सोमवार, 11 जुलाई 2011

अन्‍ना और बाबा.... बोलने से पहले सोचो तो.....

शोहरत इंसान को किस कदर बडबोला बना देती है, इसका उदाहरण हैं अभी हाल ही में मीडिया के माध्‍यम से हीरो बना दिए गए दो सज्‍जन। एक हैं गरीब अन्‍ना हजारे तो दूसरे हैं अमीर बाबा रामदेव। साधनहीन अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार के मुददे पर किए आंदोलन ने देश को रातों रात एक ‘मसीहा’ दे दिया। मीडिया ने बरसों से खामोशी से इसी मुददे को लेकर काम कर रहे समाजसेवी अन्‍ना हजारे को अचानक बुलंदियों पर पहुंचा दिया। दूसरी ओर काले धन के मुददे को लेकर आंदोलन करने और फिर आंदोलन स्‍थल से महिला भेष में भागने की कोशिश करते धरे जाने वाले बाबा रामदेव।

माफ कीजिए, मैं अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव का समर्थक नहीं हूं। मैं इन दोनों का विरोधी भी नहीं हूं। इन दोनों ने देश के ज्‍वलंत मुददों पर बात की है और अन्‍ना हजारे के आंदोलन ने तो एक बार फिर से सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोकपाल बिल अन्‍ना हजारे के दबाव के कारण शायद जल्‍द ही पेश भी हो जाए।
बाबा रामदेव की बात करें तो विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के मुददे को लेकर बाबा ने लंबे समय से अनशन की रूपरेखा तय की लेकिन अफसोस जितने दिनों तक उनकी रूपरेखा बनी उतने घंटे भी वे अनशन पर नहीं रह पाए।
मैंने बात की बडपोलेपन की। तो मैं यह कह‍ना चाहता हूं कि अन्‍ना ने दो दिन पहले जो बात की है वो अपने आप में गैर जिम्‍मेदाराना बात है और यह देश की आजादी का अपमान ही है। माना कि अन्‍ना की बात इस समय पूरा देश सुन रहा है, लोग भ्रष्‍टाचार के खात्‍मे को लेकर अन्‍ना से उम्‍मीदें लगाए हुए हैं लेकिन इसका यह‍ मतलब नहीं कि अन्‍ना जो भी बोलें वो सही हो और सब उसे मानें। अन्‍ना ने इस बार गलत बात कर दी। अन्‍ना का कहना है कि यदि मानसून सत्र में लोकपाल बिल पेश नहीं हुआ तो वो 16 अगस्‍त से एक बार फिर अनशन पर बैठ जाएंगे। चलो यहां तक ठीक है लेकिन यह क्‍या। वे कहते हैं कि 15 अगस्‍त को रात को आठ बजे से नौ बजे तक लोग घरों की बिजली बंद करें। उनका तर्क है कि ऐसा कर लोग भ्रष्‍टाचार के खिलाफ के मुहिम को समर्थन दें। ये क्‍या बात हुई।

महोदय, 15 अगस्‍त को देश आजाद हुआ था। कई लोगों की शहादत के बाद अंग्रेजों को देश को छोडने मजबूर होना पडा था। राष्‍ट्रीय पर्व है यह। दीवाली किसी एक धर्म का त्‍यौहार है। ईद किसी एक धर्म का। क्रिसमस किसी एक धर्म का और बैसाखी किसी एक धर्म का, लेकिन पूरे देश का कोई त्‍यौहार है तो वो है 15 अगस्‍त। स्‍वतंत्रता दिवस। इस दिन देश आजाद हुआ था। यह शोक मनाने का दिन नहीं, खुशियां मनाने का दिन है। मैं नक्‍सल इलाके में रहता हूं। इस दिन को नक्‍सली काला दिन मनाते हैं। हमारी शान के प्रतीक तिरंगे के बजाय नक्‍सली काले झंडे को फहराते हैं। वो ऐसा इसलिए करते हैं क्‍योंकि वो देश के संविधान को नहीं मानते। वो मानते हैं कि देश में सच्‍ची आजादी नहीं आई..... मौजूदा आजादी बेकार है..... वे संविधान विरोधी हैं, देश विरोधी हैं यह बात तय है..... पर अन्‍ना। उनसे ऐसी उम्‍मीद नहीं थी।

अब बात बाबा रामदेव की। बाबा ने अनशन किया। पुलिस ने उनके अनशन को दमन कर तुडवा‍ दिया। बाबा आंदोलन स्‍थल से महिला भेष में भागने की कोशिश में धरे गए। खैर, कोई बात नहीं। बाबा की कोई मजबूरी रही होगी। पर यह क्‍या जब बाबा ने चुप्‍पी तोडी तो अपने भागने पर ही पहली बात की। उनके मुताबिक वे इसलिए भागे कि वो गीदड की मौत नहीं मरना चाहते थे। इस देश में अंग्रेजों के खिलाफ भी कई लडाईयां लडी गई थीं और उसमें हमारे से‍नानियों ने डटकर मुकाबला किया। कोई भागा नहीं, तो क्‍या बाबा की नजर में वो सब गीदड थे। बाबा ने एक और बात की, मेरे लिए भ्रष्‍टाचार से बडा मुददा कांग्रेस पार्टी को हटाना है। ये क्‍या बात हुई बाबा।

बाबा और अन्‍ना के समर्थक माफ करें पर जहां तक मुझे लगता है कि इन दोनों को मिले शोहरत ने उन्‍हें बडबोला बना दिया है और ये दोनों यह सोच रहे हैं कि वे जो कहेंगे सब सही है। माफ करना बाबा रामदेव पर आपने भागकर अपने किस ‘’शौय’’ का परिचय दिया यह मैं नहीं जानता पर देश की आजादी के लिए प्राण न्‍यौछावर करने वाले भारत मां के सच्‍चे सपूत गीदड नहीं ‘’शेर’’ थे और माफ करना अन्‍ना हजारे 15 अगस्‍त को आजादी का जश्‍न आतिशबाजियों के साथ रौशनी कर मनाया जाना चाहिए, यह कोई शोक का दिन नहीं कि अंधेरा किया जाए

30 टिप्‍पणियां:

  1. अतुल जी..आप यही नहीं स्पस्ट कर पाए की लेख में आप को समस्या किससे है ..बत्ती बुझाने से..या बाबा के भागने से..

