मंगलवार, 12 जुलाई 2011

आखिर कब तक चलेगा यह सब???


मित्रों वर्षों से हम भारतवासी इसी हीन भावना में जी रहे हैं कि क्या हम सदियों से भूखे, नंगे व पिछड़े हुए थे? यदि ऐसा था तो हमे विश्वगुरुसोने की चिड़िया जैसी उपाधियाँ कैसे मिल गयीं?
यहाँ तो एक प्रकार का कन्फ्यूज़न हो गया| क्या यह सच है कि हम सच में विश्वगुरु थे? क्या यह सच है कि हम सच में सोने की चिड़िया थे?

इस प्रकार कि उधेड़बुन में हमे जीना पड़ रहा है| इस विषय पर राष्ट्रवादी विचारधारा के धनि महान वैज्ञानिक स्व. श्री राजीव दीक्षित का एक व्याख्यान सुना था| यह लेख उसी व्याख्यान से प्रेरित है| अत: आप भी राजिव भाई के इस ज्ञान का लाभ उठाइये|

शीर्षक आपको बाद में समझाऊंगा किन्तु लेख से पहले आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ|
हमारे देश में एक महान वैज्ञानिक हुए हैं प्रो. श्री जगदीश चन्द्र बोस भारत को और हम भारत वासियों को उन पर बहुत गर्व है| इन्होने सबसे पहले अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव की तरह पेड़ पौधों में भी भावनाएं होती हैं| वे भी हमारी तरह हँसते खिलखिलाते और रोते हैं| उन्हें भी सुख दुःख का अनुभव होता है| और श्री बोस के इस अनुसंधान की तरह इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है|

श्री बोस ने शोध के लिये कुछ गमले खरीदे और उनमे कुछ पौधे लगाए| अब इन्होने गमलों को दो भागों में बांटकर आधे घर के एक कोने में तथा शेष को किसी अन्य कोने में रख दिया| दोनों को नियमित रूप से पानी दिया, खाद डाली| किन्तु एक भाग को श्री बोस रोज़ गालियाँ देते कि तुम बेकार हो, निकम्मे हो, बदसूरत हो, किसी काम के नहीं हो, तुम धरती पर बोझ हो, तुम्हे तो मर जाना चाहिए
आदि आदि| और दूसरे भाग को रोज़ प्यार से पुचकारते, उनकी तारीफ़ करते, उनके सम्मान में गाना गाते|
मित्रों देखने से यह घटना साधारण सी लगती है| किन्तु इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन पौधों को श्री बोस ने गालियाँ दी वे मुरझा गए और जिनकी तारीफ़ की वे खिले खिले रहे, पुष्प भी अच्छे दिए|

तो मित्रों इस साधारण सी घटना से बोस ने यह सिद्ध कर दिया कि किस प्रकार से गालियाँ खाने के बाद पेड़ पौधे नष्ट हो गए| अर्थात उनमे भी भावनाएं हैं|

जब निर्जीव से दिखने वाले सजीव पेड़ पौधों पर अपमान का इतना दुष्प्रभाव पड़ता है तो मनुष्य सजीव सदेह का क्या होता होगा?वही होता है जो आज हमारे भारत देश का हो रहा है|

५००-७०० वर्षों से हमें यही सिखाया पढाया जा रहा है कि तुम बेकार हो, खराब हो, तुम जंगली हो, तुम तो हमेशा लड़ते रहते हो, तुम्हारे अन्दर सभ्यता नहीं है, तुम्हारी कोई संस्कृती नहीं है, तुम्हारा कोई दर्शन नहीं है, तुम्हारे पास कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है, तुम्हारे पास कोई ज्ञान विज्ञान नहीं है आदि आदि| अंग्रेजों के एक एक अधिकारी भारत आते गए और भारत व भारत वासियों को कोसते गए| अंग्रजों से पहले ये गालियाँ हमें फ्रांसीसी देते थे, और फ्रांसीसियों से पहले ये गालियाँ हमें पुर्तगालियों ने दीं| इसी क्रम में लॉर्ड मैकॉले का भी भारत में आगमन हुआ| किन्तु मैकॉले की नीति कुछ अलग थी| उसका विचार था कि एक एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत वासियों को कब तक कोसता रहेगा? कुछ ऐसी स्थाईव्यवस्था करनी होगी कि हमेशा भारत वासी खुद को नीचा ही देखें और हीन भावना से ग्रसित रहें| इसलिए उसने जो व्यवस्था दी उसका नाम रखा Education System.सारी व्यवस्था उसने ऐसी रचीकि भारत वासियों को केवल वह सब कुछ पढ़ाया जाए जिससे वे हमेशा गुलाम ही रहें| और उन्हें अपने धर्म संस्कृती से घृणा हो जाए| इस शिक्षा में हमें यहाँ तक पढ़ाया कि भारत वासी सदियों से गौमांस का भक्षण कर रहे हैं| अब आप ही सोचे यदि भारत वासी सदियों से गाय का मांस खाते थे तो आज के हिन्दू ऐसा क्यों नहीं करते? और इनके द्वारा दी गयी सबसे गन्दी गाली यह है कि हम भारत वासी आर्य बाहर से आये थे| आर्यों ने भारत के मूल द्रविड़ों पर आक्रमण करके उन्हें दक्षिण तक खदेड़ दिया और सम्पूर्ण भारत पर अपना कब्ज़ा ज़मा लिया| और हमारे देश के वामपंथी चिन्तक आज भी इसे सच साबित करने के प्रयास में लगे हैं| इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया कि कैसे एक राजा ने दूसरे राजा पर आक्रमण किया| इतिहास में केवल राजा ही राजा हैं प्रजा नदारद है, हमारे ऋषि मुनि नदारद हैं| और राजाओं की भी बुराइयां ही हैं अच्छाइयां गायब हैं| आप जरा सोचे कि अगर इतिहास में केवल युद्ध ही हुए तो भारत तो हज़ार साल पहले ही ख़त्म हो गया होता| और राजा भी कौन कौन से गजनी, तुगलक, ऐबक, लोदी, तैमूर, बाबर, अकबर, सिकंदर जो कि भारतीय थे ही नहीं| राजा विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान गायब हैं| इनका ज़िक्र तो इनके आक्रान्ता के सम्बन्ध में आता है| जैसे सिकंदर की कहानी में चन्द्रगुप्त का नाम है| चन्द्रगुप्त का कोई इतिहास नहीं पढ़ाया गया| और यह सब आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में है|

