शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते २१वी सदी के भारत के कर्णधार

शिक्षा लेने की उम्र में भीख मांगने की मजबूरी




रोज घर से कार्यालय जाते समय दिल्ली के नारायण फ्लाईओवर के पास ५-७ मिनट का ट्रैफिक जाम सामान्य सी बात है..मगर एक और घटना रोज घटती है जिसे हमने रोज लगते ट्रैफिक जाम की तरह स्वीकार कर लिया है..वो है,इन्ही सिगनलों पर भीख मांगते कुछ अवयस्क बच्चे..मेरी भी दिनचर्या में कुछ ऐसा ही था,एक आँखों ही आँखों में अनकहा सा रिश्ता बन गया था इन बच्चो से,रोज मेरी कार वहां रूकती, कुछ जाने पहचाने चेहरों में से एक चेहरा मेरी ओर आता और मैं वहां के कई लोगो की तरह पहले से ही निकाल के रक्खे गए कुछ सिक्कों में से १ या २ उन्हें देकर दानवीर बनने की छद्म आत्मसंतुष्टि लिए आगे बढ़ जाता..

व्यस्तता के कारण कई दिन बाद कार्यालय जाना हुआ ..मगर आज एक नए चेहरे ने उसी जगह आ के हाथ फैला दिया रोज की तरह मैंने गाड़ी शीशे निचे करते हुए १ रूपये का एक सिक्का उसकी और बढ़ा दिया मगर नए चेहरे को देखकर अनायास ही निकाल पड़ा "नया आया है क्या?"बच्चा मेरी और देखता हुआ बिना कोई जबाब दिए सिक्का लेकर आगे बढ़ गया...


कमोवेश ऐसे वाकये आज हर एक महानगर में आम हैं और प्रतिदिन हम इनसे दो चार होते हैं मगर एक सिक्के तक ही हम सब अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है..
आज अगर हम सरकारी आंकड़ो पर गौर करें तो समाज कल्याण विभाग के अनुसार अकेले दिल्ली में लगभग ६०-७० हजार बच्चे भीख मांगते हैं..अगर इन्ही सरकारी आंकड़ों को आगे बढ़ाये तो कुल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(NCR ) में इनकी संख्या लगभग १२५,००० से ऊपर बैठती है..अब मुंबई के आंकड़े ले तो लगभग ३४५,००० बच्चे यहाँ भीख मांगते है प्रतिदिन ट्रैफिक सिगनल पर..
अगर यूनिसेफ के आंकड़ों की माने तो पूरे भारत में लगभग १८० लाख बच्चे सडको के किनारे रहते हैं जबकि पूरे विश्व में ये संख्या लगभग ४४० लाख है..इनमें से यदि २०% बच्चे भी भीख मांगते हैं तो भारत में प्रतिदिन ३६ लाख कर्णधार ट्रैफिक सिगनल पर कटोरा लिए होते हैं..जिसमें से ज्यादातर जनसँख्या महानगरों में है...अकेले दिल्ली और आस पास के क्षेत्रों में ये संख्या लगभग १.५ लाख है..आज बढ़ते हुए औद्योगीकरण के ज़माने में भीख मांगने का उद्योग भी एक अच्छे खासे उद्योग का रूप ले चूका है जिसकी दिल्ली में अनुमानित सालाना कारोबार लगभग २१५,०००००० (२१५ करोण) रूपये का है ये अभी न्यूनतम आंकड़े हैं शायद इनका वार्षिक कारोबार इससे दोगुना या तीन गुना तक है..ये तो हुए दिल्ली के आंकड़े तो पूरे भारत में इस उद्योग का सालाना कारोबार खुद ही आप अनुमान लगा सकते हैं|
इस अमानवीय उद्योग के लिए कच्चे मॉल के रूप में बच्चे पिछड़े इलाको से, अनाथ बच्चे, या माता पिता द्वारा फेके हुए होते है ..कुछ परिस्थितियों में गरीब माँ बाप इन बच्चों को बेच देते हैं या उनके साथ खुद भी इस उद्योग का हिस्सा बन जाते हैं|
अब हम गौर करें व्यवस्था पर, तो ये कुटीर उद्योग हर महानगर के ट्रैफिक सिगनल या चौराहों पर फल फूल रहा है, जहाँ से पुलिस चौकी की दूरी ज्यादा से ज्यादा २०० मीटर होती है..फिर भी ये व्यवसाय बढ़ता जा रहा है इसका सीधा सा कारण है व्यवस्था में हरामखोरी या हफ्ता लेने की आदत..हर भीख मांगते हुए बच्चे के लिए लगभग ५० रूपये उनका मालिक(इलाके का गुंडा) प्रतिदिन के हिसाब से सम्बंधित थाने में पंहुचा देता है..प्रकारान्तर से अपने पूर्वस्थापित मार्गो के द्वारा ये कमाई बंदरबांट होते हुए सरकार के आला अधिकारीयों एवं मंत्रियों तक पहुचती है..