    बलिदान देना पुनीत कार्य है मगर नरभक्षी का चारा बनना मुर्खता..ये बात पूरी प्रमाणिकता और जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ की सीमा पर लड़ता हुआ प्रहरी भी कभी कभी अपनी जान को बेजा गवाने की बजाय छिपना पसंद करता है...क्या हम उन वीरों को कायर कह दें...

    आर्मी कैंप में मुझे शरीर पर पत्ते लगा के और मुह को ग्रीस से काला करके अम्बुश की ट्रेनिंग दी गयी थी ऐसे ही और जवानों की भी होती होगी तो क्या उसका तात्पर्य ये है की उन्होंने दुश्मन के डर से मुह काला कर लिया?????
    वो एक रणनीति के तहत अपनी जान बचाने का प्रयत्न होता है ताकि जंग जीती जा सके ..वही बाबा ने किया..
    बाबा ने मुर्खता से बचने हेतु ये कृत्य किया..और बाबा के साथ ५० हजार और भी थे उन्होंने कुछ प्रश्न नहीं उठाये..हम और आप बिना कुछ किये सिर्फ प्रश्न उठा रहें हैं..
    आप का १५ अगस्त वाला मुद्दा सार्थक है...मैं बत्तियां जलाऊंगा...
    क्यकी मर कर और अँधेरा कर के विजय नहीं मिलती

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  2. अतुल जी ,
    आपके लेख बिलकुल भी तर्क संगत नहीं है सब आपने बकबास लिखा है मुझे तो शर्म आ रही है आपकी कलम पर. आपने बच्चो की तरह लिखा है आपकी क्या उम्र है और आप किस आधार पर ये सब लिख रहे है ?

    रही भाई आजादी की इसको कोए शक नहीं की हमारे देश में १९४७ को गोरे अंग्रेजो से तो आजादी मिल गयी लेकिन काले अंग्रेजो से नहीं जो दिखने में तो हिन्दुस्तानी थे लेकिन वो अन्दर से बिलकुल अंग्रेजो की संतान थे.
    क्या आप मुझे बता सकते है की हमारे आजादी के लिए प्राण न्योक्षावर करने वालो में जेसे कुछ भगत सिंह ,राजगुरु,सुखदेव,बल गंगाधर तिलक, लाजपत राय ,चंद्रशेखर ,शुभाष चन्द्र बोसे और फिर महातम गाँधी जेसे लोगो का भारत के बारे में क्या सपना था? वो लोग आजादी के पहले क्या सोचते थे की आजादी मिलाने के बाद हमारा देश केसा होगा क्या कभी अपनी इन बीरो की अताम्कथा पड़ी है ?

    नहीं अगर पड़ी होती तो आप ऐसे बाते नहीं करते ..........क्या आपको लगता है देश में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों की आजादी आ गयी ?

    रही बात कांग्रेस की : ये कांग्रेस बापू जी ,तिलक,सुभास जेसे लोगो की नहीं है ये कांग्रेस तो नेहरू की है जिसने भारत के उस सब क्रांतिकारियों के साथ धोखा किया है जिन्होंने उन पर भरोषा किया , अगर आपको जानना है तो पदिये "सत्ता का हस्तांतरण" (The Transfer of agreement).
    आज़ादी के बाद नेहरू के बाद की कांग्रेस ने हमेशा देश को लूटने ,तोड़ने का काम किया है देश में साम्प्रदायिकता फेलाई है मुस्लिमो को वोते बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है आज देश का मुस्लिम इसलिए पीछे है वो कांग्रेस के शाजिस का शिकार हुआ है कांग्रेस का सिंपल फंदा मुस्लिमो से वोट लो और उनका विकास मत करो क्युकी उनका विकास हो जायेगा तो वो फिर समझदार हो जायेंगे और वोट देना बंद कर देंगे और रही बात हिन्दुओ की वो तो पहले से है बाते है क्षेत्रीय राजनीती में .

    क्या आप यकीन करते है की जो पार्टी देश में करीब करीब ५० साल तक राज़ करे फिर भी देश बिकास नाभि कर सका ...........आप ये बताये देश में कांग्रेस की सरकार ने क्या उपलब्धि हासिल की है अभी तक?
    अगर आज भारत ने जो भी उपलब्धि हासिल की है तो वो गैर्कांग्रेस्सी सरकार के समय में की है( माफ़ी कीजियेगा में किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं करता लेकिन सत्य को सामने रख रहा हु ) अगर आज देश ने परमाणु संम्पन्नता हासिल की है तो वो भी अटल बिहारी बज्पेये के बदोलत , इंदिरा ने तो इस कार्यकर्म को १५ साल पहले ही रोक दिया अन्यथा हम १५ पहले ही परमाणु प्राप्त कर चुके होते.

    अंत में मेरी आपसे गुजारिस है की आपको अपना लेख लिखने से पहले काफी अध्यान ,चिंतन,मनन करने की जरूरत है अन्यथा लोगो को भ्रमित न करे.

    धन्यवाद.
    कोमल पाण्डेय
    भारत

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  3. @ कोमल जी, आपने बात जैसी भी कही है बेनामी बनकर कही है । अगर आप अपने नाम से कहते तो मंच की गरिमा बढ़ती । मंच प्रहरियों को बेनामी के ऑप्शन की सार्थकता पर विचार करना चाहिए ।

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  4. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. अनवर जी बेनामी कोमल पाण्डेय का हो सकता है प्रोफाइल न हो सिर्फ ईमेल से लिखते हों ..अगर छुपाना होता तो नाम भी क्यों देते???
    दुसरे बेनामी जी: लेख लिखना अलग है,जरा देखें बाबा के समर्थन में कितने लोग आये हैं...और मुद्दा बाबा नहीं है मुद्दा अन्ना का १५ अगस्त को मोमबत्ती बुझाना है...किसने कहा ये बाबा विरोधी मंच है..ये सबका मंच है..जरा मुह छुपाना छोड़ सामने आइये..
    दिवस भाई: सबके अपने विचार हैं...हमें इसी विचार को अपने तथ्यों एवं तर्कों से बदलना है..पत्थर उसी पर फेके जाते हैं जिस पेड़ पर फल होते हैं..

