गुरुवार, 21 जुलाई 2011

मैकाले की प्रासंगिकता

भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव


मैकाले नाम हम अक्सर सुनते है मगर ये कौन था? इसके उद्देश्य और विचार क्या थे कुछ बिन्दुओं की विवेचना का प्रयास हैं करते.
मैकाले: मैकाले का पूरा नाम था थोमस बैबिंगटन मैकाले|अगर ब्रिटेन के नजरियें से देखें तो अंग्रेजों का ये एक अमूल्य रत्न था .. एक उम्दा इतिहासकार, लेखक प्रबंधक, विचारक और देशभक्त ..इसलिए इसे लार्ड की उपाधि मिली थी और इसे लार्ड मैकाले कहा जाने लगा..अब इसके महिमामंडन को छोड़ मैं इसके एक ब्रिटिश संसद को दिए गए प्रारूप का वर्णन करना उचित समझूंगा जो इसने भारत पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए दिया था...

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में-

" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो
इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था,उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं.एक पूर्णरूप से गुलाम भारत "

कई सेकुलर बंधू इस भाषण की पंक्तियों को कपोल कल्पित कल्पना मानते है|अगर ये कपोल कल्पित पंक्तिया है, तो इन काल्पनिक पंक्तियों का कार्यान्वयन कैसे हुआ??? सेकुलर मैकाले की गद्दार औलादे इस प्रश्न पर बगले झाकती दिखती है..और कार्यान्वयन कुछ इस तरह हुआ की आज भी मैकाले व्योस्था की औलादे छद्म सेकुलर भेष में यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं.|
अरे भाई मैकाले ने क्या नया कह दिया भारत के लिए??,भारत इतना संपन्न था की पहले सोने चांदी के सिक्के चलते थे कागज की नोट नहीं..धन दौलत की कमी होती तो इस्लामिक आतातायी श्वान और अंग्रेजी दलाल यहाँ क्यों आते..लाखों करोड़ रूपये के हीरे जवाहरात ब्रिटेन भेजे गए जिसके प्रमाण आज भी हैं मगर ये मैकाले का प्रबंधन ही है की आज भी हम लोग दुम हिलाते हैं अंग्रेजी और अंग्रेजी संस्कृति के सामने..हिन्दुस्थान के बारे में बोलने वाला संकृति का ठेकेदार कहा जाता है और घृणा का पात्र होता है इस सभ्य समाज का|

शिक्षा व्यवस्था में मैकाले प्रभाव : ये तो हम सभी मानते है की हमारी शिक्षा व्यवस्था हमारे समाज की दिशा एवं दशा तय करती है..बात १८२५ के लगभग की है..जब ईस्ट इंडिया कंपनी वितीय रूप से संक्रमण काल से गुजर रही थी और ये संकट उसे दिवालियेपन की कगार पर पहुंचा सकता था..कम्पनी का काम करने के लिए ब्रिटेन के स्नातक और कर्मचारी अब उसे महंगे पड़ने लगे थे.|

१८२८ में गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक भारत आया जिसने लागत घटने के उद्देश्य से अब प्रसाशन में भारतीय लोगों के प्रवेश के लिए चार्टर एक्ट में एक प्रावधान जुड़वाया की सरकारी नौकरी में धर्म जाती या मूल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा |

यहाँ से मैकाले का भारत में आने का रास्ता खुला|अब अंग्रेजों के सामने चुनौती थी की कैसे भारतियों को उस भाषा में पारंगत करें जिससे की ये अंग्रेजों के पढ़े लिखे हिंदुस्थानी गुलाम की तरह कार्य कर सकें..इस कार्य को आगे बढाया जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन के अध्यक्ष थोमस बैबिंगटन मैकाले ने |मैकाले की सोच स्पष्ट थी...जो की उसने ब्रिटेन की संसद में बताया जैसा ऊपर वर्णन है..