इन बच्चो के ऊपर उद्योग की तरह प्रबंध तंत्र होता है जिसमें महिलाएं भी शामिल होती है जो ये निगाह रखती हैं की ये बच्चे भीख के पैसो की चोरी न करें या कहीं भाग न जाये..दिन के अंत में हमारे कर्णधारों को मिलता है आधे पेट भोजन ,१०य २० रूपये और गलियां..और हमारी व्यवस्था दलाली खाते हुए मूकदर्शक बनकर इस जघन्य कृत्य में सहभागिता करती है.

अब जरा आगे बढे तो ये बच्चे बड़े होते होते चोरी करने,चेन खीचने,जेब काटने एवं अन्य छोटे अपराधो में पारंगत कर दिए जाते हैं...थोडा अनुभवी होने के बाद ये बच्चे पूर्ण रूपेण सरकार एवं व्यवस्था संरक्षित अन्य उद्योगों, जैसे जरायम माफिया अंडरवर्ड में लगा दिए जाते हैं और शनै शनै कर्णधारों की दूसरी पीढ़ी ट्रैफिक सिगनल पर आ चुकी होती है..
मानवाधिकार आयोग,बालश्रम आयोग,यूनिसेफ जैसी दर्जनों राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं मिलकर भी इस अमानवीय उद्योग में कोई खास रोक नहीं लगा पा रही..
कश्मीर में हर बात पे हो हल्ला मचाने वाला मानवाधिकार आयोग रोज हो रहे इन बच्चों के मानवधिकारो के हनन पर चुप रहता है... एक बलात्कार को ब्रेकिंग न्यूज़ बनने वाली मीडिया रोज हो रही बच्चियों के यौन उत्पीडन की कोई सुध नहीं लेती..और बात बात में झंडा ले कर खड़ा होने वाले सफेदपोश नेता उसी ट्रैफिक सिगनल से अपनी मर्सिडीज से गुजर जाते हैं मगर इस मुद्दे पर उनका मौनव्रत पिछले ६० सालों से नहीं टूटा..
आज जब श्री अन्ना हजारे जी और स्वामी रामदेव जी जैसे देशभक्त स्वयंसेवी भारत सरकार को लोकपाल और कालेधन के मामले में नाको चने चबवा रहें है,मगर इन बच्चों के लिए उनके पास भी कोई अजेंडा नहीं ..कोई विचार नहीं..
एक प्रश्न सरकार से : क्यों करोडो बांग्लादेशियों को खरबों खर्च करके हमारी सरकार, भारतीय बना रही है और देश के कर्णधारों को उसकी अपनी योजनाये ट्रैफिक सिगनल पर कटोरा पकड़ा रही है???