इसी प्रकार अर्थशास्त्र का विषय है| आज भी अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले बड़े बड़े विद्वान् विदेशी अर्थशास्त्रियों को ही पढ़ते हैं| भारत का सबसे बड़ा अर्थशास्त्री चाणक्य तो कही है ही नहीं| उनका एक भी सूत्र किसी स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता| जबकि उनसे बड़ा अर्थशास्त्री तो पूरी दुनिया में कोई नहीं हुआ|

दर्शन शास्त्र में भी हमें भुला दिया गया| आज भी बड़े बड़े दर्शन शास्त्री केवल अरस्तु, सुकरात, देकार्ते को ही पढ़ रहे हैं जिनका दर्शन भारत के अनुसार जीरो है| अरस्तु और सुकरात का तो ये कहना था कि स्त्री के शरीर में आत्मा नहीं होती वह किसी वस्तु के समान ही है, जिसे जब चाहा बदला जा सकता है| आपको पता होगा १९५० तक अमरीका और यूरोप के देशों में स्त्री को वोट देने का अधिकार नहीं था| आज से २५.३० वर्ष पहले तक अमरीका और यूरोप में स्त्री को बैंक अकाउंट खोलने का अधिकार नहीं था| साथ ही साथ अदालत में तीन स्त्रियों की गवाही एक पुरुष के बराबर मानी जाती थी| इसी कारण वहां सैकड़ों वर्षों तक नारी मुक्ति आन्दोलन चला तब कहीं जाकर आज वहां स्त्रियों को कुछ अधिकार मिले हैं| जबकि भारत में नारी को सम्मान का दर्जा दिया गया| हमारे भारत में किसी विवाहित स्त्री को श्रीमति कहते हैं| कितना सुन्दर शब्द है ये श्रीमती, जिसमे दो देवियों का निवास है| श्री होती है लक्ष्मी और मति यानी बुद्धि अर्थात सरस्वती| हम औरत में लक्ष्मी और सरस्वती का निवास मानते हैं| किन्तु फिर भी हमारे प्राचीन आचार्य दर्शन शास्त्र से गायब हैं| हमारा दर्शन तो यह कहता है कि पुरुष को सभी शक्तियां अपनी माँ के गर्भ से मिलती हैं और हम शिक्षा ले रहे हैं उस आदमी की जो यह मानता है कि नारी में आत्मा ही नहीं है|

चिकत्सा के क्षेत्र में महर्षि चरक, शुषुक, धन्वन्तरी, शारंगधर, पातंजलि सब गायब हैं और पता नहीं कौन कौन से विदेशी डॉक्टर के नाम हमें रटाये जाते हैं| आयुर्वेद जो न केवल चिकित्सा शास्त्र है अपितु जीवन शास्त्र है, वह आज पता नहीं चिकित्सा क्षेत्र में कौनसे पायदान पर आता है?

इसी प्रकार हमारी गणित पर भी विदेशी कब्ज़ा हो गया| इसके लिए राजिव भाई ने एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया है, अत: उसे ही यहाँ रख रहा हूँ|

बच्चों को स्कूल में गणित में घटाना सिखाते समय जो प्रश्न दिया जाता है वह कुछ इस प्रकार होता है-
पापा ने तुम्हे दस रुपये दिए, जिसमे से पांच रुपये की तुमने चॉकलेट खा ली तो बताओ तुम्हारे पास कितने रुपये बचे?
यानी बच्चों को घटाना सिखाते समय चॉकलेट कम्पनी का उपभोगता बनाया जा रहा है| हमारी अपनी शिक्षा पद्धति में यदि घटाना सिखाया जाता तो प्रश्न कुछ इस प्रकार का होता-
पिताजी ने तुम्हे दस रुपये दिए जिसमे से पांच रुपये तुमने किसी गरीब लाचार को दान कर दिए तो बताओ तुम्हारे पास कितने रुपये बचे?
जब बच्चा बार बार इस प्रकार के सवालों के हल ढूंढेगा तो उसके दिमाग में कभी न कभी यह प्रश्न जरूर आएगा कि दान क्या होता है, दान क्यों करना चाहिए, दान किसे करना चाहिए आदि आदि? इस प्रकार बच्चे को दान का महत्त्व पता चलेगा| किन्तु चॉकलेट खरीदते समय बच्चा यही सोचेगा कि चॉकलेट कौनसी खरीदूं कैडबरी या नेस्ले?