उसने पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को ख़तम करने और अंग्रेजी(जिसे हम मैकाले शिक्षा व्यवस्था भी कहते है) शिक्षा व्यवस्था को लागु करने का प्रारूप तैयार किया..
मैकाले के शब्दों में:
"हमें एक हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हम अंग्रेज शासकों एवं उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके, जिन पर हम शासन करते हैं। हमें हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जिनका रंग और रक्त भले ही भारतीय हों लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों"


और देखिये आज कितने ऐसे मैकाले व्योस्था की नाजायज श्वान रुपी संताने हमें मिल जाएंगी..जिनकी मात्रभाषा अंग्रेजी है और धर्मपिता मैकाले|इस पद्दति को मैकाले ने सुन्दर प्रबंधन के साथ लागु किया..अब अंग्रेजी के गुलामों की संख्या बढने लगी और जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे वो अपने आप को हीन भावना से देखने लगे क्यूकी सरकारी नौकरियों के ठाट उन्हें दीखते थे अपने भाइयों के जिन्होंने अंग्रेजी की गुलामी स्वीकार कर ली..और ऐसे गुलामों को ही सरकारी नौकरी की रेवड़ी बटती थी....


कालांतर में वे ही गुलाम अंग्रेजों की चापलूसी करते करते उन्नत होते गए और अंग्रेजी की गुलामी न स्वीकारने वालों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया|विडम्बना ये हुए की आजादी मिलते मिलते एक बड़ा वर्ग इन गुलामों का बन गया जो की अब स्वतंत्रता संघर्ष भी कर रहा था..यहाँ भी मैकाले शिक्षा व्यवस्था चाल कामयाब हुई अंग्रेजों ने जब ये देखा की भारत में रहना असंभव है तो कुछ मैकाले और अंग्रेजी के गुलामों को सत्ता हस्तांतरण कर के ब्रिटेन चले गए|मकसद पूरा हो चुका था|अंग्रेज गए मगर उनकी नीतियों की गुलामी अब आने वाली पीढ़ियों को करनी थी और उसका कार्यान्वयन करने के लिए थे कुछ हिन्दुस्तानी भेष में बौधिक और वैचारिक रूप से अंग्रेज नेता और देश के रखवाले |


कालांतर में ये ही पद्धति विकसित करते रहे हमारे सत्ता के महानुभाव..इस प्रक्रिया में हमारी भारतीय भाषाएँ गौड़ होती गयी और हिन्दुस्थान में हिंदी विरोध का स्वर उठने लगा..ब्रिटेन की बौधिक गुलामी के लिए आज का भारतीय समाज आन्दोलन करने लगा|फिर आया उपभोगतावाद का दौर और मिशिनरी स्कूलों का दौर|चूँकि २०० साल हमने अंग्रेजी को विशेष और भारतीयता को गौण मानना शुरू कर दिया था तो अंग्रेजी का मतलब सभ्य होना,उन्नत होना माना जाने लगा |

हमारी पीढियां मैकाले के प्रबंधन के अनुसार तैयार हो रही थी और हम भारत के शिशु मंदिरों को सांप्रदायिक कहने लगे क्युकी भारतीयता और वन्दे मातरम वहां सिखाया जाता था|जब से बहुराष्ट्रीय कंपनिया आयीं उन्होंने अंग्रेजो का इतिहास दोहराना शुरू किया और हम सभी सभ्य बनने में उन्नत बनने में लगे रहे मैकाले की पद्धति के अनुसार |


अब आज वर्तमान में हमें नौकरी देने वाली हैं अंग्रेजी कंपनिया जैसे इस्ट इंडिया थी..अब ये ही कंपनिया शिक्षा व्यवस्था भी निर्धारित करने लगी और फिर बात वही आयी कम लागत वाली, तो उसी तरह का अवैज्ञानिक व्योस्था बनाओं जिससे कम लागत में हिन्दुस्थानियों के श्रम एवं बुद्धि का दोहन हो सके..