21 टिप्‍पणियां:

  1. गंभीर विषय।
    आशुतोष जी भीख मांगते बच्‍चे हर जगह देखे जा सकते हैं और कई जगहों पर तो मां बाप ही बच्‍चों का इस तरह उपयोग करते हैं।
    कई बार यह देखने में आता है कि कोई औरत किसी नवजात बच्‍चे को लेकर भीख मांगने निकलती है ताकि उस पर तरस खाकर कोई भीख दे दे।
    बच्‍चे और महिलाओं की बात छोडिए अच्‍छे खासे हटटे कटटे लोग भी भीख मांगते हैं। जब उनसे काम करने कहो तो बगले झांकने लगते हैं।
    खैर मैं आपके विषय से भटक रहा हूं। आपने सच कहा, ये बच्‍चे बडे होकर अपराध में लिप्‍त हो जाते हैं।
    पर क्‍या पूरा दोष सरकार पर देना ठीक है।
    और जहां तक अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव की बात है, ये भी क्‍या कर सकते हैं।

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  2. बहुत ही सार्थक और वास्तविकता दर्शाती पोस्ट आपके इस ब्लॉग पर आकार बहुत अच्छा लगा. और बहु बहुत सुभकामनाएँ. में भी इस ब्लॉग से जुडना चाहता हू. मैंने देखा है की आप हमेशा देश की वास्तविक समस्याओ पर लोंगो का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते है. और इसी कड़ी में आपने एक और नाम जोड़ा है. आप कुछ ब्लॉग एग्रीग्रेटर पर भी इस ब्लॉग का पंजीयन कराएँ ताकि और लोग भी इस ब्लॉग से जुड सकें.

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति, आप एक अच्छे साहित्यकार ही नहीं बल्कि समाज के अच्छे चिन्तक भी हैं. बहुत ही गंभीर विषय उठाया आपने. करोडो रूपये पानी की तरह बहाने के बावजूद बचपन यूँ ही सडको पर भीख मांगता है.

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  4. आपने एक दम सही लिखा है ..जहाँ तक प्रश्न की बात है तो इन से अब उमीद नहीं रही है ....अब व्यवस्था को आम आदमी को ही बदलनी होगी ,चाहे हमें कुछ भी करना पड़े लेकिन सताओ से अब विश्वास उठ चूका है ..अब तो इनसे सिहासन खाली करवाने की बारी आ चुकी है ...क्यों की ये सब स्वर्थी व् आपने हित को ध्यान में रखते हैं और देश हित इनके कार्य में कहीं भी शामिल नहीं होता है .....

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  5. एक अच्छा ही नहीं बहुत ही अच्छा और सार्थक लेख आपने पेश किया है की आज इस देश के बच्चे कल इस देश के कर्णधार बनेंगे परन्तु वह हमारे इस तंत्र में कहीं किसी अभाव के कारण भटक रहे हैं जो कल को बजाए अच्छाई की तरफ ले जाने वाले इस देश को कहीं गर्त में ले जायेंगे....

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  6. जो 'मैंने' जाना, उसके अनुसार मान्यता है कि सृष्टि की रचना आरम्भ हुई ब्रह्मनाद (ॐ)/ 'बिग बैंग' से... और सृष्टि के पहले क्या था ? प्रभु यानी निराकार मौनी बाबा !!!

    और, 'हिन्दू मान्यतानुसार' काल-चक्र उल्टा चल रहा है, अर्थात जैसे सागर-मंथन की कथा दर्शाती है, उत्पत्ति तो धरा से शिखर तक, 'सतयुग' की चरम सीमा तक, उसके प्रतिबिम्ब समान 'सागर-माथा' यानि ऐवेरेस्ट शिखर पर झंडा गाढ़ने समान थी,,, किन्तु हम पृथ्वी पर आधारित प्राणियों को जो 'प्रभु की माया' के कारण दीखता प्रतीत होता है वो शिखर से धरातल पर उतरने समान है, यानि उच्चतम से निम्नतम स्तर पर पहुँचने तक - 'स्वतंत्र भारत' में जवाहर लाल से 'मौनमोहन' तक... प्रकृति का संकेत देख पा रहे हैं न ?! :)

    जरा सोचिये कि यदि कोई सर्वगुण संपन्न जीव अपने को इस अनंत ब्रह्माण्ड में अकेला ही विद्यमान जाने (जैसे उसके प्रतिबिम्ब समान भीड़ में भी हर व्यक्ति अपने को अकेला ही पाता है), तो उस बेचारे का क्या हाल होगा?