अर्थ साफ़ है यह शिक्षा पद्धति हमें नागरिक नहीं बना रही बल्कि किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उपभोगता बना रही है| और उच्च शिक्षा के द्वारा हमें किसी विदेशी यूनिवर्सिटी का उपभोगता बनाया जा रहा है या किसी वेदेशी कम्पनी का नौकर|

मैंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में कभी यह नहीं सीखा कि कैसे मै अपने तकनीकी ज्ञान से भारत के कुछ काम आ सकूँ, बल्कि यह सीखा कि कैसे मै किसी Multi National Company में नौकरी पा सकूँ, या किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिला ले सकूँ|
तो मित्रों सदियों से हमें वही सब पढ़ाया गया कि हम कितने अज्ञानी हैं, हमें तो कुछ आता जाता ही नहीं था, ये तो भला हो अंग्रेजों का कि इन्होने हमें ज्ञान दिया, हमें आगे बढ़ना सिखाया आदि आदि| यही विचार ले कर लॉर्ड मैकॉले भारत आया जिसे तो यह विश्वास था कि स्त्री में आत्मा नहीं होती और वह हमें शिक्षा देने चल पड़ा| हम भारत वासी जो यह मानते हैं कि नारी में देवी का वास है उसे मैकॉले की शिक्षा की क्या आवश्यकता है? हमारे प्राचीन ऋषियों ने तो यह कहा था कि दुनिया में सबसे पवित्र नारी है और पुरुष में पवित्रता इसलिए आती है क्यों कि उसने नारी के गर्भ से जन्म लिया है| जो शिक्षा मुझे मेरी माँ से जोडती है उस शिक्षा को छोड़कर मुझे एक ऐसी शिक्षा अपनानी पड़ी जिसे मेरी माँ समझती भी नहीं| हम तो हमारे देश को भी भारत माता कहते हैं| किन्तु हमें उस व्यक्ति की शिक्षा को अपनाना पड़ा जो यह मानता है कि मेरी माँ में आत्मा ही नहीं है| और एक ऐसी शिक्षा पद्धति जो हमें नारी को पब, डिस्को और बीयर बार में ले जाना सिखा रही है, क्यों?

आज़ादी से पहले यदि यह सब चलता तो हम मानते भी कि ये अंग्रेजों की नीति है, किन्तु आज क्यों हम इस शिक्षा को ढो रहे हैं जो हमें हमारे भारत वासी होने पर ही हीन भावना से ग्रसित कर रही है? आखिर कब तक चलेगा यह सब?

इसका उत्तर हम क्या दें, जब हमारे माननीय(?), सम्माननीय(?), आदरणीय(?), पूजनीय(?) प्रधानमन्त्री श्री श्री...१००००००००००००८(?) मन्दमोहन सिंह २००४ में प्रथम बार भारत के प्रधानमन्त्री बनने के बाद ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में जाकर यह कहें कि एक इंग्लैण्ड ही है, जिसने हमें बनाया| हम तो सदियों से भूखे, नंगे थे| अंग्रेजों ने ही हमें अज्ञानता के अन्धकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश दिखाया|

तो मित्रों अपने मन से यह भ्रम निकाल दीजिये, कि आप के पूर्वज अज्ञानी थे| आपके पूर्वजों ने तो पूरे विश्व को ज्ञान दिया है| आपके पूर्वजों ने पूरे विश्व को सभ्यता दी है| आपके पूर्वजों ने पूरे विश्व को खाने लायक अन्न दिया| आपके पूर्वजों ने पूरे विश्व को पहनने के लिए कपडा दिया है|

हम सच में सोने की चिड़िया थे| हम सच में विश्वगुरु थे| और यह उपाधियाँ हम आज फिर से पा सकते हैं|
बाबा रामदेव अब वही खोया हुआ स्वाभिमान पुन: भारत को दिलाने आए हैं| किन्तु जब तक राजनैतिक सत्ताओं पर ये विदेशी बैठे हैं, तब तक मन के भीतर से यही आह निकलती है कि "आखिर कब तक चलेगा यह सब?"

37 टिप्‍पणियां:

  1. दिवस जी आज के इस तेज भागती व पशिचमी सभ्यता की गिरफ्त में अपना दम तोडती जिंदगी को साकार करता आपका लेख काफी ज्ञान दे सकता है हमें अगर हम सब इस पर गहनता से विचार करें तो !
    वैसे आपके इस ज्ञान को इस मंच पर बांटने के लिए आपको साधुवाद देता हूँ और उम्मीद करता हूँ की आगे भी आप इस मंच के माध्यम से पाठकों को अपने देश के पूर्वजों द्वारा किये गए महानतम कार्यों से अवगत करवाते रहोगे !

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  2. संजय भाई, आभार...आप अग्रज हैं, आपका आशीर्वाद बना रहे तो यह कार्य निरंतर चलता रहेगा...

    हरीश जी आपका भी धन्यवाद...

    एक अनुरोध मंच संचालक से करना चाहता हूँ की इस लेख के लेबल में मेरा नाम दिवस गौर लिखा है, संपर्क सूत्र एवं प्रबंध मंडल में भी दिवस गौर लिखा है| कृपया इसे ठीक कर दें| मेरा नाम दिवस गौड़ है|

    मेरा यह पहला लेख इस मंच पर प्रकाशित होने पर मुझे बहुत ख़ुशी एवं गौरव का अनुभव है| इसके लिए आप सभी का आभार...

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  3. ये जानकारी हममे से ज्यादातर लोगों के पास नहीं होती है..
    एक अच्छी जानकारी जिसका अनुसरण हम सब को करना चाहिए..

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  4. आदरणीय भाई दिवस जी ये सब मैकाले का ही कुचक्र था जिसके कारण हम सभी गुलाम बने हुए हैं ....आपने एक दम सटीक लेख लिखा है ...बस सभी पढ़ने वालो से एक ही गुजारिश है कि आप इसको केवल मात्र पढ़ने तक सिमित नहीं रहें .इसको जिंदगी में अपनाएं और इस गुलामी कि आधी अधूरी आजादी कि व्येव्स्था को बदल दिजिय ...परिवर्तन करने के लिय समय कि नहीं संकल्प कि आवाश्येकता होती है ...आपने बहुत अच्छा व् सार्थक लेख लिखा है ..आगे भी यूँ ही सहयोग देते रहें ...मैं खुद अपनी जिंदगी को राजीव जी के सपनो को मंजिल तक पहुँचाने के लिय ..समर्पित कर रहा हूँ ......इस मंच से जितने भी लोग जुड रहे हैं बस उन सब से यही प्रार्थना है कि सच का खुलकर साथ दें