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  6. बेनामी जी कांग्रेस और भाजपा।
    क्‍या दुनिया में यही दो चीजे हैं।
    आपकी बात को मैं गंभीरता से लेता यदि आप अपनी बात बगैर किसी को गाली दिए करते, आपकी बात से लग रहा है कि आप कांग्रेस से खार खाए हैं और मुझे न किसी पार्टी के पिटठू से बात करनी ना किसी पार्टी को लेकर अपने गले तक गुस्‍सा रखने वाले से बात करनी। मेरा छोडिए आप खुद को देखिए। मैंने किस आधार पर लिखा है यह मेरा लिखा पढने पर ही समझ आ जाएगा पर यदि आपको नहीं समझ आया तो मैं क्‍या कर सकता हूं इस पर।

    और दिवस जी आपकी तुलना की बात पर मैं पहले भी कह चुका हूं कि मुझे आपकी सोच पर तरस आता है, कि आप क्‍या तुलना कर रहे हैं। मुझे आप से कुछ नहीं कहना।
    हां इतना जरूर कहूंगा कि यह लेख मैंने यहां प्रकाशित नहीं किया, इस मंच का आमंत्रण मिलने पर मैंने ड्राफट में इसे डाला था, इसे चलाने वालों को लगा कि इसे प्रकाशित करना चाहिए सो उन्‍होंने किया।

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  7. अतुल पहले तो आप इस बात का प्रमाण दिजिय की स्वामी रामदेव ने कब व् किस जगह कहा की भ्रष्टाचार से पहले मैं कांग्रेश को खतम करना चाहता हूँ ....और ये बात आपने केवल समाचार पत्रों में पढकर लिखी है तो आपकी सबसे बड़ी भूल है ...एक सलाह आपको यह भी है की यहाँ बात व्यवस्था परिवर्तन की हो रही है न की किसी व्यक्ति विशेष की आपका यह लेख समाज में कोई महत्व नहीं रखता है ..और बात आजादी की है तो इतना ही कहना चाहूँगा की 15 अगस्त 1947 को केवल मात्र चेहरे बदले थे चरित्र नहीं ...अगर आजादी मिल जाती आज देश के ये हालात नहीं होते |.....और आपको खुद को भी ये सलाह है आप भी लिखने से पहले सोचें

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  8. जब किसी सामुदायिक मंच की शुरुआत की जाती है तो उसके कुछ नियम और कानून बनाये जाते हैं. यह नियम मंच का संस्थापक ही बनाता है, और वह सभी की भावनाओ को ध्यान में रखकर मंच की स्थापना करता है. निजी रूप से वह कोई भी विचारधारा रखता हो, पर मंच स्थापना के समय उसे जो उपयुक्त लगता है उसी के अनुसार श्री गणेश करता है. मंच से जुड़ने वालो लेखको का दायित्व बनता है की वे पहले नियम देखे कि किस उद्येश्य के तहत मंच स्थापित हुआ है. और जब वह मंच से जुड़ जाय तो उन नियमो का पालन करना अनिवार्य हो जाता है. एक मंच संचालक किस प्रकार अपने दायित्वों का निर्वहन करता है, उसका अनुभव मैं भलीभाती कर चुका हूँ. जब विकट परिस्तिथियाँ पैदा होती है तो उसे संभालना उसका दायित्व होता है. .. मंच से जुड़ा लेखक भले ही मंच की गरिमा का ख्याल न रखे पर संचालक को रखना पड़ता है. नियम भंग करने पर किसी को बाहर निकलने के समय अपार पीड़ा होती है हर्ष नहीं.
    इस मंच की स्थापना एक अच्छे उद्द्येश्य के तहत हुयी है. बाबा या अन्ना पर या फिर किसी राजनितिक दल पर अंगुली उठा देने से समस्या या व्यवस्था का सुधार नहीं होगा. जो विषय इस मंच के द्वारा चुना गया है, निश्चित रूप से वह एक सार्थक कदम है. इस मुद्दे को लेकर यदि लेखक गंभीर हो तो निश्चित रूप से एक दिन मंच अभूतपूर्व सफलता के शिखर पर होगा. शुरुवाती दौर में इस तरह के विवाद उचित नहीं है. अतुल जी एक अच्छे पत्रकार हैं, फिर भी हमें लगता है की उन्होंने मंच के नियम नहीं पढ़े. मंच से जुड़े सभी लेखक पहले नियमो को पढ़ ले, उसके पश्चात् कोई पोस्ट करे.
    @ यदि अतुल जी का यह कहना सही है की उन्होंने पोस्ट प्रकाशित नहीं की है बल्कि ड्राफ्ट में रख दिया था तो मंच संचालक व संपादक के विवेक पर हमें तरस आता है. व्यक्तिगत आक्षेप लगाने वाली इस रचना को प्रकाशित नहीं करना चाहिए था. क्योंकि उन्होंने नियम खुद बनाये है.
    @ जब कोई भी लेखक टिपण्णी करता है तो उसे यह ख्याल रखना होगा की वह असभ्य शब्दों का प्रयोग हरगिज न करे. मर्यादित भाषा में भी हर बात कही जा सकती है. हालाँकि इस मंच से जो लोग आत्मिक रूप से नहीं जुड़े हैं. वे मंच की गरिमा से खिलवाड़ कर सकते हैं,मंच को बदनाम करने के लिए यह कुचक्र रचा जा सकता है. लिहाजा मंच से जुड़े लोग आत्मिक रूप से योगदान दे. ताकि आने वाले समय में यह मंच एक विशिष्ट पहचान बनाये.
    @ मैं एक सलाह देना चाहूँगा जिसे लागू karke विवादों से बचा जा सकता है. लेखक अपनी पोस्ट लिखने के पश्चात् ड्राफ्ट में रख दे और संपादक महोदय उसकी अशुद्धियाँ {यदि हो तो} उसे दूर कर प्रकाशन करे.. आप सभी को शुभकामना .....

