रविवार, 10 जुलाई 2011

मुसलमानों का रवैया पुलिस के साथकैसा होना चाहिए ?


पुलिस का काम शांति व्यवस्था बनाए रखना है और इसके लिए उसे क़ानून तोड़ने वालों को पकड़ना भी पड़ता है और उन्हें पकड़ने के लिए बल प्रयोग भी करना पड़ता है । कई बार हालात पुलिस के ख़िलाफ़ हो जाते हैं । ऐसा तब होता है जबकि कम अनुभवी या जल्दबाज़ लोग ऐसी मुहिम में शामिल हों । कुछ जोशीले युवक कुछ कर दिखाने के चक्कर में ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसके अंजाम का ख़ुद उन्हें भी कोई अंदाज़ा नहीं होता । भारतीय पुलिस सभी धर्म स्थलों का आदर करती है और उनकी सुरक्षा भी करती है । जब कभी इनमें विशेष आयोजन के चलते ज़्यादा भीड़ भाड़ होती है तो पुलिस ही वहाँ शाँति व्यवस्था बनाती है । रमज़ान , ईद , बक़रीद , मुहर्रम और बारावफ़ात से लेकर मज़ारों पर आए दिन लगने वाले मेलों में पुलिस के जवान अपना आराम सुकून खोकर अपनी ड्यूटी अंजाम देते हैं । ये बात भी ज़माना जानता है । इसके बावजूद भी आए दिन पुलिस पब्लिक संघर्ष की ख़बरें आती रहती हैं ।
कभी इस वर्ग के साथ तो कभी उस वर्ग के साथ , कभी इस शहर से तो कभी उस शहर से। फिलहाल मुरादाबाद से ख़बर आई है और इस बार मुसलमान पुलिस से भिड़ गए । मुसलमानों को ग़ुस्सा आ गया जब एक दबिश के दौरान पुलिस ने मुल्ज़िमान के घर का सामान बाहर फ़ेंका तो उसमें उन्होंने क़ुरआन भी फेंक दिया । ऐसा अनजाने में हुआ होगा , पुलिस के बारे में अपने अनुभव की बुनियाद पर मैं दावे से कह सकता हूँ । भूलवश हुई ग़लतियों पर तो ख़ुदा भी नहीं पकड़ता तब बंदों को एक्शन लेने की क्या ज़रूरत आ गई थी । अगर उन्हें नाराज़गी भी थी तो वे अपने चुने हुए एमएलए और एमपी से कहते , अपने डीएम और एसएसपी से कहते । इस्लाम और क़ुरआन तो यह कहता है । क़ुरआन फ़साद से रोकता है और मुरादाबाद में मुसलमानों ने क़ुरआन के नाम पर ही फ़साद खड़ा कर दिया । उन्होंने दरोग़ा को घायल कर दिया और फिर दोनों आपस में भिड़ गए । अब आग लगी देखकर आज़म ख़ाँ जैसे भी दौड़ लिए मुरादाबाद की तरफ़ । ये हरगिज़ नहीं बताएंगे कि ऐ मुसलमानो , तुमने यहाँ ग़लती की । ये तो भड़कती आग को और भी ज़्यादा भड़काएंगे । ऐसा केवल इसलिए हुआ क्योंकि मुसलमान भावना में बह कर वह कर रहा है जो उसके मन में आ रहा है , जबकि उसे वह करना चाहिए जो कुरआन बता रहा है । कुरआन के हुक्म को न मानना भी कुरआन का अपमान है और यह अपमान मुसलमानों की हर बस्ती में खुलेआम हो रहा है और रोजाना हो रहा है । अगर मुसलमानों की बस्ती में कुरआन की बात मानी जा रही होती तो वहाँ कोई ऐसा आदमी न होता जिसे पकड़ने के लिए पुलिस आती और अगर कोई इक्का दुक्का ऐसा आदमी होता भी तो मुसलमान उसे पकड़कर खुद पुलिस को दे देते। पुलिस के साथ मामला करते हुए मुसलमानों को जज़्बात में बहने के बजाय क़ुरआन की हिदायत पर चलना चाहिए ताकि शाँति व्यवस्था बनी रहे।