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  6. आप के मैकाले पद्धति वाली बात से मैं भी सहमत हूँ एक विस्तृत लेख है मेरे पास इस विषय पर कभी संभव हुआ तो साझा करूँगा..ये बात पूर्णतया सत्य है की हमे असली इतिहास तो पढाई ही नहीं गयी..पढाया गया तो अंग्रेजो और तुष्टिकरण की भावना से लिखित इतिहास..चाहे वो चिकित्सा या अर्थ या समाज सिर्फ मैकाले के धर्म संतानों द्वारा प्रतिपादित ही बढाया गया..
    में किसी धर्म का जिक्र नहीं कर रहा हूँ मगर हमारे यहाँ अब भी औरन्जेब मार्ग है .आक्रान्ता था वो मगर महिमामंडित..यही है मैकाले एफ्फेक्ट..
    बिदेशी का मकडजाल भी उसी सिस्टम की दें है जिसमें हमारी पीढियां पली बढ़ी हैं..
    माननीय मनमोहन सिंह जी को सचमुच इंग्लैंड ने ही बनाया है क्युकी भारतीय इस तरह से बात नहीं कर सकता वैसे भी आशीर्वाद वो इटली से लेते हैं..
    बहुत ही सुन्दर और ज्ञानवर्धक लेख....इश्वर आप की लेखनी को प्रखर बनाये...

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  8. भाई हमें तो पूरा लेख बढ़िया और प्रेरक लगा.

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  9. :बाबा रामदेव अब वही खोया हुआ स्वाभिमान पुन: भारत को दिलाने आए हैं| "
    शायद कुछ लोगों को इस पंक्ति से आपति हो इसलिए आशुतोष जी ये मत कहें की बाबा का जिक्र कही नहीं आया है..
    लेख तर्कपूर्ण हैं
    और बातों में सत्यता भी निरर्थक विरोध की जगह किस तरह से इस कुचक्र से बाहर निकले इसका विचार चाहिए0
    मुझे लगता है संस्कृति के नाम पर हल्ला करने वाले संघठनो को उचित शिक्षा व्यवस्था की ओर भी ध्यान देना चाहिए वरना ये विचार वैचारिक सीमा में ही दम तोड़ देगा/

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  10. @ गीत
    लेख के सन्दर्भ में मेरा वक्तव्य था..न की अंतिम की एक पंक्ति के लिए
    लगभग २५० (अनुमान लगाया है जोड़ा नहीं) पंक्ति के लेख में अंत के दो शब्दों में एक व्यक्ति का नाम है.
    चर्चा में मैकाले राजीव जी हमारा गौरवशाली इतिहास एवं गुलाम मानसिकता प्रासंगिक है..कही भी बाबा का जिक्र नहीं है
    बेहतर है लेखक द्वारा उठाये मुद्दों पर मनन करें.न की समय बर्बाद करें

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  11. पिताजी ने तुम्हे दस रुपये दिए जिसमे से पांच रुपये तुमने किसी गरीब लाचार को दान कर दिए तो बताओ तुम्हारे पास कितने रुपये बचे?
    जब बच्चा बार बार इस प्रकार के सवालों के हल ढूंढेगा तो उसके दिमाग में कभी न कभी यह प्रश्न जरूर आएगा कि दान क्या होता है, दान क्यों करना चाहिए, दिवश भाई आज आपने भी मुझे अच्छा पाठ पढ़ा दिया. और गर्व भी होता है अपने देश की शिक्षा पद्धति पर इस देश के हृषी मुनियो की के ज्ञान पर

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  12. मोनी पांडे जी, आभार...
    तरुण भाई आपके इस समर्पण में हम भी आपके साथ हैं...आभार...
    आशुतोष भाई, आपका भी धन्यवाद...आपके लेख की प्रतीक्षा रहेगी...
    अनवर भाई, टिप्पणी के लिए आपका भी आभार| आप निश्चिन्त रहें, मैं कोई बदतमीजी नहीं करूँगा|
    आदरणीय कुसुमेश जी, आपकी टिप्पणी से मुझे बहुत हर्ष हुआ| धन्यवाद...
    गीत जी, आपने पहली बार मुझे पढ़ा है| आपकी टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद...

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  13. @blogtaknik
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद...दरअसल यह उदाहरण मैंने नहीं राजिव भाई ने दिया है| मैंने तो केवल इसे यहाँ प्रस्तुत किया|अत: इसका श्रेय उन्हें ही दूंगा|

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  14. आदरणीय दिवस दिनेश गौड जी नमस्कार
    आपकी बात तथ्यों पर आधारित है जिससे कोई भी सच्चा भारतीय सहमत होगा ।
    सच को दर्शाति सुन्दय प्रेरक अभिव्यक्ति ...... आभार ।

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  15. विश्वजीत सिंह जी, आपने भी शायद मुझे पहली बार पढ़ा है| आपकी टिप्पणी से बहुत प्रसन्नता हुई| आशीर्वाद बनाए रखें| आभार...

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  16. आदरणीय दिवस दिनेश गौड जी नमस्कार
    आपकी बात तथ्यों पर आधारित है जिससे कोई भी सच्चा भारतीय सहमत होगा ।
    सच को दर्शाति सुन्दय प्रेरक अभिव्यक्ति ...... आभार ।

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  17. आदरणीय बहन मोनिका जी, बहुत बहुत धन्यवाद...

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  18. इस पुरे लेख में देश के गौरवशाली इतिहास, ज्ञान विज्ञान, धर्म संस्कृती जैसे भारत के स्वाभिमान की बातों को हमारे स्वर्णिम इतिहास की वास्तविकता से अवगत कराया गया है पर कहते है,ना की एक सडी मछली पुरे तालाब के पानी को गन्दा कर देती है. और यहाँ पर भी एक महासय यही कर रहें है. इनके सामने सो अच्छी बात हो तो भी ये कही न कहीं से अपने दिमाग से सडी बात ही लिखेंगे.