    क्या वो अपने स्रोत को, यानि अपनी 'माँ' को, जानना नहीं चाहेगा? और अपने को निरंतर असफल नहीं पायेगा?

    और, सर्वगुण संपन्न तो वो है ही, उसके लिए कुछ भी संभव है,,, फिर जैसे उनके प्रतिबिम्ब मनोरंजन अथवा ज्ञान वर्धन हेतु फिल्म देखते प्रतीत होते हैं अथवा टीवी / कंप्यूटर आदि, और तो और निद्रा में स्वप्न भी! तो क्या वो भी फिल्म समान अपने विचारों को अपनी ही आँख में, उसके अंदर ही, मन के भीतर कह लो, अनंत साकार प्रतीत होते प्रतिबिम्ब के माध्यम से वो खोज रहा नहीं हो सकता है अपनी माँ को?!!! जिसका प्रतिबिम्ब पार्वती द्वारा अमृत शिव के संहारकर्ता होने के कारण 'गणेश' को 'अपने शरीर के मैल ही से' पुतला बनाये जाने द्वारा दर्शाया जाता है, और उसी प्रकार जीसस के पवित्र मैरी के पुत्र होने को उन्हें 'भगवान् का पुत्र' माना जाना :)

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  7. अगर यूनिसेफ के आंकड़ों की माने तो पूरे भारत में लगभग १८० लाख बच्चे सडको के किनारे रहते हैं जबकि पूरे विश्व में ये संख्या लगभग ४४० लाख है..इनमें से यदि २०% बच्चे भी भीख मांगते हैं तो भारत में प्रतिदिन ३६ लाख कर्णधार ट्रैफिक सिगनल पर कटोरा लिए होते हैं..

    ye sthiti hamare desh ke liye bahut hikhternaak hai .hamara (Desh)bahvisya kal inhike kandehe per nirbher karega..........sarthak aur tarkik vislesan ke liye aabhar...
    bahut hi jwalant mudda uthaya hai aapne............ek baar aur aapka aabhar pradan kerne ka man ho raha hai is behtreen prastuti ke liye ......

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  8. हमें एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिससे की हम सभी बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था कर सकें बिना किसी भेदभाव के

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  9. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,आपके इस ब्लॉग पर आकार बहुत अच्छा लगा।

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  10. Aap ne bahut accha lekh likha hai sir ji ,yahi bacche aage chal ker crime me bhagidari kerte hai such me ye yek gambheer samasya hai

