले यहूदियों को बसाने लगी इज़राइली सरकार ।युद्ध के शुरुवाती कुछ महीनो मे अरब देशो  की सेना इज़राइल पर भारी पड़ रही थी जून 1948 मे एक  युद्ध विराम ने अरबों और इजराइलियो दोनों को पुनः तैयारिया करने का मौका दिया यही अरब देश गलती कर बैठे और इजराइलियों ने तैयारी पूरी की चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से अब युद्ध का पलड़ा इजराइलियों की तरफ झुक गया और अंततः इजराइलियों की विजय और अरबों की इस युद्ध मे हार हुई । इसके साथ साथ शरणार्थी समस्या की शुरुवात ।
इज़राइल फिलिस्तीन का मानचित्र समयानुसर 
1949 मे समझौते से जार्डन और इज़राइल के बीच ग्रीन लाइन नामक सीमा रेखा का निर्धारण हुआ। वेस्ट बैंक(जार्डन नदी के पश्चिमी हिस्से) पर जार्डन और गाजा पट्टी पर मिस्र(इजिप्ट) का कब्जा हो गया । इस पूरे घटनाक्रम मे लगभग 1 लाख फिलिस्तीनी बेघर हुए॥ ये सभी फिलिस्तीनी आस पास के अरब देशो मे जा शरणार्थी के रूप मे जीवन व्यतीत कर रहे थे ॥  इज़राइल को ११ मई ,१९४९  को सयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल  हुई । हलाकी अरब देशो  ने कभी भी इस समझौते को स्थायी शांति समझौते के रूप मे स्वीकार नहीं किया । और दूसरी तरफ इज़राइल भी फिलिस्तीनी  शरणार्थीयों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद इजराइलियों और फिलिस्तीनीयों अरबों के बीच खूनी संघर्ष जारी रहा । सन 1964 मे फिलिस्तीन लिबरेशन के गठन के बाद 1965 मे फिलिस्तीनि क्रांति की शुरुवात हो गयी।फिलिस्तीन लिबरेशन का गठन इज़राइल को खतम करने के उद्देश्य से हुआ था । इधर अमरीका ने अरब मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इज़राइल को हथियारों और आर्थिक मदद देनी शुरू की। जून ५,१९६७ को इजराइल ने मिस्त्र ,जोर्डन सीरिया तथा इराक के खिलाफ युद्ध घोषित किया और ये युद्ध 6 दिनो तक चला इस युद्ध ने अरब जगत के सभी समीकरणों को बदल के रख दिया इज़राइल ने 1947 के यूएन क्षेत्र से कई गुना अधिक भू भाग एवं पर कब्जा कर लिया  और अब गाजा पट्टी पर भी इज़राइली कब्जा था । 6 अक्तूबर 1973 को एक बार फिर सीरिया और मिस्र ने इज़राइल पर हमला किया मगर इसमे भी उन्हे हार का सामना करना पड़ा और भूभाग गंवाना पड़ा ।1974 के अरब अरब शिखर सम्मेलन मे पीएलओ को फिलिस्तीनी लोगो का प्रतिनिधि के रूप मे अधिकृत किया ।  अब संयुक्त राष्ट्र संघ मे फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व पीएलओ के नेता यासर अराफात कर रहे थे । इसके बाद एक तरफ कंप डेविड से लेकर ओस्लो तक शांति समझौते होते रहे तो दूसरी ओर पीएलओ और मोसाद मे खूनी संघर्ष जारी था। मगर इज़राइल और फिलिस्तीन की सीमा का निर्धारण नहीं हुआ ।
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात इज़राइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने. अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया ।अनवर सादात  ने  1977 मे इसराइली संसद में भाषण दिया. सादत ने चुकी इजराइलियो से संधि की अतः अरब चरमपंथियों ने बाद मे उनकी 1981 मे हत्या कर दी। 1987 मे फिलिस्तीनीयों ने मुक्ति के लिए आंदोलन किया और उनका इज़राइली सेनाओं से टकराव शुरू हो गया । 13 सितंबर 1993 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मध्यस्थता मे इज़रायली प्रधानमंत्री यित्साक राबीन और फिलस्तीनी स्वायत्त शासन के अध्यक्ष यासिर अराफत ने नार्वे की राजधानी ओस्लो मे ओस्लो शांति समझौता किया, समझौता के अनुसार इज़राइल 1967 से अपने क़ब्ज़े वाले फिलस्तीनी इलाकों से हटेगा। एक फिलस्तीनी प्रशासन स्थापित किया जाएगा और एक दिन फिलस्तीनियों को एक देश के तौर पर स्वतंत्रता मिलेगी। गाजा पट्टी के फिलिस्तीन के कब्जे मे आते ही हमास की हिंसक गतिविधियां और तेज हो गयी और उसी अनुपात मे इज़राइली प्रतिरोध । ओस्लो समझौते से जिस अरब इज़राइल संघर्ष पर विराम लगता प्रतीत हुआ समस्या पुनः वही आ के खड़ी  हो गयी॥ समय समय पर हमास द्वारा इज़राइल पर गाजा पट्टी से हमले किए जाते रहते हैं और इज़राइल के लिए अपने नागरिकों की  आत्मरक्षा के लिए बार बार युद्ध ॥॥इजरायल हर हमले के बाद कहता है की वो हमास को निशाना बना रहा है लेकिन अरब  देश इन हमलो मे आम मुसलमानो के मारे जाने की बात कहते हैं॥   इस्लाम यहूदी और ईसाई धर्म के उत्पत्ति काल से जुड़ी हुई ये समस्या अरब और पश्चिमी जगत के  सामरिक हितो के कारण और भी जटिल होती जा रही है आज भी लाखो फिलिस्तीनी शरणार्थी घर वापसी की रह देख रहे हैं तो दूसरी ओर इज़राइल हमास के हमलो से निपट रहा है। 
गाजा पट्टी पर इज़राइली बमबारी का एक दृश्य 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)