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  19. @ आदरणीय आशुतोष जी ! यह सर्वविदित है कि भारत का इतिहास प्राचीन भी है और गौरवशाली भी। हरेक हाकिम अपनी हुकूमत की मज़बूती के लिए अपने तौर तरीक़े चलाता है। अंग्रेज़ों ने भी यही किया। जब तक अंग्रेज़ थे तो यहां के हिन्दू भाईयों के सिर पर चोटी और बदन पर भारतीय वस्त्र थे लेकिन उनके जाने के बाद अब ये दोनों ही चीज़ें हिन्दू भाईयों के तन-बदन से ग़ायब हैं। अब न तो औरंगज़ेब है और न ही मैकाले, तब हिन्दू ख़ुद अपनी पहचान क्यों मिटाने पर तुला हुआ है ?
    यह विचारणीय है।
    क़स्बा देवबंद में एक प्राचीन संस्कृत महाविद्यालय है। उसमें शहर का कोई एक भी हिन्दू अपना बच्चा नहीं भेजता पढ़ने के लिए जबकि अंग्रेज़ी स्कूलों में वे ऊंची फ़ीस देते हैं और पढ़ाते हैं। यह सब किसी एक पार्टी के कार्यकर्ता नहीं कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाले भी यही कर रहे हैं। ये सब आपको अंग्रेज़ी लिबास में नज़र आएंगे और मैकाले को कोस रहे होंगे। जब आप समझ गए हैं तो छोड़िए न उनके तौर तरीक़ों को।
    बाबा की बात फिर कभी , रात ज़्यादा हो गई है और रात की नमाज़ भी अभी तक अदा नहीं की है।

    सादर !

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  20. सच कहू तो आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ. आज वही बाते हो रही है जो मैं कबसे कह रहा हूँ. लग रहा है अब सभ्य लोंगो की जमात लग रही है. जब यह बात मैं करता था उन बातो के दौरान मेरा नाम मुल्ला हरीश रख दिया जाता था. आज उसी कडवाहट को ख़त्म करने के लिए सार्थक बहस चल रही है. बदलाव जरूर आएगा. जब अंकित, आशु,देवास ,तरुण भारतीय जैसे युवा जो पढ़ लिख कर राजनीती को कीचड़ मानकर दामन बचा रहे है बल्कि उसकी कमियों को दूर करने में लगे है. उत्तम सोच और विचार परिवर्तन के इस आन्दोलन को नमन

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  21. जगत गुरु भारत में सबसे ज्यादा लंगड़े लूले सबसे ज्यादा कोढ़ी अंधे हैं
    क्यों की चरक श्रुश्रत की परंपरा पर एलोपैथिक फंदे हैं


    दिवस जी , इस विस्तृत लेख के लिए आप को कोटिशः धन्यवाद , हमारी महान गौरव गाथाओं को कवियों की कल्पना और गड़रियों के गीत बता कर भारतवासियों को उनकी संस्कृति से दूर करने का प्रतत्न किया जा रहा है पिछले 170 वर्षों से और आज तो स्थिति यह हो गयी है की यदि आप अपनी भाषा या संस्कृति की बात करोगे तो आप को अनपढ़ या मुर्ख और पिछड़ा हुआ मान लिया जायेगा | मैं एक कंप्यूटर अभियंता हूँ और मेरे कार्यालय में कुछ लोगों ने मेरे पास एक हिंदी पत्रिका देख ली थी तो इस आधार पर मुझे प्रथमदृष्टयः अनपढ़ और अज्ञानी मान लिया गया था यद्यपि आज सभी के विचार एकदम विपरीत हैं | मतलब यह की आज की समस्त पद्धतियां हमारी संस्कृति और भारतीयता के सम्बन्ध में पूर्वाग्रह जनित करने का कार्य कर रही हैं |

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  22. @अनवर भाई:
    १ जब तक अंग्रेज़ थे ..........अब न तो औरंगज़ेब है और न ही मैकाले, तब हिन्दू ख़ुद अपनी पहचान क्यों मिटाने पर तुला हुआ है ?

    जमाल भाई लेखक भी यही कह रहा है की ये मैकाले का कुशल प्रबंधन ही है की आज भी चोटी काट कर..या अगर साधारण कहूँ तो अपनी सभ्यता भूल गएँ हैं लोग...आप ज्ञानी हैं आप जानते होंगे की अंग्रेज अगले ३०० साल की प्लानिंग करते हैं...उसी तर्ज पर बहुराष्ट्रीय अंग्रेज कंपनिया भी ३-५ साल की प्लानिंग करती है हर साल ..यहीं पर हम(भारतवासी) कमजोर हो गये की उनकी कुटिल चल नहीं समझ पाए..
    किसने कहा मैकाले चला गया है सोनिया मनमोहन कपिल सिब्बल के रूप में कितनी मैकाले की धर्म संताने हैं यहाँ..इन सबके तथ्य मैं अपने अगले लेख में दे दूंगा..

    २ "यह सब किसी एक पार्टी के कार्यकर्ता नहीं कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाले भी यही कर रहे हैं।:

    जी नहीं ये सिर्फ राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाले ही नहीं जो नहीं लगते हैं वो भी कर रहें हैं क्यों??? यही लेखक बता रहा है की जब बिदेशी के मकडजाल में फस गए हैं हम आप बताएं संस्कृत पढ़े लड़के को कहाँ नौकरी मिलेगी...ये गलती संस्कृत की नहीं है ये सिस्टम है जो मैकाले की डिजाईन है..वही बदलने की बात हो रही है..
    दूसरा आप से राष्ट्रवाद की बात करना निरर्थक है क्युकी आप ने एक बार किसी लेख पर अपने प्रतिउत्तर में कहा था की आप राष्ट्रवाद को नहीं मानते ..
    मगर मैं मानता हूँ मुझे शर्म नहीं आती जय हिन्दुस्थान बोलने में .और मैं जय श्री राम से पहले वन्दे मातरम बोलता हूँ..