बेहुरमती सहीफ़ों की इक ज़ुल्म है 'असद'   इस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ ज़रूरी है अहतजाज   लेकिन ये अहतजाज तशददुद से पाक हो   ताकि न मुन्तशिर हो मुहब्बत भरा समाज
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सुव्यवस्था सूत्रधार मंच पर मेरा यह पहला लेख है। मैं लेख लिखते समय केवल सत्य और न्याय को सामने रखता हूं और अपनी आत्मा में जिसे सत्य पाता हूं, वही लिख देता हूं। मेरे लेख कई बार मेरे मित्रों और आत्मीय जनों तक को विचलित कर देते हैं। उनका दुख मुझे भी दुख देता है लेकिन किसी की प्रसन्नता की ख़ातिर सत्य बदल नहीं जाता। ऐसे में अगर मैं असत्य को सत्य लिख भी दूं तब भी मेरे लिखने से हक़ीक़त नहीं बदलेगी। हमें चाहिए कि हम हक़ीक़त को अपने शब्दों में बयान करें न कि अपनी कल्पनाओं को शब्द देकर कहें कि यह हक़ीक़त है। विभिन्न मत-मतांतरों के लोगों को एकत्र करना तो आसान है लेकिन उनक साथ निष्पक्ष बर्ताव काफ़ी कठिन है, ऐसा मेरा अनुभव है। इस संबंध में मेरे कुछ सुझाव हैं जो कि उपयोगी हो सकते हैं। मंच संचालक को चाहिए कि वह क्षणिक आवेश से बचे और किसी के दबाव में न आए। यदि कोई लेखक कोई बात कह रहा है तो उसे मंच से हटाकर उसकी आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। वह उसी बात को दूसरे मंच से उठाएगा या फिर अपना ही मंच बना लेगा और जो लोग उसे पढ़ना चाहते हैं वे उसे पढ़ेंगे भी। एक सी सोच के ही लोगों का जमावड़ा गुट को तो मज़बूत बना सकता है लेकिन सत्य को सामने नहीं ला सकता। सच तभी सामने आ सकता है जबकि हर तरह की सोच का प्रतिनिधित्व हो, सभी लोग अपने अनुभव और अपने अन्वेषण सामने रखें और अंधे जज़्बात में न बहकर तथ्य और तर्क के आधार पर यह देखें कि यह बात मानव जाति के लिए लाभदायक है या कि नुक्सानदेह ? हां, लेखक को अपनी बात साहित्य की मान्य विधाओं के अन्तर्गत ही कहनी चाहिए और ऐसे शब्द यूज़ नहीं करने चाहिएं जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित नहीं किए जाते। मंच संचालक भले ही किसी भी मत और परंपरा का हो लेकिन पक्षपात उसका कर्तव्य नहीं है। उसका धर्म न्याय है। निष्पक्ष होकर वह सबके साथ न्यायपूर्वक व्यवहार करेगा तो उसके सामने अड़चनें ज़रूर आएंगी लेकिन किसी के साथ अन्याय करना इस समस्या का हल नहीं है। समस्या कोई भी हो, सत्य और न्याय के आलोक में ही उसका समाधान ढूंढना चाहिए। भारत की सनातन परंपरा यही है। इसे पनर्जीवित कर लिया गया तो ‘सुव्यवस्था‘ स्वयं साकार हो जाएगी। सुव्यवस्था का सबसे अहम सूत्र यही है। धन्यवाद !