हम अक्सर अरब इज़राईल और इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के बारे मे सुनते रहते हैं। अभी हाल  के दिनो मे भी दोनों देश के मध्य हुए  भयानक युद्ध के कारण जानमाल की काफी क्षति दोनों पक्षो को उठानी पड़ी॥ इस विवाद के मूल मे जाए तो इस विवाद की शुरुवात 19वी शताब्दी के अंत मे प्रखर होते अरब राष्ट्रवाद और यहूदी राष्ट्रवाद मे है।
यहूदी धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म से पूर्व का धर्म है । इनकी धार्मिक पुस्तक को ओल्ड टेस्टामेण्ट कहते हैं,जिसे बाइबिल का प्रथम भाग  या पूर्वार्ध भी कहते हैं।" पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम), जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे उन्हे इस धर्म का प्रवर्तक कहा जाता है  । पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। हजरत अलै. याकूब का एक नाम इजरायल भी था,जिसके नाम पर आज का यहूदी राष्ट्र इजरायल है । हजरत अलै. याकूब के एक पुत्र का नाम जूदा या यहूदा था यहूदा के नाम पर ही इसके वंशज यहूदी कहलाए । अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहम, अब्राहम से मूसा, यहाँ तक ईसाई इस्लाम और यहूदी सभी धर्मो के पैगंबर एक ही है
मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह को अब्राहम का वंशज मान कर एक समुदाय ने ईसाई धर्म को मानना शुरू किया जबकि बाइबिल के ओल्ड टेस्टमेंट को मानने वालों ने ईसा मसीह  को ईश्वर का पुत्र स्वीकार नहीं किया और वो अब तक अपने मसीहा के अवतार के इंतजार मे है। ओल्ड टेस्टामेण्ट मे कही भी ये स्पष्ट नहीं है की ईश्वर का मसीहा कब अवतरित होगा। इस्लाम की तरह ये एकेश्वरवाद मे विश्वास रखते हैं । मूर्ति पूजा के विरोधी यहूदी खतने पर भी इस्लाम के साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं।
4000 साल पुराने यहूदी धर्म का आधिपत्य मिस्र,इराक, इजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। धीरे धीरे यहूदी भी इज़राइल और जुड़ाया कबीलो मे बट गए ये लोग फारसी यूनानी और ग्रीक कई शासनो के अधीन रहे। रोमन साम्राज्य के बाद जब ईसाई धर्म का उदय हुआ तो यहूदियो पर अत्याचार शुरू हो गए॥ इस्लाम के उदय के बाद इन पर अत्याचार का बढ़ाना  स्वाभाविक था। धीरे धीरे यहूदियों के हाथ  से उनका देश इज़राइल जाता रहा और प्राचीन काल से 20वी शदी तक यहूदियों पर जितने अत्याचार हुए हैं शायद ही किसी जाति पर हुआ हो ॥हिटलर की यहूदियों से दुश्मनी और लाखों यहूदियों की सामूहिक नर संहार इसी कड़ी का उदाहरण है। आज भी पूरा अरब जगत इज़राइल का नामोनिशान मिटा देना चाहता है ।
निरंतर होते अत्याचारो के कारण यूरोप के कई हिस्सों मे रहने वाले यहूदी विस्थापित हो कर फिलिस्तीन आने लगे। 19वी शताब्दी के  के अंत तक यहूदी मातृभूमि (Jewish Homeland") इज़राइल  की मांग जोरों शोरों से उठने लगी ।यहूदियों ने  फिलिस्तीन के अंदर एक अलग राज्य यहूदी मातृभूमि  की मांग की जो जर्मनी या तुर्की के अधीन हो । उन्होने उस समय फिलिस्तीन की मुसलमान जनसंख्या को नजरंदाज कर दिया । यहूदियों का ये सोचना की मुसलमान जनसंख्या यहूदी मातृभूमि की मांग स्वीकार होने के बाद आस पास के अरब देशो मे चली जाएगी ,इस विवाद की नीव मे था ।  यहूदियों ने उस फिलिस्तीन की कल्पना की जिसमे यूरोप से आए हुए लाखो यहूदी निर्णायक बहुमत मे होंगे । प्रथम जियोनिस्ट कांग्रेस की बैठक स्विट्जर लैंड मे हुआ और वहाँ World Zionist Organization (WZO). की स्थापना की गयी । तमाम बैठको और वार्तालापों के बाद 1906 मे विश्व यहूदी संगठन (WZO) ने फिलिस्तीन मे यहूदी मातृभूमि बनाने का निर्णय लिया ।इससे पूर्व अर्जेन्टीना को यहूदी मातृभूमि बनाने को लेकर भी चर्चा हुई थी।
यहूदियों की ये यहूदी मातृभूमि  की कल्पना फिलिस्तीन की बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या के कारण एक कभी न खत्म होने वाले विवाद का कारण बन रही थी 1914 तक फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या लगभग 7 लाख थी जिसमे 6 लाख अरब मूस्लिम थे और लगभग 1 लाख यहूदी । प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने जर्मनी आस्ट्रिया और हंगरी के साथ मित्र सेनाओं (जिनमे ब्रिटेन भी शामिल था) के विरोध मे  गठबंधन कर लिया। उस समय फिलिस्तीन पर तुर्की सेना का शासन था । इस युद्ध से अरबों और यहूदियों दोनों का भरी नुकसान हो रहा था उसी समय तुर्की के सैनिक शासन ने फिलिस्तीन से उन सभी यहूदियों को खदेड़ना शुरू किया जो रूस और यूरोप के अन्य देशो से आए हुए थे । इसी समय ब्रिटेन ने  अरब और फिलिस्तीन को तुर्की शासन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्धता जताई बशर्ते अरब देश और फिलिस्तीन तुर्की के विरोध मे मित्र सेनाओं का साथ दे।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने एक गुप्त समझौते  जिसे Sykes-Picot Agreement भी कहते है के अंतरगत  पूरे अरब जगत को दो "प्रभाव क्षेत्रों" मे बाट दिया गया जिसमे रूस की भी स्वीकृति थी । इसके अंतरगत सीरिया और लेबनान फ्रांस के प्रभाव क्षेत्र मे जॉर्डन इराक और फिलिस्तीन ब्रिटेन के क्षेत्र मे और फिलिस्तीन का कुछ क्षेत्र मित्र देशो की संयुक्त सरकार  के क्षेत्र मे था । रूस को  लिए इस्तांबुल, तुर्की और अर्मेनिया का कुछ इलाका मिल गया ।
ब्रिटेन को यूएन जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन और यहूदी मातृभूमि का क्षेत्र  
सन 1917 मे  ब्रिटेन के विदेश सचिव लार्ड बेलफोर और यहूदी नेता लार्ड रोथसचाइल्ड के बीच एक पत्रव्यवहार हुआ जिसमे लार्ड बेलफोर ने ब्रिटेन की ओर से ये आश्वासन दिया था की फिलिस्तीन को यदियों की मातृभूमि के रूप मे बनाने के लिए वो अपना सम्पूर्ण प्रयास करेंगे हालाँकि जनसंख्या के हिसाब से फिलिस्तीन मे  मुसलमान आबादी उस समय फिलिस्तीन की कुल आबादी की तीन चौथाई से भी ज्यादा थी। इस पत्रव्यवहार को बाद मे “The Balfour declaration”. का नाम दिया गया। मगर अब फिलिस्तीन मुस्लिमो ने "Balfour declaration" का विरोध करना शुरू किया।15 अप्रैल सन 1920 को इटली मे हुए San Remo Conference(सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे मित्र देशो ने अमरीका ने फिलिस्तीन के लिए ब्रिटेन को अस्थायी जनादेश  दिया समझौते के अनुसार ब्रिटेन जो की फिलिस्तीन का प्रशासन देखेगा वो फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि के रूप मे विकसित करने के लिए राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाएगा। 