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  9. मेरे कुछ विचार हैं इस विवाद में कृपया धयान दें आप लोग..
    १ लेखक ने पहले ही इस पोस्ट में स्पष्ट किया है की " मैं बाबा या अन्ना का समर्थक नहीं हूँ" तो एक व्यक्ति की शंका जो भी थी बाबा या अन्ना के लिए उसने लेख में लिखा..अब हमारा क्या कर्तव्य होता है..लेखक का विरोध या शंका का समाधान???
    २ लेखक ने ये भी लिखा है की "बाबा ने अनशन किया। पुलिस ने उनके अनशन को दमन कर तुडवा‍ दिया। " इस बात पर आप सभी को गौर करना चाहिए..
    ३ अगर चंद समान विचारधारा के लोग मंच पर प्रलाप कर लें तो क्या सुव्यवस्था मानी जाएगी????सुव्यवस्था के दायरे में आता है भटकी हुए विचारधारा(जो कोई भी हो) को सही पथप्रदर्शन करना..जैसे बाबा रामदेव जी के अनुसार योग का मतलब सिर्फ अनुलोम विलोम न हो के सम्पूर्ण सामाजिक विकास होता है..
    ४ लेखक का प्रश्न उचित है की क्या १५ अगस्त को अँधेरा कर ले हम अन्ना जी के कहने पर..मतलब इस लोकतंत्र का विरोध ..फिर किस मुह से इसी लोकतंत्र के नुमाइंदो से आप समर्थन लेने जाते हैं..बाबा रामदेव जी ने भी कहा है की संविधान के सम्मान करते हुए ही कोई आन्दोलन आगे बढ़ाना है..
    ५ @ हरीश जी: आप वरिष्ठ पत्रकार एवं मंच के सम्मानित सहयोगी है..मंच के एक दुसरे पदाधिकारी(संपादक) के विवेक पर तरस खाने की बाद आप व्यक्तिगत रूप से भी ईमेल कर के बता सकते थे..क्या ऐसा सन्देश नहीं जायेगा की मंच में अंतर्विरोध है..

    ५ मंच को बदनाम करने के लिए यह कुचक्र रचा जा सकता है: हमें मालूम है ये प्रथम दिवस से रचा जा रहा है...मगर मुझे लगता है मंच के सहयोगी खुद ही प्रबुद्ध है..

    आप सभी के अमूल्य मार्गदर्शन का आभार

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  10. मैं मंच, लेखक एवं पाठकगणों से कहना चाहता हूँ कि मैं मंच को बदनाम करने का कोई कुचक्र नहीं रच रहा| जितना आपको इस मंच से लगाव है उतना मुझे भी है| मिलकियत भले ही किसी की भी हो किन्तु इसे मैंने भी अपना माना है| इसके शुरू होने से पहले से ही इसकी प्रतीक्षा में था|
    आशुतोष भाई एवं अंकित भाई आप यह भली भाँती जानते होंगे|
    हरीश जी यदि आपको मेरी तीखी भाषा से कोई आपत्ति हो तो क्षमा चाहूँगा| जब विषय से हटकर चर्चा छिड़ती देखि तो स्वयं को रोक नहीं सका| भविष्य में इसका ध्यान रहेगा| इस मंच के सफल भविष्य के लिए मुझसे जितना योगदान हो सकेगा, मैं वह करने के लिए वचनबद्ध हूँ|
    यदि मुझे मंच से कोई बैर होता तो इसके लिए इतनी चर्चा किसी से नहीं करता| अंकित भाई, आशुतोष भाई, संजय भाई एवं तरुण भाई इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं| सबसे अधिक इनके संपर्क में ही रहा|

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  11. अत; मुझ पर लगे आरोपों को मैं अस्वीकार करता हूँ| पता नहीं क्यों आपने कहा कि "हमें मालूम है, ये प्रथम दिवस से रचा जा रहा है|" क्या आपको मेरे विषय में कोई संशय है?

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  12. यदि , आपने ध्यान दिया है तो मैंने कहा की यदि अतुल जी का कथन सही है. तो................ बिना सोचे समझे किसी पोस्ट को प्रकाशित कर देना कत्तई उचित नहीं है. अतुल जी की बात का जवाब देना था लिहाजा मैंने दिया. यदि आपकी भावनाओ को मेरी बातो से ठेस पहुंची है तो बिना झिझक मैं क्षमा चाहूँगा, और देवेश जी मेरा अभिप्राय आपसे एक प्रतिशत भी नहीं था, मैंने एक सामान्य सी बात कही है क्योंकि मैंने अनुभव किया है. ऐसा होता रहा है मुझे हताश करने के लिए गालियाँ तक मिली है. मैं नहीं चाहता की कोई भी प्रतिरोध पैदा करे मंच को आगे बढ़ाने में. फिर आपने मेरी कही गयी बातो को खुद से जोड़ लिया, आपसे निवेदन है की किसी भी बात को इतने शीघ्र दिल पर न लिया करे. आपको जो तकलीफ हुयी उसके लिए मैं माफ़ी चाहूँगा. दुबारा कहूँगा आपसे मेरा अभिप्राय कत्तई नहीं है.
    और संचालक महोदय से यह निवेदन करना चाहूँगा यह नियम बना दे की पोस्ट लेखक नहीं संपादक प्रकाशित करेंगे. यदि समय की उपलब्धता हो तब. विवादित लेख व बातो से हमें परहेज करना होगा. टिपण्णी में अनामी हटा दे. या माडरेशन पर कर दे ताकि विवादित टिप्पणिया भी प्रकाशित न की जा सके. विवाद से दूर रहना ही उचित होगा. मैं हमेशा आप लोंगो के साथ हूँ.

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  13. दिवस जी,
    आप के बिना इस मंच की परिकल्पना असंभव है...मंच को बदनाम करने वाली बात में आप का कहीं से जिक्र नहीं है...हम आप की निष्ठा या समर्पण पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा कर रहें हैं..और ये मंच किसी की मिलकियत नहीं है..इसमें आप का उतना अधिकार है जितना किसी अन्य सहयोगी का..हाँ आप शुरुवात से इस मंच से जुड़े हैं अपना अमूल्य समय एवं विचार दिए हैं इसलिए आप के विचारों एवं सहयोग की ज्यादा जरुरत है..
    मंच को बदनाम करने के लिए यह कुचक्र रचा जा सकता है: हमें मालूम है ये प्रथम दिवस से रचा जा रहा है..:
    इस बात के बारे में आप को व्यक्तिगत ईमेल या फ़ोन से बता दिया जायेगा..मगर इसमें कही से भी आप का नाम नहीं है ये एक बार फिर स्पष्ट करता हूँ..