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  11. संभवतः आप को स्वामी रामदेव की भारत निर्माण की योजना के बारे में नहीं पता है अन्यथा आप ऐसा आरोप नहीं लगाते | स्वामी रामदेव जी ने शुरुआती तौर पर ६५० गावों का चयन किया है जहां पर हर व्यक्ति को चाहे गरीब हो या अमीर मुफ्त योग सिखा कर व्यसन मुक्त और स्वस्थ बना कर उनके जीवन को उठाने का प्रयास शुरू कर दिया है | आपने जिस समस्या पर ध्यान दिलाया है उसका मूल और सबसे बड़ा कारण है गांव से गरीबो का रोज़गार के अभाव में शहरो की ओर पलायन | इस समस्या से निपटने के लिए स्वामी रामदेव जी ने जिन गावों का चयन किया है वहां अगले चरण में शून्य तकनीकी से बनने वाली वस्तुओ जैसे दूध से बनने वाली डेरी की वस्तुए, साबुन, शम्पू और अन्य ऐसी वस्तुए जैसे की आम का रस और चिप्स आदि को बनाने की तकनीक और उसे शहरो में सप्लाई कर ने का तरीका सिखाया जाएगा | इस प्रकार से जिन वस्तुओ का उत्पादन कर के ये बड़ी कंपनिया शहरो से गांव ले जा रही है उन्हें ही गावों में उत्पादित कर शहरो तक पहुंचाया जाएगा ताकि शहरीकरण पर रोक लगे और लोगो को गांव में ही रोज़गार मिले | शुरुआती चरण में ऐसा देखा गया है की ऐसे कुटीर उद्योग लगा कर गांव के लोगो की आय को ४०० रु. प्रतिमाह से बढ़ा कर ४०००० रु. प्रतिमाह करने में बहुत सफलता मिली है | सच तो ये है की जिन योजनाओ को सरकार को लागू कर शहरीकरण को रकना चाहिए था उन्हें स्वामी रामदेव जी कर रहे है |

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  12. आपने समस्या की ओर ध्यान दिलाया है लेकिन कहीं तो ग़रीबी की वजह से मांग कर खा रहे हैं और कहीं यह बाक़ायदा एक पेशा बन चुका है और इसके माफ़िया तक भी हैं और कहीं यह धर्म के अनिवार्य कर्तव्य का रूप ही बता दिया गया और धार्मिक शिक्षा के साथ बच्चों को मांग कर खाने की ट्रेनिंग दी जाती रही है। जो लोग ख़ुद मांग कर खाते हों वे दूसरों को मेहनत का उपदेश क्या देंगे ?
    और अगर देंगे तो ऐसे उपदेश प्रभावित ही न कर पाएंगे !
    इस विषय में आप मेरा यह लेख देख सकते हैं
    हे भिक्षुक ! सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था भिक्षा मांगने से रोकती है
    कमेंट का फ़ॉन्ट छोटा है सबके पढ़ने में नहीं आ रहा है।

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  13. आशुतोष भाई आपने दुखती रग को पकड़ लिया है| यह पीड़ा बहुत सताती है शुरूआती दिनों में ऐसा होता था तो समझ में भी आता था| किन्तु आज़ादी के ६४ वर्षों के बाद भी समस्या बरकरार है, बल्कि पहले से भी अधिक है तो पीड़ा होना स्वाभाविक ही है|
    आपका मेल मिला...बहुत अच्छा लगा| आपसे शीध्र ही फोन पर बात करूँगा|
    एक बात और, ये अनवर जमाल यहाँ भी टपक पड़ा? इसे उत्तर देना मुझे खूब आता है किन्तु इसकी समझ में कुछ नहीं आता| क्या यह इसी प्रकार यहाँ भी हिन्दू धर्म का अपमान करेगा?

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  14. आशुतोष भाई बहुत सुन्दर और सार्थक लेख गंभीर विषय हमारा भारत इस से जकड़ा हुआ है न जाने कब इस से मुक्ति मिलेगी यदि लचर कोई भीख मांगता दिखे तो बात कुछ दिल में समाती है मगर ताकतवर लोग समर्थ लोग लिप्त हैं बच्चे को मार मार भेजते हैं जबरन भी -कुछ का ये व्यवसाय बन गया है अपराध में लिप्त भी बहुत से ये भी सच है लेकिन ये सब का दायित्व बनता है उचित सोच कर सब करें केवल सरकार और कोई क्या क्या करे ??
    आभार आप का
    शुक्ल भ्रमर ५

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  15. आशुतोष भाई
    बहुत ही गंभीर विषय पर
    अच्छा और सार्थक लेख आपने पेश किया है

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  16. मुझे तो यही समझ में नहीं आता कि भीख देते ही क्यूँ हो?

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  17. हमारी संस्कृति में दान का विशेष महत्त्व रहा है

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