इस जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदी हितो को देखने वाली अजेंसी "The Jewish Agency for Palestine,"  से ब्रिटेन का प्रशासन सामंजस्य बना के यहूदी हितों एवं उनके पुनर्वास को आसान करेगा। सन 1920 मे ही ब्रिटेन ने सर हरबर्ट सैमुएल को ब्रिटेन  के फिलिस्तीन कमे पहले  उच्चायुक्त के रूप मे भेजा। (सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे जो क्षेत्र यहूदी मातृभूमि के लिए निर्धारित किया गया था वो यहूदी संगठनो की मांग की अपेक्षा काफी बड़ा क्षेत्र था । ये बात भी काही जाने लगी की ये निर्धारण चर्च ने किया और कही कही ऐसे भी विचार रखे गए की ब्रिटेन के पास यहूदी मातृभूमि के लिए कोई सुदृढ़ खाका नहीं था।
सन 1922 मे ब्रिटेन ने जनादेश  वाले हिस्से को दो हिस्सों मे बाट दिया पहला हिस्सा जो अपेक्षाकृत बड़ा था वो ट्रांसजार्डन(बाद मे जार्डन) कहा गया और छोटा हिस्सा फिलिस्तीन कहा गया। दोनों हिस्से ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र मे ही थे । बाद मे जार्डन को एक स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता मिल गयी । मगर इसके साथ यहूदियों का एक बड़ा हिस्सा इसे अपने साथ किए गए विश्वासघात के रूप मे देखने लगा क्यूकी  प्रस्तावित यहूदी मातृभूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा ट्रांसजार्डन के रूप मे उनके हाथ से निकाल चुका था ।
ट्रांसजार्डन अलग करने के बाद बचा क्षेत्र 
अब जैसा की मित्रदेशों का ब्रिटेन को जनादेश था फिलिस्तीन मे एक स्थानीय और स्वशासनीय सरकार का प्रबंध मगर यहूदी ऐसे किसी भी स्वशासनीय सरकार  के प्रबंध से डरे हुए थे क्यूकी इसमे जनसंख्या के अनुपात से अरबों की  बहुलता हो जाती दूसरी तरफ अरबों को कोई भी ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं थी जिसमे यहूदियों की कोई भी भागीदारी हो। अतः किसी भी प्रकार की व्यवस्था नहीं बन पायी॥ 