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  14. माफी के साथ कहना चाहता हूं कि मैंने जो लिखा उसे लिखने के पहले ही मैं जानता था कि कुछ ऐसे भी अंध भक्‍त हैं जिन्‍हें न अन्‍ना हजारे की कोई गलती दिखेगी और न ही बाबा रामदेव की। उनकी आलोचना को सहना ही होगा, लेकिन यह नहीं मालूम था कि इस तरह बदतमीजी से बात की जाती है यहां।
    खुद को बडा पाक दामन बताने वाले दिवस जी ने यहां लिखा कि 'यहाँ हमने कुछ बागड़ बिल्ले भी भर लिए हैं|' उनका इशारा किस ओर रहा होगा, ये वे ही जानते हैं पर मैं अपनी लेखनी के लिए किसी का मोहताज नहीं। शायद वो खुद को लेकर ऐसा कह रहे हों।
    मुझे कांग्रेसी बोली न बोलने की हिदादय देने वाले दिवस जी खुद के भीतर झांकिए..... मैंने न बाबा की बुराई की है न अन्‍ना की बुराई और न ही कांग्रेस की तारीफ। मैंने इन दोनों की ही बातों के संदर्भ में सिर्फ अपने विचार दिए हैं।
    आप मंच से जुडे हुए हैं तो आपको यह मालूम होना चाहिए कि मैंने यह लेख खुद प्रकाशित नहीं किया और यदि नहीं मालूम तो मंच के हितैषी होने की बात न करें।
    हरीश जी मैंने सही कहा है। यह लेख मैंने ड्राफट में ही डाला था। आप इसके संचालकों से पूछ सकते हैं।
    और हां यहां बेनामी के नाम से टिप्‍पणी देने वाले सज्‍जन एक बात याद रखें लेखन उम्र की मोहताज नहीं होती।
    तरूण भारतीय जी आप अपनी सलाह अपने पास ही रखें, मुझे मालूम है कि मुझे क्‍या लिखना चाहिए।
    मंच के संचालकों से मैं क्षमा चाहता हूं कि मैंने कोई गाली नही दी है,, मैंने सिर्फ एक विचार व्‍यक्‍त किए हैं, लेकिन यदि किसी को किसी के विचार से ही इस कदर उबटाई आ जाए तो मंच के ऐसे हितैषियों के रहते मुझे बख्‍श दें।

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  15. इस मंच का गठन "एक आदर्श व्यवस्था क्या हो सकती है " इस विषय पर विचार विमर्श करने के लिए और यदि हम विचार विमर्श करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है की हम पहले से कोई निर्णय ना लेकर बैठ जाय | यह हिंदी चिट्ठा जगत का पहला विषय आधारित मंच है और इस मंच पर वो सभी लेख प्रकाशित किये जा सकते हैं जो की मंच के विषय से सम्बंधित हैं | योगगुरु बाबा रामदेव या समाजसेवी अन्ना हजारे , ये दोनों लोग व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो इनके

    आन्दोलन के बारे में इस मंच पर विचार हो सकता है , यह विचार पुरी तरह से मंच के विषय के अनुकूल है | यद्यपि मै निजी रूप से इस लेख से सहमत नहीं हूँ परन्तु विचार विमर्श में हर किसी को अपने विचार रखने का अधिकार है और सह संपादक होने के कारण मुझे लगा की यह लेख प्रकाशित हो सकता है |

    जो लोग इस लेख से सहमत नहीं हैं वो तार्किक रूप से इस लेख में दिए हुए तर्कों का खंडन कर सकते हैं तह इन आन्दोलनों द्वारा प्रस्तावित व्यवस्था परिवर्तन कैसे उचित है इस पर भी अपने लेख लिख सकते हैं , हम उन लेखों का स्वागत करेंगे | हमें काम से काम इस मंच पर तो आदर्श व्यवस्था का निर्माण कर के दिखाना होगा अगर आप लोग किसी की नीतियों से असहमत हैं और सोचते हैं की वहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है या तो हममे और उनमे में कुछ अंतर होना चाहिए |

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  16. अंकित जी तर्कों से ना... ये कहकर कि आपकी उम्र कितनी है... आपको सलाह कि लिखने से पहले सोचें या फिर बागड बिल्‍ले पाल रखे हैं.... ये कैसी भाषा है...

    अन्‍ना ने अंधेरा करने कहा है स्‍वतंत्रता दिवस को मुझे ये बात नहीं जचीं मैंने अपनी बात की, बाबा रामदेव ने गीदड की मौत से बचने भागने की कोशिश करने की बात की, मुझे नहीं जचीं मैंने लिखा....

    अब यदि इनके भक्‍तों को मेरी बात काटनी है तो तर्क दें पर इस तरह अपमानजनक बातें कर ये क्‍या साबित करना चाहते हैं कि वे ही समझदार हैं..... मेरी बात में कहां से कांग्रेस की भाषा आ गई.....

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  17. @ आदरणीय मंच संचालक जी ! हमारे क़ाबिल दोस्त इं. दिवस दिनेश गौर जी हमसे पूछ रहे हैं कि
    डॉ. जमाल आप लेख पर टिपण्णी कीजिये| कोई किसी भी नाम से टिपण्णी करे, वह स्वतंत्र है| आप कौन होते हैं किसी को बाध्य करने वाले?
    क्या यहां सलाह और सुझाव देना मना है ?
    इस मंच के लिए हम कौन हैं ?
    यह भी उन्हें ज़रा बता दिया जाए और इससे हमें भी पता चल जाएगा कि हमें यहां कुछ बोलने की इजाज़त है या नहीं ?

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  18. अब इस लेख पर मेरे निजी विचार ये हैं की सबसे पहले तो बाबा के भागने के बारे में , मैं उस रात को वहां पर उपस्थित लोगों में से था और मिने स्वयं देखा है की बाबा को तीन तरीकों से मरने की कोशिश हुई थी सबसे पहले तो बाबा को मंच के पीछे से उठा कर ले जाने की कोशिश हुई थी वहां पर उपस्थित जनसमुदाय की जानकारी के बिना , जब इसमें सफलता नहीं मिली तो भीड़ में भगदड़ मचाकर इस बहाने से उनकी हत्या या फिर भीड़ को आक्रोशित करके गोलियां चलने का बहाना बना कर गोलियों से बाबा की हत्या का प्रयास किया गया था | बाबा की और सत्याग्रहियों के धैर्य के कारण सभी प्रयास विफल हो गए तो बाबा के सामने आने से पहले ही मीडिया , फेसबुक और ब्लॉगर पर बाबा को कायर, भगोड़ा और अपबे अनुयाइयों को संकट में छोड़ कर जाने वाला कहा जाने लगा था और यह अनर्गल प्रलाप अभी तक जारी है इस स्थिति में बाबा द्वारा यह स्पस्ट किया जाना आवश्यक था की वो वहां से क्यों भागे थे , हर दुष्प्रचार का उत्तर दिया जाना चाहिए क्यों की मौन को आरोपों की स्वीकृति माना जा सकता था |