एक उदहारण देता हूँ कुकुरमुत्ते की तरह हैं इंजीनियरिंग और प्रबंधन संस्थान..मगर शिक्षा पद्धति ऐसी है की १००० इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिंग स्नातकों में से शायद १० या १५ स्नातक ही रेडियो या किसी उपकरण की मरम्मत कर पायें नयी शोध तो दूर की कौड़ी है |अब ये स्नातक इन्ही अंग्रेजी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास जातें है, और जीवन भर की प्रतिभा ५ हजार रूपए प्रति महीने पर गिरवी रख गुलामों सा कार्य करते है...फिर भी अंग्रेजी की ही गाथा सुनाते है..


अब जापान की बात करें १०वीं में पढने वाला छात्र भी प्रयोगात्मक ज्ञान रखता है...किसी मैकाले का अनुसरण नहीं करता..

अगर कोई संस्थान अच्छा है जहाँ भारतीय प्रतिभाओं का समुचित विकास करने का परिवेश है तो उसके छात्रों को ये कंपनिया किसी भी कीमत पर नासा और इंग्लैंड में बुला लेती है और हम मैकाले के गुलाम खुशिया मनाते है की हमारा फला अमेरिका में नौकरी करता है |इस प्रकार मैकाले की एक सोच ने हमारी आने वाली शिक्षा व्यवस्था को इस तरह पंगु बना दिया की न चाहते हुए भी हम उसकी गुलामी में फसते जा रहें है..
समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव : अब समाज व्योस्था की बात करें तो शिक्षा से समाज का निर्माण होता है.. शिक्षा अंग्रेजी में हुए तो समाज खुद ही गुलामी करेगा..वर्तमान परिवेश में MY HINDI IS A LITTLE BIT WEAK बोलना स्टेटस सिम्बल बन रहा है जैसा मैकाले चाहता था की हम अपनी संस्कृति को हीन समझे|

मैं अगर कहीं यात्रा में हिंदी बोल दू,मेरे साथ का सहयात्री सोचता है की ये पिछड़ा है..लोग सोचते है त्रुटी हिंदी में हो जाए चलेगा मगर अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए..और अब हिंगलिश भी आ गयी है बाज़ार में..क्या ऐसा नहीं लगता की इस व्योस्था का हिंदुस्थानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का होता जा रहा है....अंग्रेजी जीवन में पूर्ण रूप से नहीं सिख पाया क्यूकी बिदेशी भाषा है...और हिंदी वो सीखना नहीं चाहता क्यूकी बेइज्जती होती है...

हमें अपने बच्चे की पढाई अंग्रेजी विद्यालय में करानी है क्यूकी दौड़ में पीछे रह जाएगा..माता पिता भी क्या करें बच्चे को क्रांति के लिए भेजेंगे क्या??? क्यूकी आज अंग्रेजी न जानने वाला बेरोजगार है..स्वरोजगार के संसाधन ये बहुराष्ट्रीय कंपनिया ख़तम कर देंगी फिर गुलामी तो करनी ही होगी..तो क्या हम स्वीकार कर लें ये सब?? या हिंदी पढ़कर समाज में उपेक्षा के पात्र बने????
शायद इसका एक ही उत्तर है हमे वर्तमान परिवेश में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को स्थापित करना होगा|हमें विवेकानंद का "स्व" और क्रांतिकारियों का देश दोनों को जोड़ कर स्वदेशी की कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास करना होगा..चाहे भाषा हो या खान पान या रहन सहन पोशाक...