    वन्दे मातरम
    जय श्री राम...

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  23. अनवर भाई, आप शायद मेरा भावार्थ नहीं समझे| जो आपने टिप्पणी में लिखा है वही तो मेरी पीड़ा है|
    हम क्यों अपनी संस्कृति को बुलते जा रहे हैं? क्यों हम यह मान बैठे हैं कि हम आर्य भारतीय नहीं विदेशी हैं? क्यों हमे अपने ही पिता के द्वारा दिए गए ज्ञान पर हीन भावना है जबकि पड़ोस के अंकल जी (जिन्होंने हमे वर्षों लूटा) हमे ब्रॉड माइंडेड लगते हैं|
    जब भारत में ही मदरसों में कुरआन पढ़ाई जा सकती है, कॉन्वेंट में बाइबिल पढ़ाई जा सकती है तो गीता, रामायण पढ़ाने पर हो हल्ला क्यों?
    देश के पढ़े लिखे बुद्धुजिवियों को कॉन्वेंट तो बहुत एडवांस्ड स्टडी वाले दिखाई देते हैं, किन्तु आदर्श विद्या मंदिर पिछड़े हुए, क्यों?
    आपने जो टिप्पणी में लिखा है, वही मैंने लेख में लिखा है| केवल शब्दों का कुछ अंतर है|

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  24. मैं हूं मनुवादी
    @ आदरणीय आशुतोष जी !
    1. जय हिन्द हम भी बोलते हैं और हम तो यहां तक कहते हैं कि ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा‘। इतना कह देने के बाद भी किसी के मुंह में ऐसे शब्द कहने पर ज़ोर नहीं देना चाहिए जिन्हें अंग्रेज़ों के किसी चाटुकार ने लिखे हों। जो बात आप ‘जन गण मन‘ के बारे में कहते हैं, वही ऐतराज़ हमें ‘वन्दे मातरम्‘ के बारे में है।
    2. ख़ैर, यह पोस्ट वन्दे मातरम के विषय पर नहीं है और न ही हम इस विषय पर यहां बात करेंगे क्योंकि यह अपने आप में एक मुकम्मल विषय है। जब इसे सलीक़े से उठाया जाएगा तो इस पर बात की जाएगी। आपके ऐतराज़ के जवाब में कुछ जुमले अदा करने ज़रूरी थे, सो किए।
    3. मैं ईश्वरवाद को मानता हूं और मनुवादी हूं। सारे मनुष्य एक ही मनु ‘स्वयंभू मनु‘ की संतान हैं। सारे मनुष्य एक ही परिवार हैं। मैं मनुवादी हूं। अतः मानवतावादी हूं। मैं सारी मानव जाति को एक परिवार और सारी धरती को एक घर मानता हूं। सारे मनुष्य वास्तव में एक राष्ट्र हैं। मैं इस राष्ट्र को मानता हूं और केवल इन्हीं अर्थों में राष्ट्रवादी हूं। मैं एक राष्ट्र को खंडित करने की निंदा करता हूं और इस एक धरती पर बहुत से राष्ट्रों के होने को नकारता हूं। मैं देश, भाषा और संस्कृति के आधार पर राष्ट्र का विभाजन स्वीकार ही नहीं करता। जो लोग यह विभाजन स्वीकार करते हैं और किसी राष्ट्रवाद की किसी भू-सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास रखते हैं, उन्हें पुनर्विचार की आवश्यकता है। यह अवधारणा मनुवाद के विपरीत है। अतः त्याज्य है।
    4. ‘जय श्री अनंत राम‘ हम भी बोलते हैं और कोई भी अच्छी बात बोलने में हमें कोई परहेज़ नहीं है।
    आपने मैकाले के उत्तराधिकारियों के रूप में सोनिया, मनमोहन और कपिल सिब्बल आदि के नाम लिए हैं लेकिन बीजेपी के किसी भी नेता का नाम नहीं लिया है, क्यों ?
    5. क्या ‘वन्दे मातरम्‘ गाने वाले राष्ट्रवादी नेताओं के बच्चे गुरूकुलों में पढ़ रहे हैं ?
    अगर वे अपने बच्चों को गुरूकुलों में पढ़ाएंगे तो भी उनके सामने रोज़गार का संकट कभी नहीं आएगा। गुरूकुलों से निकलने वाले विद्यार्थी भी अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे हैं और उनमें से किसी के पास तो एक लाख करोड़ तक ख़जाना मौजूद है।
    अतः यह कहना ग़लत है कि गुरूकुलों से निकलने वालों को नौकरी कहां मिलेगी ?
    ...और अगर अपनी संस्कृति अपनाकर कुछ परेशानी आती भी है तो उसे उठाने में आदमी को संतोष मिलना चाहिए। यह क्या बात हुई कि आदमी अपनी संस्कृति पर तभी चलने के लिए तैयार हो जबकि उसमें उसे कोई परेशानी न उठानी पड़ती हो। जो लोग कठिनाई नहीं झेल सकते, कोई त्याग नहीं कर सकते, वे अपनी संस्कृति की रक्षा भला कैसे कर पाएंगे ?