    दूसरी बात ये की भले ही 15 अगस्त को अन्दर करना उचित ना हो परन्तु यदि यह स्वतंत्रता वास्तविक और पूर्ण होती तो इन आन्दोलनों की आवश्यकता ही ना पड़ती |

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  19. अनवर जमाल जी आप के सुझावों का स्वागत है परन्तु हमें नहीं लगता है की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी भी स्तर पर बाधित किया जाना चाहिए , यदि कोई ऐसी टिप्पणी देता है जो मर्यादा या शुचिता का उल्लंघन करती है तो उसे हम हटा सकते हैं परन्तु यदि कोई अपनी पहचान छिपाकर कोई तार्किक बात कहना चाहता है तो उसे ऐसा करने की अनुमति मिलनी चाहिए |

    हम भविष्य में भी आप के सुझावों और मार्गदर्शन के आकांक्षी हैं |

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  20. आप सभी की राय का स्वागत है..संचालक मंडल समेत इस ब्लॉग पर आने वाले हर व्यक्ति के विचारों का स्वागत है..
    कृपया इस मुद्दे को अब ख़त्म माना जाये ..मेरी सभी सम्मानित जनों से अनुरोध है की अब कोई प्रतिटिपण्णी न दे ..

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  21. बहस की सीमा
    जो बहस चल रही है उसमें कोई यह नहीं समझ रहा है कि सत्ता ने, दो दशकों में नवउदारवाद विरोधी जितनी भी सच्ची ताकत किसी न किसी रूप में जुटी थी, उसे उसी के अखाड़े में कड़ी पटखनी दे दी है। दयनीय हालत यह है कि गतिरोध के शिकार कई महत्वपूर्ण जनांदोलन और वैकल्पिक राजनीति के दावेदार हजारे की गाड़ी में सवार होकर गति पाने का भ्रम पाले हुए हैं। वे यह भी नहीं देख पा रहे हैं कि जिन भ्रष्ट और दुष्प्रचारी तत्वों से हजारे के अभियान को बचाने की कोशिश में लगे हैं, हजारे उन्हीं के बुलावे पर यूपी जा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने उन्हें महाराष्ट्र नहीं बुलाया। क्योंकि वहाँ नवउदारवादी विकास ठीक पटरी पर चल रहा है, भले ही वह पिछले दशक का सबसे भ्रष्ट राज्य रहा हो। उन्होंने हजारे को यूपी बुलाया है, ताकि नवउदारवाद की पिछड़ी गति से राज्य को मुक्ति दिलाई जा सके। यूपी में नवउदारवादी गति के पिछड़ने का कारण जानना कठिन नहीं है-जब मुलायम सिंह होते हैं तो उन्हें समाजवाद को नवउदारवादी शीशे में उतारने का और जब मायावती होती हैं तो उन्हें दलितवाद को, वाया ब्राह्मणवाद, नवउदारवाद के शीशे में उतारने का महत्वपूर्ण काम करना होता है। कांग्रेस के पास ऐसा कोई कार्यभार नहीं है। यूपी जीतना सोनिया गांध्ी का सबसे बड़ा सपना है। उसे अगर अमर सिंह पूरा करेंगे तो ईमानदारी के समर्थन और दुष्प्रचार की राजनीति के विरोध की घोषणाओं के बावजूद वे उन्हें 10 जनपथ बुलाएँगी। वे बिल्कुल यह ध्यान नहीं देंगी कि भूषणों पर कीचड़ उछालने वाले अमर सिंह से महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी कितने खफा हैं?

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  22. अतुल भाई क्षमा करें, मैं अपनी टिप्पणी के वे बुरे शब्द (बागड़ बिल्ले) वापस लेता हूँ| मैं अपने इस मंच को दूषित नहीं करना चाहता| मुझसे गलती हुई, इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ| किन्तु टिप्पणी के तर्क वैसे ही हैं| शेष टिप्पणी वैसी ही रहेगी| आप उन तर्कों पर चर्चा कर सकते हैं|

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  23. कृपया इस मंच को तार्किक मुददों के साथ आगे बढ़ाएँ नाकि इस तरह की बेकार बहस करें, अगर किसी पाठक विशेष को किसी लेखक के लेख से कोई आपत्ति हो तो अपनी आपति सम्बंधित लोजिक के साथ दर्ज करे !

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  24. अन्ना हज़ारे, बाबा रामदेव द्वारा प्रायोजित थे, ये बात तो सीधे तौर पर ही दिखाई देती है !
    सोनिया गाँधी सब जानती थी, कि जंतर-मंतर पर क्या हो रहा है, बस वो तो तमाशा देख रही थी...असल खेल तो देश को गाँधी के रंग में रंगना था, जिसमें वो कुछ हद तक सफल भी रही...गाँधी इस देश का न कभी भला कर पाया था और न ही कर पाएगा...आप सभी बुद्दीजीवी वर्ग से अनुरोध है कि गाँधी की धोती को छोड़ें...मानवता की ओर कदम बढ़ाएँ...देश को खुशहाल बनाएँ !
    -सत्येन्द्र मुरली (पत्रकार)