अगर मैकाले की व्योस्था को तोड़ने के लिए मैकाले की व्योस्था में जाना पड़े तो जाएँ |जैसे मैं अंग्रेजी गूगल का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहा हूँ |क्यूकी कीचड़ साफ करने के लिए हाथ गंदे करने होंगे|हर कोई छद्म सेकुलर बनकर सफ़ेद पोशाक पहन कर मैकाले के सुर में गायेगा तो आने वाली पीढियां हिन्दुस्थान को ही मैकाले का भारत बना देंगी.. उन्हें किसी ईस्ट इंडिया की जरुरत ही नहीं पड़ेगी गुलाम बनने के लिए..और शायद हमारे आदर्शो राम और कृष्ण को एक कार्टून मनोरंजन का पात्र |

15 टिप्‍पणियां:

  1. अंकित भाई आपके इस शोध परक लेख के लिए बधाई देता हूँ ...अगर आपको इन सभी बिदेशी तथाकथित विद्वानों को जानना है तो आप ब्रिटिश इतिहासकार तथा भारत नामक ऐतिहासिक पुस्तक पढ़े ...ये पुस्तक मेरे पास है ..आपको पुन: बधाई
    Dr. Ratnesh Tripathi

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  2. अरे रत्नेश जी ये तो गड़बड़ हो गयी , ये लेख मेरा नहीं आशुतोष जी ने लिखा है , अब क्या होगा ?? मुझे आशुतोष जी से कौन बचाएगा ???

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  3. आपकी बधाई आशुतोष जी को ट्रांसफर .........

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  4. इतने ज्ञानपरक लेख के लिए आपको बधाई |आपकी बातों से मेरी सहमति इतनी अधिक है कि लगता हैकि आप नहीं मैं ही बोल रही हूँ | जिसके पास सामान्य शिक्षा के लिएव्यव्स्था नही वह भी अंग्रेजी को पढना अपनी शान समझता है|

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  5. बीना जी तो आपभी लिख साकाती हैं इस मंच के लिए

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  6. यदि किसी देश को ख़त्म करना है तो उसका इतिहास ख़त्म कर दो , देश खुद व खुद ही ख़त्म हो जायेगा. योगासन और प्राणायाम के जगह पर शारीरिक विकास के नाम पर स्कूल में जो पी टी कराई जाती है वह भी शायद इन्ही मैकाले साहब का करा धराया है. ज्ञानवर्धक लेख पढवाने के लिए धन्यवाद.

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  7. आशुतोष भाई, बहुत गहरी पीड़ा दी है इस मैकॉले ने|
    क्या से क्या बना दिया हमें|
    जब अंग्रेज़ भारत आये थे तो भारतीय इन्हें जाहिल समझते थे| जब इन्हें छूरी कांटे से खाना खाते देखते तो उन्हें हीन भावना से देखते थे कि ये बिना हाथ धोये खाना खा रहे हैं| किन्तु आज यदि भारत में ही किसी पांच सितारा होटल में हम हाथ से खाना खाने लगें तो सभी भारतीय हमे हीन भावना से देखेंगे|
    मैंने ऐसा कई बार किया है और लोगों की अजीब दृष्टि का सामना भी किया है|
    देखो कैसी उलटी व्यवस्था हो गयी?

    जहां तक भाषा की बात की जाए तो इस विषय पर एम् आई टी के एक प्रोफ़ेसर डॉ. मधुसुदन झवेरी का एक लेख पढ़ा था "बैसाखी पर दौड़ा दौड़ी"
    बहुत ज्ञान वर्धक आलेख है| आप भी पढ़ें| मैं लिंक दे दूंगा|
    हमारे पास हिंदी नामक पाँव हैं, फिर भी हम अंग्रेजी की बैसाखी थामे चल रहे हैं| अब यह तो सभी जानते हैं कि अपने पाँव पर न चल कर बैसाखी पर चलने वाला सदैव धीरे ही चलेगा| और बैसाखी के स्वामी का अनुसरण ही करेगा| अंग्रेजी की बैसाखी थाम कर हम सदैव पश्चिमी देशों का अनुसरण ही करेंगे| कभी उनसे आगे निकलने की बात सोच भी नहीं सकते|