अब धीरे धीरे अरबों और यहूदियों मे टकराव शुरू हो गया और दंगे होने लगे । अरबों के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदियों के विश्व के अन्य हिस्सो से आ के बसने  के कारण फिलिस्तीनी अरबों को निर्वासित होना पड़ेगा । नाजियों से पहले भी पोलैंड और पूर्वी यूरोप के कई भागो से यहूदी फिलिस्तीन आने लगे हिटलर के नाजी शासन मे यहूदी एजेंसियों ने हिटलर से एक समझौता कर हजारो लोगो को फिलस्तीन मे बसाकर उनकी जान बचाई। सन 1936 मे अरबों ने विद्रोह  कर दिया। विद्रोह का कारण ब्रिटेन के फौजों द्वारा  एक मुस्लिम धर्मगुरु की हत्या थी जो फिलिस्तीन मे यहूदियों और ब्रिटेन के खिलाफ झण्डा उठाए हुए था। इस विद्रोह मे हजारो अरब और यहूदी मारे गए। इस विद्रोह को हवा देने मे यहूदियों का कट्टर दुश्मन हिटलर और इटली के फासिस्ट शामिल थे । इसके बाद इंग्लैंड ने एक प्रस्ताव रखा जिसमे एक  यहूदी मातृभूमि दूसरा फिलिस्तीनी अरबों का क्षेत्र होगा इसे अरब देशो ने नकार दिया ॥
गाजा पर बमबारी का एक दृश्य 

अगले लेख मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा इज़राइल फिलिस्तीन का विभाजन ,गजापट्टी का स्थानातरण और फिलिस्तीन इज़राइल के मध्य हुए कई समझौते एवं कभी न खतम होने वाले युद्ध का वर्णन 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी




आज सुबह अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गयी ॥ सभी हिंदुस्थानियों के लिए खुशी की मगर अप्रत्याशित खबर और पिछले 8 साल के कांग्रेस शासन की सबसे अप्रत्याशित खबर । हालांकि  मुंबई पर हमलावर के लिए ये सजा कोई अप्रत्याशित नहीं थी मगर अप्रत्याशित है फाँसी देने का समय । गुजरात चुनावों मे 1 महीने का भी समय नहीं बचा है । और ये बात पूरी तरह से काही जा सकती है की कहीं न कहीं कांग्रेस सरकार के नीति निर्धारक अफजल और कसाब के मुद्दे पर चुनावो से पहले हाथ डालकर कोई नया प्रयोग नहीं करना चाहते होंगे।  इसलिए भी फाँसी की टाइमिंग पर सवाल उठने लाज़मी है । कुछ दिनो पहले खबर आई थी की कसाब को डेंगू है ।दबे जबान मे ये बाते भी उठने लगी है कसाब डेंगू से मरा सरकार ने इज्जत बचाने के उद्देश्य से आनन फानन मे इसे फाँसी मे तब्दील कर दिया । कुछ विचारणीय है की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री  के अनुसार कसाब को यरवडा जेल में ही दफना दिया गया मगर जेल मैन्युएल के अनुसार उस धर्म का कोई धर्मगुरु फाँसी देने के बाद अंतिम क्रिया के समय उपस्थित रहना चाहिए ध्यान रहे ओसामा को दफनाने की खबर मे भी ये ध्यान रखा गया था मगर भारत सरकार की जल्दी का कारण क्या था ? फाँसी की सजा की रेकार्डिंग(फाँसी होने के पूर्व तक की) या कोई अन्य साक्ष्य भी जारी नहीं किए गए जिससे पता चले की कसाब को फाँसी ही हुई है ।। इन सारे सवालो से बचने के लिए सरकार को कसाब के फाँसी के पहले तक की रेकार्डिंग सार्वजनिक करनी चाहिए ।जो कांग्रेस अफजल गुरु की फाँसी पर चीख चीख कर बोलती थी की राष्ट्रपति के पास फाँसी की  दया याचिका क्रमानुसार भेजी जाएगी इसलिए अफजल को अभी फाँसी नहीं दे सकते उसी कांग्रेसी गृहमंत्रालय ने अचानक 17वें नंबर के कसाब को पहले नंबर पर क्यू रखा?? इधर कसाब का वकील ने प्रश्न उठाया है जी इसकी जानकारी उसे नहीं दी गयी॥ ऐसे सारे कई प्रश्न है जिसका जबाब आने वाले भविष्य मे कांग्रेस सरकार को देना पड़ेगा ।
प्रश्न ये भी है की सिर्फ कसाब की फाँसी ही काफी है मुंबई के गुनहगारो को सजा देने के लिए । कसाब एक  मोहरा था आईएसआई और उसके गुर्गों का ॥बाकी मास्टरमाइंड पर कोई कार्यवाही करने मे भारत सरकार सफल होगी या डोजीयर के आदान प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री कर लेगी । एक ओर जहां इज़राइल जैसा छोटा सा देश घर मे घुसकर हर कीमत पर अपने नागरिकों की हत्या का बदला लेता है हमारी कांग्रेस सरकार पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के साथ ट्वेन्टी ट्वेन्टी खेलने मे व्यस्त है ॥
यदि ये तथकथित फाँसी सही मान भी ली जाए तो इसे कांग्रेस की इच्छाशक्ति से ज्यादा मजबूरी कहा जा सकता है ,वैसे भी सरकार की साख गिर रही है 26/11 की चौथी बरसी से पहले कसाब को लटकाकर कांग्रेस अपने बिखरते हुए अस्तित्व को बचाने का एक आखिरी प्रयास कर रही है ॥
 हम ये कैसे भूल सकते हैं की जिन शहीदो ने अपनी जान दे कर भारतीय संसद और संसद के कर्णधारो की रक्षा की थी उनकी हत्या करने वाला अफजल अब भी जेल मे मजे से बिरयानी का आनंद ले रहा है और पिछले कई सालो से कांग्रेस ने मुस्लिम वोटो की खातिर उसे खुलेआम संरक्षण दे रखा है । इस तथाकथित फाँसी के घटनाक्रम से अब पाकिस्तान मे हिंदुस्थानी कैदी “सरबजीत सिंह” को जल्द से जल्द फाँसी देने की मांग उठने लगेगी और इसमे संदेह नहीं की पाकिस्तान अपनी जन्मजात मक्कारी दिखते हुए सरबजीत को फाँसी दे कर कसाब की फाँसी का जबाब दे ।
बहरहाल डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी का ये समय  मुंबई हमलो मे बलिदान हुए लोगो और उनके परिवार वालों समेत समस्त हिंदुस्थानियों को शांति और खुशी देने वाला है और दिग्विजय सिंह जैसे नेता के मुह पर एक करारा तमाचा जिसके अनुसार इन हमलो मे आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी  संगठन का हाथ था ॥