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  25. अरे भाई...सब खेल है!
    सब मिले हुए हैं..एक तरफ़ सोनिया गाँधी व कॉंग्रेस पार्टी,महात्मा गाँधी की "धोती" को संभाले हुए हैं,जो कि पूरे देश को गाँधी के रंग में रंगना चाहते हैं..सभी लोगों पर गाँधी की छाप लगाकर,उन्हें गाँधीवादी बनाने में लगे हुए हैं,ताकि उनकी राजनैतिक-भूमि यथावत बनी रहे!
    दूसरी तरफ़ बाबा रामदेव सोची-समझी रणनीति के तहत राजनीति कर रहे हैं! बाबा रामदेव ने 14 नवंबर 2010 को जंतर-मंतर,दिल्ली में आगाज़ करते हुए कहा था,कि वो इस वर्तमान सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे और ख़ुद क़ाबिज़ हो जाएँगे..अभी हाल ही में अन्ना हज़ारे को सामने करके जो भी "नाटक" रचा गया,वो इसी प्रक्रिया का "दूसरा चरण" था..बाबा रामदेव,अन्ना हज़ारे व उनके साथी-गण राजनैतिक गलियारे में जगह तलाशने में जुटे हैं!
    अब बात हम लोगों के समझ की: पूरे देश को गाँधी तक सीमित कर देना कहाँ तक उचित है?
    भारत में जब गाँधी जी को आज़ादी के नायक (हीरो) के तौर पर लॉंच किया गया,तब क्या यहाँ कोई आज़ादी के लिए नहीं लड़ रहा था..क्या किसी ने अपने लहू की आहुति नहीं दी थी..क्या किसी माँ का बेटा या किसी पत्नी का पति या किन्हीं बच्चों का पिता शहीद नहीं हुआ?अगर इन सबका जबाब "नहीं" है,तो फिर वो "महान" भगत सिंह,सुभाष चंद्र बोस,स्वामी विवेकानंद..आदि-आदि महानुभूतियों ने क्या किया था..क्या वे मिथ्या थे,बचपन से पढ़ी कहानियाँ भ्रामक थीं? अगर ऐसा भी नहीं है,तो फिर गाँधी ही क्यों?
    गाँधी तो एक "संत" था,जो कि "ग़रीब" भारत में "आलीशान-आश्रम" बनाकर रहता था..उनका लाइफ स्टाइल(ज़ीवन ज़ीने का तरीका)भले ही साधारण दिखता हो..मगर ऐसा हरगिज़ नहीं था!
    अहिंसा और हिंसा के अंतर को आज हम और आप भली-भाँति जानते हैं,जब पूरी फिल्म में बेचारे मिथुन चक्रवर्ती की माँ और बहन का बलात्कार किया जाता है,उसके घर-खलियान छीन लिए जातें हैं,उसके पिता की हत्या कर दी जाती है,और तो और फिर उसकी प्रेमिका पर भी जुल्मों-सितम ढाए जाते हैं,तो अंततः वो बेचारा करेगा क्या..इंसाफ़ (न्याय) व हक़ के लिए लड़ाई ही ना! न्याय व हक़ के ख़ातिर ही तो "श्री कृष्ण" "महाभारत" में "पांडवों" का साथ देते हुए असंख्य लोगों के वध का कारण बनें..अब आप लोग इसे न्याय या इंसाफ़ की लड़ाई कहेंगे या हिंसा?
    अगर हिंसा कहते हो जैसा की गाँधी जी भी मानते हैं,फिर तो वो भगवान श्री कृष्ण का "अपमान" ही होगा...वो जो सृष्टि के रचयिता हैं, उन्होनें भी "खाद्य-शृंखला" का विशेष प्रयोजन रखा है, ताकि इस सृष्टि का संतुलन बना रहे..तो क्या इस शृंखला को बनाए रखने में जो भी योगदान दे रहा है, गाँधी जी के अनुसार उन सभी को हिंसक करार देते हुए अपराधी घोषित कर देना चाहिए?
    अगर ऐसा भी नहीं है,तो आप ही बताएँ नक्सलवादी,आतंकवादी कैसे हो सकते हैं?
    वे जो हक़ के लिए लड़ रहे हैं,वे जो अपने वज़ूद को बचाने में जुटे हुए हैं..वे जो हर-पल इंसाफ़ की माँग कर रहे हैं! अब गाँधी जी की माने, तो उन्हें सत्याग्रह-आंदोलन करने चाहिए..भूख-हड़ताल करनी चाहिएँ..उन्हें(गाँधी जी को)कौन जाके बताए,कि वे तो बेचारे कब से भूखे हैं..भूख-ग़रीबी-कुपोषण से दम तोड़ रहे हैं या आत्म-हत्या कर रहे हैं!
    गाँधी जी आपको सब पता है,कि इस देश में पहले राजपूतों ने लठेतों के दम पर भोग-विलास किया,राजशाही ज़ीवन जीया..फिर मुसलमानों ने ये सब छीन लिया..तो उनसे (राजपूतों से) बर्दास्त नहीं हुआ और अँग्रेज़ों के साथ मिल कर देश को गुलाम बना दिया..फिर जब अँग्रेज़ों ने राजपूतों व लठेतों की "खटिया" खड़ी करनी शुरू की, तो इन लोगो ने लड़ाइयाँ की..इन लड़ाइयों में आम-जन जो कि स्वयं इन राजपूतों व लठेतों के द्वारा शोषित था,पीड़ित था..उन्होनें कभी भाग लिया ही नहीं..यह लड़ाई सिर्फ़ एक वर्ग की लड़ाई थी,जिसे "क्रांति" का नाम दिया गया..जबकि क्रांति का मूल तात्पर्य आम-जन तक से जुड़ा होता है!
    फिर गाँधी जी आप आए..आज़ादी के अवतार बनकर..क्या असल मायने में यही आज़ादी है..क्या यही लोकतंत्र है..जहाँ ज़मीनों का कभी बँटवारा हुआ ही नहीं (अधिकांश ज़मीन उन्हीं राजपूतों व लठेतों के पास ही रही),जहाँ सभी को समान अवसर प्राप्त हुए ही नहीं..और सत्ता पर "आप" ही क़ाबिज़ होकर बैठ गये..क्या आज तक देश को चलाने के लिए अन्य लोग उपयुक्त सिद्ध नहीं हुए..क्या गाँधी परिवार के ही सत्ता-धारी बनें रहना राजशाही-परम्परा का धोतक नहीं?
    आप चाहे कितने भी चुनाव करवा लो..जीतेंगे ये ही लोग..अरे भाई..सरकार इनकी..क़ानून इनका..पैसा इनकी जेब में..चाहे जिसको सीधे तौर पर खरीद लें और जो ना बिके,उसे रास्ते से हटवा दें..चाहे जो भी कह लो भैया..गाँधी व गाँधी नाम लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन है! अरे भाई..सब खेल ही तो है!
    -सत्येन्द्र मुरली(पत्रकार)

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  26. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा, आपकी लेखन शैली प्रशंसनीय है. यदि आपको समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आये, यह ब्लॉग योग व हर्बल के माध्यम से जीवन को स्वस्थ रखने के लिए बनाया गया है. हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो समर्थक बनकर हमारा हौसला बढ़ाये.