    कई बुद्धूजीवी ऐसे मिलते हैं कि हिंदी में तकनीकी शिक्षा नहीं हो सकती, यह केवल अंग्रेजी में ही संभव है| उनके लिए कहना चाहूँगा कि चीन और जापान देश सबसे बड़े उदाहरण हैं| अपनी मातृभाषा में उन्होंने जो उन्नति की है वाह अमरीका भी नहीं कर सका| हिंदी तो इन सबसे आगे है| हिंदी शब्दकोष में इतने शब्द है कि संसार की कोई भी विदेशी भाषा इसकी बराबरी नहीं कर सकती|

    दरअसल मैकॉले की शिक्षा ने हम भारतीयों को अपनी ही दृष्टि में तुच्छ बना दिया|

    सम्पूर्ण आलेख बहुत ज्ञान वर्धक लगा|
    आशुतोष भाई इस आलेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद....

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  8. सत्य को अंकित करती आशुतोष भाई की एक ज्ञानवर्धक व सार्थक पोस्ट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !
    आपने सही कहा कि मैकाले ने शिक्षा प्रबंधन इतना योजनावध तरीके से भारत में लागू किया की उसके जाने के कई सालों बाद भी हम आज उसी व्योव्स्था को ढो रहे हैं, और अपने युवा भारत को समय से पहले ही पश्चिमी रंग रूप वाली अर्थी पर चढ़ा रहे हैं ! जैसा कि विदित है मेरे अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में कि मैं एक छोटा सा शिक्षण संस्थान चलाता हूँ जहाँ पर कंप्यूटर से सम्बन्धित तकनिकी शिक्षा दी जाति है, परन्तु उस शिक्षा के साथ साथ में स्वय बीच बीच में प्रशिक्षुओं के बीच स्वदेशी शिक्षा को अपनाने और विदेशी शिक्षा को सिर्फ सीखने तक सीमित रहें आदि पर लेक्चर देता रहता हूँ जिसका परिणाम मुझे मिल भी रहा है पर मुझे लगता है कि हम पूरे भारत को नहीं बदल सकते पर कुछ लोगों में तो परिवर्तन ला ही सकते हैं!

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  9. संजय भाई, यदि हम कुछ लोगों में परिवर्तन ला सके तो वे परिवर्तित लोग पूरे भारत को बदल सकते हैं| बस उनके भीतर धधक रही आग को शांत होने से रोकना है|

    आप अपने शिक्षण संस्थान के द्वारा एक महान कार्य कर रहे हैं, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं...

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  10. दिवस भाई मैंने मन में एक संकल्प लिया हुआ है कि मैं सारी दुनिया को तो नहीं बदल सकता, परन्तु जहां जहाँ तक मेरी आवाज पहुंचेगी वहाँ वहाँ लोगों को स्वदेशी और विदेशी के अंतर का एहसास करवा दूंगा ऐसा मेरा प्रण है !

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  11. http://hindibhojpuri.blogspot.com/2011/07/blog-post_02.html

    लेख से सहमत लेकिन कुछ कहूंगा। पहली बात कि आप चाहें तो अंग्रेजों की संसद के सभी बहस का पाठ्य ब्रिटेन की संसद की साइट पर पढ़ सकते हैं। जब मैंने मैकाले की बातों को उस पर खोजना शुरु किया तो पाया कि उसने बताए दिन बहस ही नहीं की या फिर उस दिन की बहस का जिक्र साइट पर है ही नहीं। अफ़सोस है कि धर्मपाल जी की लिखी किताब की तारीख वाली बहस भी साइट पर नहीं मिली। जिस इंडिया हाउस लाइब्रेरी की बात कही जाती है उसकी स्थापना भारतीयों ने की है तो कुछ संदेह तो स्वाभाविक है। आप या जो लोग इन वाक्यों का या मैकाले आदि दानवों का कहा या लिखा बता रहे हैं(मैंने स्वयं अपनी किताब में 1813 की उस बहस का उल्लेख कियाअ है जो साइट पर नहीं है, सब सुनकर ही बता रहे हैं। इसका कोई गम्भीर सबूत नहीं मिल पाया है शायद।