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  25. अपने सिर पर चोटी रखना तो बिल्कुल अपने हाथ में है
    @ आदरणीय दिवस गौड़ जी ! आपकी चिंता और मेरी चिंता समान है लेकिन उसके निराकरण में अंतर है। मेरा तरीक़ा यह है कि जो लोग सत्य जान चुके हैं उन्हें अपनी संस्कृति अपनाने में देर नहीं करनी चाहिए। कोई और अपने बच्चों को भले ही कान्वेंट में भेजे लेकिन बोध प्राप्त जनों को अपने बालक गुरूकुलों में ही भेजने चाहिएं। जब ये लोग ऐसा करना शुरू कर देंगे तो तब्दीली ख़ुद ब ख़ुद आती चली जाएगी।
    अपने सिर पर चोटी रखना तो बिल्कुल अपने हाथ में है और नित्य 3 टाइम हवन करना भी। जो काम बिल्कुल अपने हाथ में हैं, उन्हें भी न करना यही बताता है कि आदमी को कर्म के बजाय ‘टॉक‘ पसंद है।
    मैं कहीं ग़लत होऊं तो आपसे मार्गदर्शन चाहूंगा।

    धन्यवाद !

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  26. अनवर भाई ..
    आप ने कैसे मान लिया की मैंने जन गण मन का विरोध किया है...हाँ आप का वन्दे मातरम से ऐतराज सर्वव्यापी है..
    आप खंडित करने के विरोध में हैं और हम अखंड हिन्दुस्थान के समर्थन में..
    आपने मैकाले के उत्तराधिकारियों के रूप में सोनिया, मनमोहन और कपिल सिब्बल आदि के नाम लिए हैं लेकिन बीजेपी के किसी भी नेता का नाम नहीं लिया है, क्यों ?
    क्युकी वर्तमान का सन्दर्भ मैंने दिया है...अगर कोई बीजेपी का नेता ये कृत्य करता है तो वो भी शामिल है,,आप जरा कांग्रेस बीजेपी से ऊपर आयें ..

    अपनी संकृति हम नहीं भूले हैं इसलिए ये बहस जीवित है...उदहारण भूतकाल में दिया है आगे भी जरुरी हुआ तो देंगे..मगर विषयांतर हो जायेगा
    हाँ मगर उस व्योस्था को बदलने की बात हो रही है जो हमारी संस्कृति के जड़ों में मट्ठा डाल रही है..पहले व्यवस्था विशेषकर शिक्षा व्यवस्था को बदलना होगा तभी हम आगे अपनी पीढ़ियों को सही मार्गदर्शन दे पाएंगे.ये सत्य है .भूखे पेट आज की जंग नहीं जीती जा सकती अगर जरुरत हो तो मैकाले की व्यवस्था बदलने के लिए इसका हिस्सा बनना पड़ेगा(ये मेरी व्यक्तिगत राय है)..क्यूकी निति निर्धारण दुर्भाग्यवश उनके हाथ में है..उन नीतियों से किसी संस्कृत के शोधार्थी का भला नहीं होता...तो पहले वो नीति बदलनी होगी..;वो गुलाम मानसिकता बदलनी होगी..
    आप का कहना ये है की अगर संकृति की रक्षा करनी है तो भूखे पेट मर जाओ..वर्तमान व्यवस्था यही कहती है...पूरा समाज राणाप्रताप नहीं हो सकता.. जो लोग है वो अब भी भी है...

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  27. कृपया लेख की बात करें..सभी को निर्देश है की हर बात को धर्म में न लायें...इसके लिए अपने निजी मंच का प्रयोग करें
    आप सभी की सहमती और आशुतोष के विशेष अनुरोध पर मंच के लिए समय निकाला था..मगर ऐसी विवादित टिप्पणियों से मंच की छवि बिगडती है.विवादित टिप्पणिया अगले कुछ घंटों में हटा दी जाएँगी..
    ऐसा निर्देशित किया जाता है की कोई भी प्रतिउत्तर न करे मेरी राय पर

    राजेश

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  28. एक अच्छे खासे लेख का सत्यानाश करने पर तुले हुए है,
    बेकार के कमैन्ट करने वाले,
    अपना प्रचार करने का सबसे अच्छा तरीका तलाश किया है,
    जो है कि किसी को भी उल्टा सीधा कह दो बस हो गया काम।

    ये देश सुधरे भी तो कैसे, जब हर पार्टी में अंग्रेजों के वंशज है, चमचों पर तो सभी सहमत हो जाओगे।

    जय भारत, जय हिन्द, वन्दे मातरम, जय भोले नाथ

    यहाँ लेख की अच्छाई की बाते करो, अपने प्रचार की नहीं?

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  29. @ आदरणीय आशुतोष जी ! संस्कृत सेवियों के पास इतना धन है कि न तो उसे तौला जा सकता है और न ही उसे गिना जा सकता है। इसलिए कोई भी संस्कृत पढ़कर भूखा नहीं रह सकता। इस विषय पर आप देखिए मेरी एक खोजी रिपोर्ट
    संस्कृत पर ब्लॉग जगत की पहली खोजी रिपोर्ट
    इसी के साथ मैं यह भी अर्ज़ करना मुनासिब समझता हूं कि वर्तमान व्यवस्था का विकल्प मैं ‘मनुवादी व्यवस्था‘ को मानता हूं। जब भी आप सुव्यवस्था की चर्चा में मुझे आमंत्रित करेंगे, मैं यही कहूंगा और जो मनु की शिक्षाओं पर नहीं चलेंगे, मैं अवश्य ही उन्हें धर्म का स्मरण कराऊंगा।
    यदि मेरी एक भी टिप्पणी यहां से अकारण हटाई जाती है तो दरअसल वह मुझे हटाया जाना समझा जाएगा।