जय श्री राम

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

विकल्प सेवा संस्थान-Vikalp Sewa Sansthan : वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण

विकल्प सेवा संस्थान-Vikalp Sewa Sansthan : वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण
ॐ ,
पूर्ण इतिहास अबलोकन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है भारत स्वर्णिम भबिश्य को बचाने के लिए उस समय श्री नाथू राम गोड से जी के लिए ऐसी दुस्त्तात्मा का अंतर्ध्यान करना मज़बूरी थी ,अगर ऐसा नहीं करता तो आज भारत,भारत न होकर इस्लामिस्थान होता ,उनके एबम उनके चेले की करतूतों की बजह से भारत ,भारत न बन क्र इंडिया बना हुआ है और ये काले अंग्रेज(कांग्रेसी लुट-खाशोत क्र भारत में सर्वत्र त्राहि-त्राहि मचाने में आज भी अग्रसर है इनका अंतर्ध्यान होना ही देश हितार्थ हो सकता है |
वन्देमातरम/
जय हिन्द .

सोमवार, 27 अगस्त 2012

बेटी बचाओ अभियान में जोड़ें एक नया अध्याय


कितना तड़पी होगी वो! क्या वो इसका मतलब भी समझती होगी? मानसिक एवं शारीरिक रूप से शोषित होती यह बच्ची, जब माँ बनने के अर्थ को समझ आने की अवस्था में होगी, तब उस सुंदर अहसास से परे घृणित भाव से भरी होगी और घिरी होगी प्रश्नों के जंजाल में कि क्यों उसके माता-पिता ने ही उसके विश्वास को तार-तार किया? क्यों नहीं कर पाये वे उसकी रक्षा? क्यों ईश्वर उसकी किस्मत लिखते समय इतना निष्ठुर हो गया? कहाँ रहा नौ महीने ‘लड़कियों का रक्षक समाज’? क्या उसकी पीड़ा की चीख़ किसी के कानों में नहीं पड़ी? क्या इतने दिन किसी की दृष्टि उसके उभारों से प्रश्न न कर सकी? क्या किसी के मन में उसके लिए करूणा नहीं उमड़ी? यहाँ तक कि उसके अपने माँ-बाप के मन में भी नही! वह तेरह वर्ष की उम्र में एक बच्ची की माँ बन गई। अभी तो वह खुद माँ की गोद में सिर रख दुलार के हाथ की प्रतीक्षा कर रही थी कि स्वयं उसकी गोद से किलकारियों की आवाजें आने लगी! कौन है इसका जिम्मेदार? वे जो उसके संरक्षक हैं या वह जो अपने हसरतें पूरी कर चला गया? क्या एक बार भी उन बाल अंगों पर तरस नहीं आया उसे? अब क्या? क्या अब उस मासूम को उन हाथों की कठपुतली बनने के लिए छोड़ देना चाहिये? क्या उनके साथ उसका व उसकी बच्ची का भविष्य सुरक्षित है? क्या गारंटी है कि भविष्य में वह बच्ची व उसकी बच्ची उन संरक्षकों के लिए कमाई का साधन नहीं बनेगी? क्या आयेगा कोई उन दोनों की रक्षा के लिए? और इन सबके साथ-साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न-चिन्हः आखि़र कब तक चलेंगी ये कहानियाँ? और कितनी लम्बी होगी यह कतार? ज़रा कचौटिये अपनी मृत भावनाओं को, शायद कोई हल निकल आये और बचपन की मीठी यादें ज़हरीले भाग्य से मुक्त हो जायें।

शुक्रवार, 29 जून 2012

भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र !