    इसमें संशय नहीं है कि भारत में सम्पत्ति थी लेकिन मैकाले की बात अतिशयोक्ति अवश्य है, इसके लिए मैं एक नहीं बीस प्रमाण दे सकता हूँ। सवाल है कि कैसे ये सब प्रकाश में आए तो यह मुश्किल नहीं है। सच की पड़ताल होनी चाहिए, आँख मूँद कर रहना ठीक नहीं।
    गरीबी वाली बात मुझे भी यकीन था लेकिन कुछ बाते हैं जिनसे पता चलता है कि यह पूरा सच तो नहीं ही है। कुछ-कुछ सच हो सकता है। समय मिला तो इस पर शोध अवश्य करूंगा।



    अंग्रेजी भक्त लोगों के लिए हम जल्द ही इन्तजाम करने वाले हैं। अभी कल ही अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के लिए मुख्य गीत लिखा है। आगामी कुछ वर्षों में या महीनों अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन शुरु करने की इच्छा है। हिन्दी में तकनीकी शिक्षा पर भी एक बड़ा अध्याय लिखा है किताब में। अभी शोध और अध्ययन में लगा हूँ। जल्द ही किताब लिख कर समाप्त कर रहा हूँ। ऊपर के लिंक को देखिए।

    कुछ बेवकूफ़ सवाल करते हैं कि हम तकनीक का क्यों इस्तेमाल करते हैं जो अंग्रेजों की है तो उनसे एक जवाब दे दीजिए कि सारी दुनिया दाशमिक प्रणाली क्या एक शून्य ही छोड़ दे बस, हम भी सब छोड़ देंगे।

    टिप्पणी बड़ी हो रही है। इसलिए चलता हूँ।

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  12. चन्दन जी टिप्पणी बड़ी होने से कोई समस्या नहीं है , आप दो या तीन टिप्पणी भी कर सकते हैं | जहाँ तक इन बातों के काल्पनिक होने या असत्य होने का प्रशन है तो साक्ष्य भी इस तरफ ही संकेत कतरे हैं की उस समय भारत बहुत संमृद्ध था |

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  13. भारत के समृद्ध होने में संदेह नहीं कर रहा। लेकिन कोई गरीब नहीं था तो फिर 1000 से लेकर 1700 तक के सभी कवियों की रचनाओं सहित संस्कृत के ग्रन्थों में गरीबी और दान कहाँ से आए? तुलसी सहित कबीर या रहीम सभी ने गरीबी का जिक्र किया है। आखिर क्यों, क्या वजह थी? गरीबी तो थी ही। 1500 के बाद तुलसीदास के जीवन को ही देखें वे भी खाए बिना मरते हैं बचपन में। मैंने तुलसीदास पर भी एक छोटी किताब लिखी है, उस वक्त पढ़ा था।

    निश्चित रूप से थी लेकिन राजाओं ने या अमीरों ने सारी सम्पत्ति रखी होगी। या फिर गरीब थोड़े कम होंगे वरना 600 ईस्वी का राजा हर्षवर्धन दान किसे कर रहा था? मेरे सभी बातों पर ध्यान दें। राबर्ट क्लाइव ने भी बंगाल की तत्कालीन राजधानी मुर्शिदाबाद का जिक्र करते हुए कहा है कि लंदन से अधिक समृद्ध शहर बताया है। लेकिन इस बात के सबूत पर मैं कुछ नहीं कह सकता। यह मैंने आजादी के इतिहास की एक किताब में देखा है। वैसे कुछ खोजता हूँ राबर्ट का लिखा-कहा।

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  14. @ आर्य जी अंकित भाई ,रेखा जी ,दिवस भाई,संजय जी,चन्दन जी आप सभी का आभार..
    कहीं बाहर हू अतः मंच पर कम आ पाता हूँ..
    @ चन्दन जी शायद मैकाले ने वो भाषण पुरे परिवेश को ध्यान में रखते हुए दिया होगा..तो हो सकता है कुछ हिस्सों में गरीबी रही हो मगर वो जायदातर लोगो के सम्वृधि के सामने छिप गयी हो..
    चलिए इन अंशो पर विवाद है ये मान सकता हूँ मगर ये तो आप भी मानते हैं की मैकाले और उसकी निति की गुलामी हम कर रहे हैं..
    आलेख पर चर्चा के लिए आभार..