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर जानकारी और शिक्षा ..अक्सर ऐसा होता है की पुलिसिया कार्यवाही में ..चाहे वो हिन्दू हो या मुश्लिम..पुलिस की भी मज़बूरी होती है..कभी मंदिर में माफिया छिपा मिलता है तो कभी मस्जिद में आतंकवादी शरण पता है..ऐसे में मूर्ति का अपमान या किसी धर्मग्रन्थ का अपमान उन्मादी दायरे में नहीं रख सकते..
    आप ने सही बात की ..इसी समय में कुछ लोग नारे लगवाकर राजनीती की रोटी सकते हैं..युवाओं को अपनी उर्जा सकारात्मक कामों में लगानी चाहिए..न की आइसे अराजक तत्वों का साथ देकर..
    मंच पर आप का स्वागत है..हम भी है यहाँ..

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  2. लोग तो वही है चाहे किसी भी पद पर चलें जाएँ. वे अपनी-अपनी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर ही अमानवीय कृत्य कर बैठते है.बाद में सफाई के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता है.यह सरासर अन्याय ही है.आपके स्वच्छ विचार विचार करने योग्य है. आभार

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  3. AAPNE LIKHA TO BAHUT HAD TAK SAHI HI HAI , MUJHE NAHI MALUM AAP KA ANUBHAV KYA HAIAUR MURADABAD ME KYA HUA , PAR MERA ANUBHAV YEH KAHTA HAI JI JAB -JAB KANHI BHII KOI BADA POICE ADHKARI KISI BHI KARAN SE CHUTHIL HO JATA HAI TO USKE ADHIINASTH KARMI PAGAL HO KAR BADLA LENE PAR UTARU HO JAATEY HAI .BEHARHAL DONO PAKSHON KO SANYAM NAHIKHOA CHAIHEY , JO KI LAGTA HAI , YANHA NAHI HUA .

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  4. जज्‍बातों में बह कर लिए गए फैसले अक्‍सर गलत साबित हो जाते हैं.

    http://mydunali.blogspot.com/2011/07/blog-post_10.html

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  5. विचारणीय है मुद्दा , बढ़िया पोस्ट

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  6. किसी के साथ अन्याय करना इस समस्या का हल नहीं है। विचार करने योग्य...

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  7. @ आदरणीय आशुतोष जी ! आप यहाँ हैं तभी तो हम भी यहाँ हैं .
    आपने स्वागत किया आपका शुक्रिया .

    ...और इस मंच के प्रबंध तंत्र ने हमें 'वरिष्ठ सलाहकार मंडल' में भी शामिल कर लिया है . यह आपका दिली प्यार है जो वास्तव में सराहनीय है.

    यह महसूस करने वाली बात है . इसे शब्दों में कहना ठीक नहीं क्योंकि पूरी तरह बयान किया नहीं जा सकता .
    हमारी शुभकामनाये आपके साथ हैं .

    नोट : अगर ब्लॉग का नाम वही रहता जो की यूआरएल में है तो ज्यादा बेहतर होता. यह एक सुझाव मात्र है.

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  8. अच्छी सोच, कुछ सार्थक बदलाव दिखाई दे रहा है. जिसकी उम्मीद हम बहुत पहले से किये बैठे थे. विचारो के परस्पर विरोधी एक मंच पर साथ खड़े होकर किसी मुद्दे पर एकमत हुए, यह ख़ुशी की बात है. आप सभी का स्वागत है. प्रबंध मंडल के गठन पर आप सभी को शुभकामना.

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  9. आजकल सारे धर्म भीडतंत्र और दिखावे में तब्‍दील हो गये हैं और वे अपने धार्मिक आयोजनों पर दूसरों को ज्‍यादा से ज्‍यादा परेशान करने में लगे रहते हैं। इन प्रवृत्तियों पर रोक लगनी चाहिए।

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  10. @ रजनीश जी ! अगर आप लेख पढ़कर टिप्पणी करते तो आपकी टिप्पणी सार्थक होती लेकिन आपने अपने मन में रमी हुई बात यहाँ चिपका दी । इससे फ़ायदा ?
    सबसे पहले तो आपकी इसी हरकता पर रोक लगनी चाहिए ।
    आप ही की तरह आस्तिक भी धर्म की शिक्षा को समझने में लापरवाही करते हैं तब तरह तरह के विकार समाज में पैदा हो जाते हैं ।

    यहाँ पुलिस के साथ मुसलमानों के बर्ताव पर विचार विमर्श चल रहा है । इस पर कुछ कहना हो तो आप कहें !

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