प्रिय राष्ट्र प्रेमियों -
एक वो समय था जब गाय माँ की रक्षा के लिये 1857 ईश्वी में क्रांति हो गई थी और हमारे पूर्वजों ने 4 लाख गद्दारों व अंग्रेजों को काट डाला था, ओर एक समय ये है जब 3500 हजार कत्लखानों में रोज माँ को काटा जा रहा है और हम तथाकथित अहिंसा व सेक्यूलरिज्म की आड़ में नपुंसकता की चादर ओढ़े घरों में दुबके बैठे है। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से 'गौ मांस खाना मेरा मौलिक अधिकार है' कहने का दुश्साहस करती है, किन्तु देश में उसके खिलाप कोई सशक्त प्रतिक्रिया नहीं आती, कारण भारत के नेतृत्व का भारतीयता विरोधी छद्म सेक्यूलरों के हाथों में होना, इनके द्वारा नित्य प्रति भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने के कुचक्र रचे जा रहे है। देश की सीमाओं, संस्कृति, पुरातन धरोहर, हमारी शिक्षा पद्धति, हमारे मंदिर, साधु - सन्यासी, हमारी परंपराओं एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान पर सदैव सुनियोजित रीति से बहु - आयामी आक्रमण किये जा रहे है। हमारा देश छद्म सेक्यूलर नेताओं के कारण भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है।
भारत में छद्म सेक्यूलरिज्म की संगठित शुरूआत 20 अगस्त 1920 को मोहनदास गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के नाम से खिलापत आंदोलन (अरबपंथी कट्टर जेहादियों द्वारा तुर्की के खलीपा के समर्थन में चलाया गया एक विशुद्ध साम्प्रदायिक आंदोलन, जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई संबंध नहीं था।) को अपना नेतृत्व प्रदान करने से हुई। गांधी के शब्दों में - मुसलमानों के लिए स्वराज्य का अर्थ है - जो होना ही चाहिए खिलापत की समस्या के लिए भारत की क्षमता का, प्रभाव पूर्ण व्यवहार, इस दृष्टिकोण के साथ सहानुभूति न रखना एकदम असंभव है, खिलापत आंदोलन की पूर्ति के लिए आवश्यक लगने पर मैं स्वराज प्राप्ति की कार्यवाही को सहर्ष स्थगित करने के लिए आग्रह कर दूंगा। जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो अरबपंथी जेहादियों का गुस्सा हिन्दुओं पर उतरा, मोपला में हिन्दुओं की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बड़ा हमला हुआ। हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियों के अपमान हुये। गांधी जो अपनी नीतियों के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे। प्रत्युत यह कहना शुरू कर दिया कि मालाबार में हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बनाया गया। यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रों ने यह स्वीकार किया कि सैकड़ों घटनाऐं हुई है। और उल्टे मोपला मुसलमानों के लिए फंड शुरू कर दिया।
मोहनदास गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआता में हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कुछ साम्प्रदायिक मुसलमान इसे पसंद नहीं करते, तो वे उन्हें खुश करने के लिए हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी (फारसी लिपि में लिखे जाने वाली उर्दू भाषा) का प्रचार करने लगे। बादशाह दशरथ, शहजादा राम, बेगम सीता, मौलवी वशिष्ठ जैसे नामों का प्रयोग होने लगा। सम्प्रदाय विशेष को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी भाषा विद्यालयों में पढ़ाई जाने लगी। इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ, जिसके मूल से ही उन्नीसवीं सदी की सबसे भयानक त्रासदी साम्प्रदायिक आधार पर हिन्दुस्थान का पाकिस्तान और भारत के रूप में विभाजन हुआ, जिसमें लगभग 25 लाख निर्दोष लोगों को अपने प्राण गवाने पड़े।
14 - 15 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में हिन्दुस्थान विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था कि गांधी ने वहां पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन कराया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं कहा था कि देश का बटवारा उनकी लाश पर होगा। देश का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन हुआ, मुसलमानों का पाकिस्तान और हिन्दुओं का भारत, तो जिन्ना ने सम्पूर्ण साम्प्रदायिक जनसंख्या के स्थानांतरण की बात रखी, जिसे गांधी और नेहरू ने अस्वीकार कर दिया। नास्तिक नेहरू ने हिन्दू विद्वेषवश भारत को