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  27. आदरणीय सभी विद्वत जनों नमस्कार
    मै इस मंच की सदस्य तो नहीं पर इस पोस्ट को पढ़ कर अपने आप को विचार रखने से नही रोक पाई. लेखक महोदय ने कहीं भी कोई ऐसी बात नहीं कही है जो बहुत अधिक निराशा जनक हो. हर व्यक्ति के अपने विचार हों सकते हैं. या हो सकता है की उसे कोई गलत फहमी हो गयी हो. मैं बाबा रामदेव के आन्दोलन से जुडी हुई हूँ इसलिए जो मै जानती हूँ वह प्रस्तुत करना मेरा कर्त्तव्य है. वास्तव में लेखक महोदय आपने सही कहा की हमारे देश के शहीद भागे नहीं फासी पर चढ़ गए. किन्तु उन नामों में एक नाम सुभाष चन्द्र बॉस का भी है जो देश के अमर शहीद कहलाये तथा उन्होंने हर तरीके से अपने प्राणों की रक्षा की और कभी अंग्रेजो के हाथ नहीं आये. यदि आप पुराने आजादी के समय का इतिहास उठाकर देखे तो इस बात का स्पष्ट पता लग जायेगा की सुभाष चन्द्र बॉस की बढती हुई ताकत से अंग्रेज सहम गए थे इस सम्बन्ध में एक उदाहरण देना चाहूंगी 'कलकत्ता उच्च न्यायलय के पूर्व मुख्या न्याय धीश पी.बी.चक्रवर्ती ने', जो उस समय राज्य के कार्यवाहक राज्यपाल थे, उन्होंने कहा था"जब मै पश्चिम बंगाल के राज्य पाल का कार्य देख रहा था, तब लोर्ड एटली ने भारत का दौरा किया था और वह राज भवन कलकत्ता में दो दिन ठहरे थे तब उनसे मेरी लम्बी बात हुई. मैंने उनसे सीधे सीधे पूछा था की महात्मा गाँधी का "भारत छोडो आन्दोलन" तो सन १९४७ से बहुत पहले ही मुरझा चूका था तथा उस समय भारतीय स्थिति में कुछ ऐसा नही था जिससे अंग्रेजो को भारत छोड़ना पड़े, आपने ऐसा क्यों किया?" तब एटली ने जवाब दिया तथा कई कारणों का उल्लेख किया जिसमे प्रमुख था" सुभाष चन्द्र बॉस के कार्य कलाप", इसी कड़ी में एक नाम और आता है चन्द्र शेखर आजाद का कई बार भेष बदल कर भागे अंग्रेजों के हाथ नहीं आये. यदि सारे स्वतंत्रता सेनानी अपने आपको फासी पर चढ़ा लेते तो आज भी हम गुलाम होते किन्तु उन्होंने देश रक्षा के लिए प्राण रक्षा अपना कर्त्तव्य समझा. चन्द्र शेखर आजाद ने भगत सिंह को भी काफी समझाया था की असेम्बली पर बम फैकने से नुक्सान होगा तथा आपको फासी चढ़ा दिया जायेगा, भगत सिंह ने कहा यदि एक भगत सिंह मरेगा तो अनेक पैदा होंगे तो आजाद ने उत्तर दिया की पैदा तो बहुत से भगत सिंह हो जायेंगे किन्तु आप जैसा डिवोशन नहीं मिलेगा. १८५७ की क्रांति में भी यदि मेरठ में पहले ही क्रांति न होती तो हमारे बीच से मंगल पण्डे जैसे वीर न जाते और इस देश की आजादी अगले लगभग ९० साल तक नहीं टलती इसलिए गंभीर व्यक्ति मोके की नजाकत को समझते हुए कई बार ऐसे निर्णय लेते है जो उस गलत लगते हैं किन्तु कालांतर में वह सही सिद्ध होते है. यदि बॉस और आजाद ने अपने प्राण बचाना उचित समझा तो इसका मतलब यह नहीं की उन्होंने और शहीदों की शहादत का मजाक उड़ाया किन्तु यह की जिसको जिस समय जो ठीक लगा उसने किया इसलिए कृपया अपने मन से इस प्रकार की बातों को निकल कर जरा खुले मन से सोचिये
    धन्यवाद
    गीतांजली

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  28. जो लोग भी बाबा रामदेव को एक राजनितिक व्यक्ति समझते हैं वह कृपया ये व्याख्यान अवश्य सुने इन में श्री राजीव दिक्शित जी की आवाज है तथा वह बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान आन्दोलन के मूल उद्देश्य बता रहें हैं इनको सुनने के बाद जिस वेदना में भारत स्वाभिमान से जुदा प्रत्येक कार्य करता जीता है तथा स्वयं स्वामी रामदेव जिस वेदना में जीते है उस में यदि आप भी न जीने लगें( यदि आप सच्चे भारतीय हैं
    ) तो यह मेरी शर्त है.
    http://www.rajivdixit.com/?cat=12

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  30. मै आपके लेख से सहमत नही हुँ। सिर्फ आंदोलन व अनशन करने देश तो नही सुधर जायेगा । जरुरत है कि काले अंग्रेजों ने भारत में शासन करने के लिए जो व्यवस्था बनाया है उसको बदलने की जरुरत है क्योकि देश के जनता लोग परम्परागत राजनीति व्यवस्था पर जी रहे । जनता अपने मं मस्त है और भ्रष्ट नेता लोग देश को लूटने का काम कर रहे है। आप चाहे तो भारत और अन्य देशों की संरचना से तुलना करके देख सकते हो । समझ आ जायेगा । भारत का विकास कछुआ गति से चल रहा है । अन्य विकसित देश बहुत तेजी के साथ विकास कर रहा है। हम लोग विदेशों पर निर्भरता में जी रहे है यही तो बिडम्बना (जबकि हमारा देश को आत्मनिर्भरता होना चाहिए तभी तो स्वदेशी होने का गर्व होगा । जनता को शिक्षा के माध्यम से ही जागरुक कर सकते है । इसलिए हमारी शिक्षा व्यवस्था भारतीय के अनुरुप होना चाहिए) अपने देश को वर्तमान में देख लो यह सब नेताओ की मनमानी कानून बनाना और जनता से पूछे बिना योजना व व्यवस्था लागू कर देना, पैसा का दूरउपयोग । जब यह सत्ता जनता के पास होता तो कानून जनता के हिसाब बनता । नेताओं और अफसर को भष्टाचार करना मुश्किल हो जाता । देश को चाहिए ग्राम स्वराज और नगर स्वराज व्यवस्था । तभी देश की स्थित सुधरेगा । गांधी जी राजीव दीक्षित अन्ना हजारे यही व्यवस्था चाहते है । आप हिवरे बाजार और रालैगण सिद्रि का भी अध्ययन कर सकते है वहां ग्राम सभा के मूताबित काम चलता है । आप वहां सर्वे कर सकते हो । भारत को कैसा व्यवस्था चाहिए । अन्ना जी ने तो कभी अपने गांव को लूटा नही है । देश को कहां लूट सकता है ।

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