    अंग्रेज भक्तो के इंतजाम का इंतजार रहेगा..
    --

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  15. इस देश की शिक्षा पद्धति कैसा भारत निर्माण कर रही है ?

    इस देश की शिक्षा पद्धति को लार्ड मेकाले द्वारा डिजाइन ही इस रूप में किया गया है कि ये केवल अंधी दौड़ में दौड़ने वाले नौजवान भारत को पैदा करें , ना कि सोचने समझने वाला , हर क्रिया पर प्रतिक्रिया देने वाला नौजवान भारत|
    पुरातन काल में इस देश में इस प्रकार की शिक्षा पद्धति थी कि सामान्य लिपि और अंकगणितीय ज्ञान देने के पश्चात् बालक जिसकी उम्र १०- १५ वर्ष होती थी उस समय जिस क्षेत्र में रूचि रखता था उसे उसी क्षेत्र का ज्ञान दे कर विकसित किया जाता था , यथा चित्रकारी, युद्ध निति, अर्थनीति , राजनीति, संस्कृत शास्त्री , वेदपाठी , आयुध निर्माण , गणितज्ञ , लिपिकार, चिकित्सा इत्यादि अनेक क्षेत्र थे जो बालक को युवा होने तक उसके पसंदीदा विषय में निपुण कर देते थे | और इसी पद्धति को मेकाले ने देखा और उसे ब्रिटेन में लागू करने के लिए प्रयास शुरू किये और आज भी आप विदेशो में इस प्रकार की शिक्षा पद्धति का वर्तमान स्वरुप देख सकते है| चूँकि अंग्रेजो को यहाँ अपनी सत्ता निर्बाध रूप से चलानी थी तो उन्होंने सबसे पहला काम यहाँ की शिक्षा पद्धति को समाप्त करने का किया , गुरुकुल पद्धति को तहस नहस कर दिया|
    "किसी भी देश पर शासन करना हो या उसे अपना गुलाम बनाना हो तो उस देश के सांस्कृतिक मूल्यों को , उसकी संस्कृति को , उसके इतिहास को नष्ट कर दो| साम्राज्यवादियों का और साम्राज्यवाद फैलाने वालो का यही एक अकाट्य नियम है |"
    और इस नियम को काफी चतुराई से अंग्रेजो ने इस देश पर लागू किया और हम आज भी इसका तोड़ नहीं ढूंढ़ पाए है |
    और इस मेकाले की शिक्षा पद्धति का शिकार हुए हम आज अपने देश के युवाओ की सोच को केवल उसके चारो और बने घेरे तक सीमित कर रहे है | उसे एक वलय रेखा पर चलने वाला युवा बना कर छोड़ दिया है जो केवल स्वयं को और स्वयं के परिवार को स्थायित्व कैसे दे, और उसके बाद अपने बच्चो को? वह उसी वलय में घूम रहा है और आने वाली पीढ़ी को भी केवल उसी वलय पर बिना कदम डिगाए कैसे चला जाए इस बात की शिक्षा दे रहा है |
    अगर हमें इस देश में सम्पूर्ण परिवर्तन करना है तो सबसे पहले "गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया" द्वारा इस देश पर जबरदस्ती थोपी गयी मेकाले की शिक्षा पद्धति को जड़ से उखाड़ कर फेकना होगा | क्यों कि भले ही आप कांटे या कष्ट देने वाले पेड़ की शाखाओ और टहनियों को काट काट कर जलाते रहे , वो फिर से उग आता है जब तक की उसको समूल नष्ट नहीं किया जाता |

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