हिन्दू राष्ट्र न बनाकर सेक्यूलर राष्ट्र बना दिया। विभाजन के पश्चात भारत में कुल 3 करोड़ मुस्लिम जनसंख्या थी, जो आज बढ़कर 23 करोड़ हो गयी है, दूसरी ओर पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या 21 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 1.4 प्रतिशत रह गयी है। तुर्क और मुगलों की प्रापर्टी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए वफ्फ तैयार किया गया और और उनको पाकिस्तान में प्रापर्टी वफ्फ के द्वारा सौपी गयी और कमी समझने पर उनकी जमीन का पेमेन्ट भी किया गया। मुसलमानों के हिस्से की जमीन पाकिस्तान में चली गयी और वफ्फ के द्वारा मुसलमानों को सभी सुविधाऐं दी गयी, परन्तु पाकिस्तान से भारत आने वाले हिन्दुओं के लिये कुछ नहीं किया गया। आखिर ऐसा विद्वेष हिन्दुओं के साथ क्यों किया गया और यह विद्वेष आज भी जारी क्यों है ! जो मुसलमान पाकिस्तान चले गये उनकी संपत्ति की खातिर सरकार फिर ऐसा कानून बनाना चाहती है कि वह संपत्ति उन पर पहुँच जाये। मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुस्लिमों के लिए अलग होता था, आज भी वह नियम लागू है, जब कोई हिन्दू मेला या तीर्थयात्रा होती है तो टैक्स या किराया बढ़ा दिया जाता है और मुसलमानों को हज यात्रा में आर्थिक अनुदान दिया जाता है। छात्रवृत्ति, बैंक लोन, शिक्षा, रोजगार आदि क्षेत्रों में सम्प्रदायिक तुष्टिकरण व मजहबी आरक्षण की भेदभाव पूर्ण नीति अपनायी जाती है। इसपर स्वयं भारत का सुप्रीम कोर्ट सभी भारतीय नागरिकों के लिए समान कानून बनाने का सुझाव दे चुका है तथा साम्प्रदायिक समुदायों के पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं करने पर केन्द्र सरकार को लताड़ चुका है। लेकिन फिर भी भारत का छद्म सेक्यूलर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के समस्त संसाधनों पर पहला अधिकार एक सम्प्रदाय विशेष (मुसलमानों) का बताता है। साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने के लिए कट्टर साम्प्रदायिक चरित्र वाले व्यक्तियों की सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद गठित कर सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण विधेयक 2011 बनाया जाता है तो कभी राजिन्द्र सच्चर के नेतृत्व में कमेटी गठित कर मुसलमानों के लिए विशेषाधिकार की बात की जाती है।लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान कहते है कि असली प्रजातंत्र हम जब समझेगें जब देश का प्रधानमंत्री मुसलमान होगा। हैदराबाद का एक विधायक मौलाना ओवैसी दुर्गा मंदिर में बजने वाले घण्टे को गैर इस्लामी बताकर प्रतिबंधित कराने का प्रयास करता है, तो बरेली की खचाखच भरी एक चुनावी सभा में एक मौलवी सार्वजनिक रूप से कहता है कि शहजिल इस्लाम (प्रत्यासी) को वोट देकर इतना मजबूत कर दो कि वो गैर मुस्लिम का सिर कलम कर सके। चुनाव जितने पर विधायक शहजिल इस्लाम ओसामा बिन लादेन को आतंकी नहीं जेहादी बताता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार पहले तलवार के बल पर कत्ले आम मचाकर नंगा नाच होता था, मतांतरण कराया जाता था, कच्चे चमड़े के बोरों में जीवित लोगों को ठूँस - ठूँस भरकर सीलकर तडफते हुये मरने के लिये डाल दिया जाता था, नारियों का शील भंग किया जाता था, इन जेहादियों के आतंक से कन्याओं की भ्रुण हत्या कर दी जाती थी तथा नारियाँ सामूहिक रूप से एकत्र होकर अग्नि में प्राण गवाँ देती थी, जैसे मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुसलमानों के लिए अलग थे आज भी वो प्रक्रिया जारी है । जब हकीकत को मौत की सजा सुनाई गई तो हकीकत ने कहा अगर यह बोलने पर मैं दोषी हूँ तो मेरे से पहले यह मुस्लिम बच्चे दोषी है , जिन्होनें दुर्गा माता के लिए यह शब्द कहे थे मैंने तो केवल उनके शब्द दोहराये है। मुसलमान सेक्यूलरिज्म को नहीं मानता है और सरकार सेक्यूलरिज्म को मानती है तो मजहब (आधुनिक शब्दों में धर्म) के नाम पर आरक्षण क्यों देती है। सरकार में बैठे हुये व्यक्ति मजहब के आधार पर आतंकवादियों की मदद क्यों करते है। बाटला हाऊस में इस्पेक्टर शर्मा आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो जाते है, इस्पेक्टर शर्मा के बलिदान को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उल्टा कांग्रेस का महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जिले के सरजूपुर ग्राम में आतंकवादियों के घर जाकर मुठभेड़ को फर्जी बताता है और उनका उत्साहवर्धन करता है कि हम स्पेशल अदालत बैठाकर आपके बच्चों को न्याय दिलायेगे। हापुड़ के पास मंसूरी ग्राम में आतंकवादियों की सूचना मिलने पर पुलिस छापा मारती है तो एक आतंकवादी उसी समय गाडी में बैठकर आता है तो गाडी ड्राइवर व मकान मालिक को भी पुलिस हिरासत में ले लेती है तो सेक्यूलर नेता चिल्लाते है कि मानव अधिकार का हनन हो रहा है। इसी प्रकार एक दरगाह में 40 आतंकवादी थे तो सरकार कहती है दरगाह पर हमला मत करना और मौका पाकर आतंकवादी फरार हो जाते है, स्वर्ण मंदिर को तो तहस नहस कर सकती है सरकार लेकिन दरगाह में आतंकवादी पाकर हमली नहीं कर सकती। जामा मस्जिद का इमाम कहता है कि मैं आई एस आई का एजेन्ट हूँ सरकार में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करे। एक योगगुरू काले धन के लिए शांतिपूर्वक अनशन करता है तो सरकार सोते हुये बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गो पर घिनौने तरीके से बल प्रयोग करती है। हिन्दू साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कोई पुष्ट प्रमाण न मिलने पर भी अमानवीय यातनाऐ दी जाती है और आतंकवादियों को बिरयानी खिलायी जाती है, जामा मस्जिद के इमाम के नाम पर गर्दन नीची कर ली जी जाती है। 
सरकार की भारत विरोधी मानसिकता देखिये भारतीय नगरों के नाम अरब साम्राज्यवादी आक्रांताओं के नाम पर रखे गये, भारतीय महापुरूषों को हाशिये पर फेंक दिया गया, देखिये विजयनगर हिन्दू राज्य था उसका नाम बदलकर सिकंदराबाद रख दिया गया। महाराणी कर्णावती के नाम से नगर का नाम कर्णावती रखा गया परन्तु इसका नाम बदलकर क्रुर आतंकी के नाम पर अहमदाबाद रख दिया गया और अकबर ने प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद रख दिया और साकेतनगर जो राम के राज्य से नाम था उसे बदलकर फैजाबाद कर दिया गया, शिवाजी नगर का नाम बदलकर आतंकी औरंगजेब के नाम पर औरंगाबाद कर दिया गया, लक्ष्मीनगर का नाम बदलकर नबाब मुजफ्फर अली के नाम पर मुजफ्फरनगर रख दिया, भटनेरनगर का नाम गाजियाबाद रख दिया, इंद्रप्रस्थ का नाम दिल्ली रख दिया गया। इसी प्रकार आज भी हमारे उपनगरों व रोडों के नाम आतंकवादियों के नाम पर रखे जा रहे है, तुगलक रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड, आसफ अली रोड, शाहजहाँ मार्ग, जहागीर मार्ग, लार्ड मिन्टो रोड, लारेन्स रोड, डलहोजी रोड आदि - आदि। जरा विचार करो, नीच किस्म के आतंकवादियों के नामों का इस प्रकार से भारत पर जबरदस्ती थोपा जाना एक षडयन्त्र है नहीं है क्या, यह वैचारिक गुलामी का प्रतिक है। अयोध्या के श्री राम मंदिर को विश्व जानता है कि यहां राम का जन्म हुआ और उसका भव्य मंदिर था, एक अरबपंथी लुटेरा जेहादी सेना लेकर आया उसने लूट मचाई, भारतीय स्वाभिमान को नीचा दिखाने के लिए उसने मंदिर को तोड दिया, लुटेरा भी चला गया और देश का एक भाग भी चला गया, परन्तु फिर भी मुकदमा भारतीय स्वाभिमान के प्रतिक श्रीराम और एक लुटेरे के बीच में ? कैसी है यह आजादी ! 
आज भारतीयों की मानसिकता देखकर मुझे दुःख होता है और मैं विचार करता हूँ कि जब आर्य महान थे तो उनकी संतान इतनी निकृष्ट कैसे हो गई। जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर कुछ संकिर्ण विचारधारा के व्यक्ति आपत्ति जताते है तो तुरंत वंदे मातरम् गायन को स्वैच्छिक कर दिया जाता है और राष्ट्रगान जन गन मन जो जार्ज पंचम का स्वागत गीत था, उस पर कोई आपत्ति नहीं सुनी जाती। इसी प्रकार भारत माता व हिन्दू देवी - देवताओं की मूर्तियां बनाकर भारतीयता को अपमानित करने वाले को सहयोग और उसके खिलाप बोलने वालों पर मुकदमे। आज भारतीय हिन्दू समाज के छद्म सेक्यूलर नेता तात्कालिक लाभ के लिए देश को गद्दारों के हवाले करने का काम कर रहे है। भारत के सात राज्यों में तो हिन्दू अल्पसंख्य हो ही चुका है, अब सम्पूर्ण भारत की बारी है। हे भारत वंशियों अभी भी समय है चेत जाओं, वरना आने वाले समय में तुमको भयंकर यातनाओं का शिकार होना पडेगा और तुम्हारी बहन - बेटियों को जेहादी विधर्मीयों की रखैल बनकर रहना पडेगा, इसका इतिहास साक्षी है। 
- विश्वजीत सिंह ' अनंत ' 
वन्दे मातरम् 
जय माँ भारती ।