    सादर प्रणाम ,
    संभवतः यह मेरा अंतिम अभिवादन है इस मंच के सदस्यों को।

    ओम शांति

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  30. दिवस जी,
    आपका लेख दिखाता है कि आप खुद को समाज से दूर रहकर नहीं देख रहे, और यह अच्छी बात है। व्यवस्था में खामी ढूँढना व्यवस्था का विरोध नहीं बल्कि उसे और चाक चौबंद करना है ताकि समाज और देश के विकास में सहायता मिल सके, वही हमारा मुख लक्ष्य होना चाहिये। अपने इतिहास पर हमें गौरव होना भी चाहिये और फ़िर से उसे प्राप्त करने के लिये प्रयास भी करने चाहियें।
    अंकित का कमेंट भी वर्तमान परिदृश्य दिखाता है और साथ ही यह कि अगर इरादे पक्के और नीयत अच्छी है तो जो आज आपकी आलोचना कर रहे हैं, कल आपका लोहा भी मानेंगे।
    आशुतोष के कमेंट्स पोस्ट को और विस्तार दे रहे हैं। सलीकेदार ढंग से अपने तर्क रखते शिक्षित युवाओं को देखना सुखद लग रहा है।

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  31. मेरी यह टिप्पणी इस मंच के सह संपादक के रूप में , यह मंच सुव्यवस्था के सम्बन्ध में विचार करने के लिए है और हमें लगता है की हिंदी के चिट्ठों का जगत इतना परिपक्व हो चुका है की यहाँ पर विषय आधारित गंभीर चर्चा हो सके , हम "विवादों द्वारा लोकप्रचार" या "लोकप्रचार ही सफलता" की नीति पर नहीं चल रहे हैं अतः हम विवादों से दूर रहते हुए सुव्यवस्था पर गंभीर चिंतन करना चाहते हैं और इस मंच की शुचिता गंभीरता और मर्यादा को भंग करने वाला कोई भी कृत्य इस मंच पर सह्य नहीं होगा | इस मंच के प्रबंधन के निर्णय के अनुसार कोमल पाण्डेय , आशुतोष , अनवर जमाल और दिवस गौड़ की टिप्पणियां हटाई जा रही हैं |इसके अतिरिक्त हम इस मंच को लिंकों का संग्रह नहीं बनाना चाहते हिं अतः सभी से निवेदन है की यहाँ पर व्यर्थ में लिंक न दें |

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  32. अनवर जमाल , ये सब करना हमारे वश में नहीं है , अगर आप ने कोशिश की होती तो आप को भी पता चल गया होता , पुनः स्वयं का अनुभव सुनाता हूँ मैं अपने हस्ताक्षर देवनागरी में करता हूँ और मुझे "हिंदी में साइन !!!!" अक्सर सुनने को मिलाता है और इन शब्दों के साथ कभी घ्राण,कभी उपहास कभी आश्चर्य और कभी विस्मय तो कभी भ्रम होता है , और यह मुझे तब से सुनने को मिल रहा है जब से मैंने इंजीनियरिंग विद्यालय में प्रवेश लिया था | 29 जून को मेरा जन्म दिन था और मेरे कार्यालय में हर कर्मचारी का जन्म दिन पाश्चात्य तरीके से मोमबत्तियां बुझाकर और केक काटकर मनाया जाता है मैंने जब ऐसा करने से माना कर दिया तो बवाल हो गया और "मेरी टीम की इज्जत मिटटी में मिल गयी" और अब कार्यालय में परिस्थितियां मेरे लिए कुछ कठिन हैं काम करने की |हम उस समाज में कार्य करते हिं जहाँ पर हमें 14 फरवरी को लाल रंग के कपडे पहन कर आने का आधिकारिक आदेश मिलाता है और जब हम लाल कपडे पहन कर नहीं जाते हैं तो सबसे अलग दिखाते हैं , इसका यह मतलब नहीं की हम भी उन की ही तरह हो जायेंगे हम चीजों को जानते हैं तो हम बाकियों की तरह व्यव्हार नहीं कर सकते हैं परन्तु परिस्थितियों के सामंजस्य बैठाते हुए परिस्थितियों को परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे हैं हम |

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  33. अंकित भाई की टिप्पणी पढ़कर लगा कि मेरी भी समस्या यही है|
    देवनागरी में हस्ताक्षर करने के कारण मुझे भी पता नहीं कैसी कैसी नज़रों का सामना करना पड़ता है|
    एक सहकर्मी के जन्मदिवस के उपलक्ष में जब मैंने पेप्सी कोला या चाय कॉफ़ी लेने से मना कर दिया तो ऐसे ऐसे आरोप लगाए गए कि उनकी बुद्धि पर तरस आने लगा| कहने लगे किसी की ख़ुशी में यदि शामिल न हो सको तो आना भी नहीं चाहिए था| अपना व हमारा भी मूड खराब कर दिया|
    मुझे यही समझ नहीं आता कि मैंने ऐसा कौनसा पाप कर दिया था?
    एक बार किसी ने पूछ लिया कि तुम्हार फेवरेट हीरो कौन है? मेरे मूंह से अचानक भगत सिंह का नाम सुनकर सबकी आश्चर्यजनक नज़रें मुझ पर थीं| अरे ये कौनसा हीरो है? मैंने शाहरुख या सलमान का नाम क्यों नहीं लिया?
    अब बताइये यदि वे अभिनेता को ही नायक समझते हैं तो गलती किसकी है?

    यही मैकॉले मानस सोच है जिसने हम भारतीयों का पौरुष नष्ट कर दिया है|

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  34. अंकित ने सही ही कहा है....यद्यपि मैं स्वयं चिकित्सा वि वि में पढने-पढाने के दौर से ही ( १९६४) हिन्दी में हस्ताक्षर कर रहा हूँ ...और किसी ने कुछ नहीं कहा ...परन्तु मैं निश्चय ही अन्य चिकित्सकों व लोगों को इसके लिए प्रेरित करने में अधिक सफल नहीं हुआ....हिन्दी का अखबार खरीदना-पढना , पत्रिकाएं पढना आज भी ( अब कम्प्युटर व इन्फो-टेक के जमाने में यह आदत और भी अधिक) कम आधुनिक होना माना जाता है...

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